बारहवीं पास

15-04-2024

बारहवीं पास

दीप्ती देशपांडे गुप्ता (अंक: 251, अप्रैल द्वितीय, 2024 में प्रकाशित)

 

मंजू ने दरवाज़ा खटखटाया और आगे से प्रिया ने दरवाज़ा खोला। प्रिया का चेहरा दुःख से भरा हुआ, आँखें सूजी हुई और घर का माहौल ग़मगीन लग रहा था। मंजू ने अपने हाथ में रखा हुआ मिठाई का डिब्बा छुपाते हुए प्रिया से पूछा, “क्या हुआ प्रिया तुम इतनी दुखी क्यों लग रही हो? मैं बाद में आती हूँ।”

“नहीं-नहीं मंजू दीदी आओ ना!”

मंजू ने बड़ी करुणा से पूछा, “क्या हुआ प्रिया सब ठीक है ना? आज रितेश का १२ वी का रिज़ल्ट आने वाला था, क्या हुआ?”

प्रिया ने बड़े भरी मन से और आँसू पोंछते हुए कहा, “हाँ दीदी आ गया रिज़ल्ट और उसी के काऱण घर में थोड़ा तनाव बना हुआ है।”

मंजू ने आश्चर्य से कहा, “क्यों री ऐसे क्यों बोल रही है? रितेश तो बड़ा होनहार बच्चा है, सभी बच्चे उसका उदहारण देते हैं, फिर क्या हुआ?”

प्रिया ने रोते-रोते कहा, “दीदी उसके मात्र 95% बने है।”

मंजू का चेहरा जैसे लाल होने को था, लेकिन अपनी भावनाओं पर नियंत्रण पाते हुए उसने पूछा, “ओह! ये तो बड़े अच्छे अंक हैं, फिर ये उदासी क्यों?”

“क्या ख़ाक अच्छे नंबर हैं? इसमें क्या होगा हाँ? रितेश के पापा भी बहुत परेशान हैं कहीं ब्लड प्रेशर न बढ़ जाये।”

अब मंजू से रहा नहीं गया, क्या बात करती हो प्रिया 95% लाना कोई मज़ाक़ है क्या? रितेश, ओ रितेश बेटा इधर आ,” मंजू ने आवाज़ लगाई।

पैर घसीटते-घसीटते रितेश कमरे में आया, मंजू ने डिब्बा खोल के उसके मुँह में मिठाई रखी और ढेर सारा आशीर्वाद दिया, “बोली बेटा तूने बहुत-बहुत अच्छा किया है, मुझे पता है कि अपनी क्लास में तू पहले नंबर  आया है, क्यों दुखी होता है?”

रितेश बोला, “ये आप माँ और बाबा से पूछिए? वैसे आप ये मिठाई मेरे लिए लेकर आयीं हैं क्या?”

मंजू ने कहा, “नहीं-नहीं, वो मैं तपन के घर गयी थी पार्टी में तो सबको उन्होंने ये मिठाई के डिब्बे दिए हैं।” 

“क्या?” बड़े आश्चर्य से रितेश ने पूछा। “उसको तो सिर्फ़ 68% मिले हैं! उसके यहाँ पार्टी है इस बात की?”

“हाँ बेटा,” मंजू बोली। 

रितेश ने अपनी माँ की ओर देखा और चला गया। 

प्रिया ने मंजू से पूछा, “इतने ख़राब नंबर की क्या पार्टी दीदी?”

मंजू बोली, “प्रिया, 12वीं में फ़र्स्ट डिवीज़न की पार्टी थी। माता-पिता बहुत ख़ुश और बेटे को लेकर बहुत गौरव का अनुभव कर रहे हैं कि उनका बेटा फ़र्स्ट डिवीज़न पास हो गया, अब उसको आगे किसी भी परीक्षा में बैठने के लिए कोई रुकावट नहीं होगी, हाँ शायद मनपसंद कॉलेज ना मिले मगर मनपसंद जीविका ज़रूर अर्जित कर पायेगा।’

ये सुनकर प्रिया जैसे बर्फ़- सी जम गयी। 

मंजू बोली, “ये सिर्फ़ एक परीक्षा है जीवन-मरण का प्रश्न नहीं है कि जो कम अंक आए तो सब ख़त्म। तुम्हें और भाई-साहब को इसको लाड़ करना चाहिए, कोई भेंट देनी चाहिए, ये क्या तमाशा लगा रखा है? बच्चों पर इतना दबाव, इतनी अपेक्षाएँ क्या सच में आवश्यक है? एक बार बस तपन के घर जा कर देखो, तब तुम्हें अपनी ग़लती का एहसास और रितेश पर गर्व का अनुभव होगा।”

और यह कह कर मंजु मिठाई वहीं छोड़ कर अपने घर चली गई। 

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