और कितना संघर्ष
ज्योत्स्ना प्रवाहमन्नू की वह एक रात प्रदीप श्रीवास्तव द्वारा लिखा गया एक मनोवैज्ञानिक और मनोविश्लेषणत्मक उपन्यास है। बुद्ध ने भी कहा था कि किसी पुरुष के चरित्रहीन हुए बिना स्त्री चरित्रहीन नहीं हो सकती। प्रदीप जी ने अपने उपन्यास में इस उक्ति को सार्थक लिखा है . . . किसी ने यह भी कहा है कि स्त्री को जो सँभाल ना सके वह कापुरुष है, नपुंसक है। उनके उपन्यास को पढ़ने पर पाठक को उक्तियाँ याद आ जाती हैं।
एक ऐसी स्त्री जिसने जीवन में ऐसा कठोर पुरुष पाया जो उसके स्त्री मन को कभी समझ नहीं पाया। उसके स्त्रीत्व का भी कभी सम्मान नहीं कर पाया और अपनी शारीरिक और मानसिक कुंठा के चलते उसे प्रताड़ित करता रहा। वह स्त्री कामसुख का जो आनंद होता है, उसे कभी भोग नहीं पाई। उसकी काम-इच्छा कभी पूर्ण नहीं हुई। पति ने उसे कभी सहज होने ही नहीं दिया, लेकिन कहते हैं कि स्त्री की कामेक्षा जागने पर पुरुष से आठ गुना ज़्यादा होती है . . .।
लेखक ने अपने मनोविश्लेषण में एक जगह बहुत सही लिखा है कि पुरुष के ऊपर होता है या पति के ऊपर होता है कि वह स्त्री को कैसे संतुष्ट करता है या क्या आकार देता है . . .। बहुत महीन विश्लेषण है और उस स्त्री के मन में कितनी दुविधाएँ, कितने प्रायश्चित, कितने पश्चात्ताप और कितना संघर्ष, कितनी घुटन चलती रहती है—इस सम्बन्ध को लेकर जिसे समाज अवैध कहता है . . .।
वह एक अपनी उम्र से छोटे पुरुष के साथ संपर्क करती है—तमाम वर्जना है—वह सब जानती है। उसके भीतर का द्वंद्व बहुत अच्छे से, एक स्त्री मन के संघर्ष को इस उपन्यास में बहुत अच्छे तरीक़े से, एक पुरुष द्वारा व्याख्या की गई है। यह उपन्यास की उपलब्धि है। नारी मन के सूक्ष्म तंतुओं को पकड़कर प्रदीप जी ने इस उपन्यास का कथानक गढ़ा है और पूरा उपन्यास पाठक को बाँधे रखता है। कहानी के अंत तक अंत में मनु किस अनर्थ की बात कर रही है बार-बार वह कहती है कि यह भी अनर्थ नहीं है, यह भी अनर्थ नहीं है और कहानी पाठक को बाँधे हुए है।