ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें

01-04-2026

ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें

आनंद दास (अंक: 294, अप्रैल प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें—
हमलोगों को रोज-रोज़ 
चमार तो कभी चमरोटा 
कह कर बुलाते हैं। 
 
ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें—
नाली के कीड़े जैसी 
जात है तुम्हारी। 
चमरा, चमरोटा कहीं का! 
 
ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें—
नाली कितना भी साफ़ कर लो 
साफ़ नहीं होती। 
वैसी है तुम्हारी जात! 
 
ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें—
अभी मारूँगा तो, 
पूरे कपड़े में हगते-मूतते 
घर जाओगे अपने। 
 
ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें—
तुमलोगों के ऊपर 
थूकना चाहिए, 
और तुम्हारे जात पर भी! 
 
ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें—
तुमलोग कभी नहीं सुधरोगे 
ना ही कभी सुधरेगी, 
तुम्हारी जात! 
 
ऐसे-ऐसे कब तक बोलते रहेंगे? 
कब तक इंसानियत का जनाज़ा निकालते रहेंगे? 
अब ज़माना जात का नहीं, 
फ़ेसबुक, इंस्टा और व्हाट्सऐप का है! 

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