आत्मबोध
रीता कुमारी
आँगन में क़दम रखते ही अपना वर्षों पुराना चिर परिचित जीर्ण-शीर्ण मकान निखिल को गहरी आत्मीयता से भर गया, जैसे वर्षों पुराना कोई अंतरंग मित्र अचानक ही गले आ लगा हो। जिस पथरीले आँगन में वह खेल कूदकर बड़ा हुआ था, अम्मा से कभी ढेरों डाँट सुनी थी, दुलार पाया था, भैया और भाभी की स्नेहिल छाँव में पला बढ़ा था, जिसके कोने-कोने में उसके शैशव से लेकर युवावस्था तक के स्मृति-चिन्ह बिखरे पड़े थे। उसे लगा वह आँगन आज भी वैसा ही था जैसा वह छोड़ गया था। सिवाय अम्मा द्वारा लगाए गए उस आम के बिरवे के जो अब बड़ा होेकर मंजरियों से ढक गया था। तभी उसकी नज़र बरामदे में बैठी चावल चुनती भाभी पर गई। पहले की तरह ही अपने काम में तल्लीन भाभी को निखिल के पास आ जाने पर भी उसके आने का आभास तक नहीं हुआ। जैसे ही वह भाभी के पैर छूने के लिए झुका, चौंककर सर उठाते ही उनकी नज़र सामने खड़े निखिल पर पड़ी। उसे यूँ अचानक अपने सामने पाकर मारे ख़ुशी के उनकी आँखें भर आई थीं।
“निखिल . . . तुम . . .” और आगे के बोल अवरुद्ध गले में अटक कर रह गए थे। निखिल के अंदर भी कुछ भीगने लगा था। तभी किसी के आने की आहट पाकर कमरे से भैया की आवाज़ आई थी।
“कौन . . . कौन आया, है, . . . उमा?”
“निखिल . . . अपना निखिल आया है।”
अब तक भाभी ने तो अपने को सँभाल लिया था, पर उसे देखकर भैया अपने आप को नहीं सँभाल पाए थे। पैर छूने के लिए झुके उसके दोनों हाथों को बीच में ही थाम, उन्होंने निखिल को गले से लगा लिया था। फिर तो दोनों भाइयों की आँखें निःशब्द बरसने लगी थीं। अंतस में दबा बरसों पुराना कोई प्यार का सोता फूट पड़ा था। कितने दिनों बाद निखिल इस तरह से भैया के गले लग रहा था। अम्मा की तेरहवीं के बाद जो यहाँ से गया था, आज पाँच वर्षों बाद ही लौटा था, वह भी दिल में कितने ही सवाल छिपाए पर भैया के गले लगते ही सारे शिकवे शिकायत ख़ुद व ख़ुद तिरोहित होने लगे थे। अब तो जिस मक़सद से आया था उसे सोचकर भी उसे गहरी ग्लानि का अनुभव होने लगा था। पाँच वर्षों बाद वह भैया और भाभी से मिलने या अपनी भतीजी सीमा की शादी में हाथ बँटाने नहीं आया था। वह तो अपनी पत्नी सुमन के पाँच वर्षों तक समझाने के बाद हिम्मत जुटा, भैया से पुश्तैनी ज़मीन के दो एकड़ में अपना हिस्सा माँगने आया था। सुमन को डर था कि कहीं ऐसा न हो कि अपनी तंग हालत के कारण भैया सारी ज़मीन बेचकर शादी में ख़र्च कर दें। वह भी पत्नी की बातों में आकर अपने उस भैया से हिस्सा माँगने आ गया था, जिनके बलबूते पर ही वह आज इतने ऊँचे ओहदे पर पहुँच पाया था। जिनकी बदौलत पटना और रांची जैसे शहर में फ़्लैट, महँगी गाड़ी और सारी सुख सुविधाएँ जुटा पाया था।
पापा की अचानक मृत्यु के बाद अम्मा तो पूरी रह टूट गई थीं। तब यदि भैया ने अम्मा के साथ-साथ अपने छोटे भाई बहनों के बिखरते अस्तित्व को सँभालकर परिस्थिति का सामना करने का साहस न किया होता, तो वे लोग जाने क्या-क्या मुसीबतें झेल रहे होते। पुश्तैनी ज़मीन का तब शायद एक टुकड़ा भी न बचता। न जाने क्यों भैया के पास बैठते ही उसकी स्वार्थ की डोर ढीली पड़ने लगी थी और वह फिर से भैया के साथ संबंधों के जाल में अटकने लगा था। जो कभी प्यार और विश्वास से बँधे इस परिवार की पुख़्ता नींव थे। जब तक दोनों भाइयों के बीच संवादहीनता की स्थिति समाप्त होती, भाभी चाय बना लाई थीं।
थोड़ी देर में अविनाश भी आ गया। यह उसका वही लाड़ला भतीजा था, जिसका कभी भैया से अधिक उससे लगाव था। वह अपनी हर ज़रूरत और हठ अपने काकू से ही पूरी करवाता था। अब धीर गंभीर युवक नज़र आ रहा था। उसे आज भी याद है कि उसे आइसक्रीम सबसे ज़्यादा पसंद था। आइसक्रीम वाले की आवाज़ सुनते ही जब वह उसके पीछे भागता, बीच में ही भाभी उसे गला ख़राब होने का डर दिखाकर रोक लेती। अगर वह घर में होता तो भाभी की सारी बहानेबाज़ी पर पानी फेर, उनकी डाँट को अनसुना कर, उसे आइसक्रीम दिलवाता। छोटा-सा अवि देर तक आइसक्रीम का आनंद उठाता रहता और वह उसके चेहरे पर फैली ख़ुशी और तृप्ति को देख-देखकर एक अवर्णनीय आत्मसंतुष्टि का अनुभव करता। वही अविनाश, आज उसे देखकर हमेशा की तरह अपनी ख़ुशी का इज़हार करने के लिए शोर मचाने के बदले, ख़ामोशी से हलकी मुस्कान बिखेरता उसकी बग़ल में आ बैठा था। उसकी उदास मुस्कान और निखिल के चेहरे पर टिकी निष्कपट निगाहों में जाने क्या था कि उसकी उन निगाहों ने उसे पानी पानी कर दिया।
“कैसी चल रही है तुम्हारी पढ़ाई?” उसने गुमसुम हो आए वातावरण को हलका करना चाहा। उसके पूछते हीअविनाश की आवाज़ में उत्साह आ गया।
“काकू . . . मैं न इस वर्ष आईआईटी के इंजीनियरिग कोर्स में दाख़िले के लिए होने वाली परीक्षा में चुन लिया गया हूँ, लेकिन . . .” अचानक उसकी आवाज़ में आया उत्साह ठंडा पड़ गया।
“लेकिन . . . क्या?”
“पापा इस वर्ष मेरा नामांकन नहीं करवाएँगे। दीदी की शादी जो है।”
निखिल को ऐसा लगा जैसे वह आकाश से गिरा हो। जिस सच को अब तक जानते हुए भी अनजान बनने की कोशिश कर रहा था, वही सच उसके सामने नंगा होकर आ खड़ा हुआ था। भाई के राज मेें कभी उसने सारे सुख उठाए थे। आज उन्हीं के बच्चे ऐसी आर्थिक विपन्नता में जी रहे थे, वह भी उसके होते हुए। जब वह आईआईटी के प्रवेश परीक्षा में सफल हुआ था, यही भैया कितने ख़ुश हुए थे। अम्मा ने दबी ज़ुबान में भैया को मना भी किया था। “नवीन, ऐसी परीक्षाएँ भी तो होती हैं जिसमें नौकरी ही मिल जाती है, निखिल को वही परीक्षा देने दे, इसे नौकरी मिल जाएगी तो तेरा हाथ बँटाएगा। आख़िर तू इसकी इंजीनियरिंग की पढ़ाई के ख़र्चे कैसे सँभाल पाएगा। अभी दो-दो बहनों को ब्याहना भी है। कौन सा तुम्हारे पापा कारूँ का ख़ज़ाना छोड़ गए हैं।”
पर भैया कहाँ मनाने वाले थे, “अम्मा आप इतनी चिंता क्यों करती हैं? मैं हूँ न, आप मेरे ऊपर विश्वास रखिए, जैसे होगा सब सँभाल लूँगा, पर निखिल की पढ़ाई पूरी करवा कर ही दम लूँगा।”
बीते पल याद कर उसका मन कचोटने लगा था। शायद उसकी 12-13 वर्ष की उम्र रही होगी, जब, दिल के दौरे से दूसरी बार जीवनदान पाए पापा ने 21 वर्ष के भैया को अपनी मित्र की बेटी के साथ ब्याह दिया था। मृत्यु से सिर्फ़ एक दिन पहले बोले थे, “जब मैं नहीं रहूँगा शकुंतला, मेरे यह दोनों बेटा-बहू तुम्हारा ख़्याल रखेंगे।”
ख़ामोश उदास बैठी अम्माँ के चेहरे पर व्यंग्य भरी मुस्कुराहट तैर गई थी। उन्हें अपने इस सौतेले बेटे-बहू पर रत्ती भर भी भरोसा नहीं था। वहीं उसके पापा का अपने बेटे पर अटल विश्वास था, जो अंततः सच साबित हुआ। पापा के इस दुनिया से विदा होते ही भैया ने अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़ जिस तरह पूरे परविार को सँभाला, अम्माँ की भैया के प्रति सोच ही बदल गई। क्या नहीं किया भैया ने उन लागों के लिए पुरानी किताबें बेचीं, घर-घर दूध पहुँचाया, फिर उन्हें एक प्राइवेट फ़र्म में नौकरी मिल गई, शाम को जगह-जगह हिसाब-किताब करने के लिए पार्ट टाइम नौकरी करते, थोड़े-थोड़े पैसों के लिए ढेर सारी मेहनत करते।
यह भी नहीं सोचते कि उनकी नई-नई शादी हुई है, भाभी के भी कुछ अरमान होंगे। स्वभाव से ही शांत भाभी भी कम जीवट वाली नहीं थी। कभी भी अपने किसी काम के लिए उन्हें भैया से शिकायत नहीं की। उल्टे भैया के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम में जुटी रहती। एक-एक पैसा सोच-समझ कर ख़र्च करती। ऐसा लगता कि उन लोगों ने अपनी सारी इच्छाओं को परिवार की ख़ुशियों के लिए समर्पित कर दिया हो। उसके इंजीनियरिंग में नामांकन के समय जब अधिक रुपयों की ज़रूरत पड़ी, बिना माँगे ही भाभी ने अपने सारे गहने भैया को सौंप दिए थे। अम्मा के गहनों और ज़मीन को भाभी ने हाथ तक नहीं लगाने दिया था। यह कहकर कि अम्मा के गहनों और ज़मीन की ज़रूरत नेहा और निशा की शादी में पड़ेगी। भाभी को इस तरह अपना सर्वस्व निछावर करते देख अम्मा चुप नहीं रह सकी थी। जिस सौतेले बेटे को हमेशा अपने प्यार से वंचित ही रखा था, दुर्भाग्य के कठिन क्षणों में उसका अपने सौतेले भाई बहनों लिए त्याग और प्यार देखकर उनका वात्सल्य उमड़ पड़ा था। वह भाभी से बोली थी—बहू ऐसी नादानी मत कर अपने शरीर से ये गहने मत उतार—अभी तुम्हारे खेलने खाने का दिन है। एक बार गहने शरीर से उतर गए तो फिर नहीं बन पाएँगे। निखिल का नामांकन अगर नहीं हो सकेगा तो न सही, पर अपनी चादर से इतना अधिक पैर मत फैला कि तेरा जीवन ही कष्टकर हो जाए।”
“आप परेशान मत हो, हमारा दुख सिर्फ़ उतने ही दिनों तक का है, जितने दिनों तक निखिल की पढ़ाई पूरी नहीं हो जाती है। एक बार निखिल अपनी पढ़ाई पूरी कर नौकरी करने लगेगा तो ढेरों गहने बनवा लूँगी।”
और भैया और भाभी अपने सारे फ़र्ज़ पूरे कर पापा की कसौटी पर हर तरह से खरे उतरे थे। निशा और नेहा की शादी हैसियत से ज़्यादा दहेज़ देकर की। उसकी पढ़ाई पूरी करवाई। जिसमें थोड़े सी ज़मीन, बाइक और माँ के गहने भी काम आए। वे तीनों जो आज ऐशो-आराम की ज़िन्दगी जी रहे हैं, यह सब भैया-भाभी के त्याग का ही तो परिणाम था। कभी निखिल के दिल में भी कितने ही बड़े-बड़े अरमान थे। भैया और भाभी के लिए कुछ कर गुज़रने की चाह थी, पर भाभी की तरह सुमन ने भी उसका साथ दिया होता तो आज वह यों नज़रें चुराता न फिरता। पढ़ाई समाप्त होते ही उसकी नौकरी एक मल्टीनेशनल कंपनी में लग गई थी। घर में ख़ुशी का माहौल शुरू ही हुआ था कि सुमन के घर से उसके लिए शादी का प्रस्ताव आ गया था। जाने उन लोगों ने क्या जादू कर दिया था कि निखिल के बार बार मना करने के बाद भी अम्मा और भैया ने हाँ कर ही दी थी। आधुनिकता के रंग में रँगें होने के बावजूद सुमन शादी के समय पूरी तरह परिवार को समर्पित बहू नज़र आती थी। अम्माँ यह सोचकर कि बड़ी बहू की तरह छोटी बहू भी धैर्यवान और समझदार मिल गई है, फूली नहीं समा रही थीं।
पर अम्माँ की यह सोच जल्द ही बदलने लगी, जब सुमन ने भाभी को अपना आदर्श बनाने के बजाय, अपना प्रतिद्वंद्वी बना लिया। वह अपनी पढ़ाई, रूप और मायके के वैभव जैसी सामान्य सी बातों में भी भाभी से स्पर्धा रखने लगी थी। लोगों द्वारा की जाने वाली भाभी की प्रशंसा उसे अपना अपमान लगता। भाभी में जो त्याग, कर्मठता और अपनों के लिए निःस्वार्थ प्रेम जैसे नैसर्गिक गुण थे, उसे वह दिखावा लगता था। ईर्ष्या से दग्ध वह हर समय भाभी में कमियाँ ढूँढ़ती रहती। हमेशा जोड़-तोड़ बैठाकर, उस अविभाजित परिवार को ‘अपना और सौतेला’ में बाँट, अम्माँ को अपनी तरफ़ करने की हर सम्भव कोशिश करती। लेकिन इस तरह वह अम्माँ से और भी दूर जा रही थी। सीधी-सादी भाभी सहमी-सहमी रहती। सुमन को समझाने की निखिल की सारी कोशिश बेकार हो जाती। उसके ईर्ष्यालु स्वभाव पर लगाम लागाना उसके बस में नहीं था। सुमन का भाभी के प्रति ओछा व्यवहार अम्माँ को मर्माहत करता। निखिल नहीं चाहता था कि सुमन के कारण अम्माँ को कोई चोट पहुँचे, इसलिए उसे अम्माँ की नज़रों में ऊँचा उठाने की कोशिश करते रहता। उसकी यही कोशिश उसे भी अम्माँ की नज़रों में गिरने लगा था।
अम्मा ने कभी भैया को जब वह छोटे थे सौतेला समझकर उनसे जितनी दूरी बनाई थी, उतनी ही अब वह उनके साथ जुड़ गई थीं। भैया के बदले अब उनका व्यवहार अपने सगे बेटे निखिल के प्रति सौतेला होने लगा था। वह अम्माँ से बेहद प्यार करता था, इसलिए अम्माँ का सौतेला व्यवहार उसके लिए सजा के समान था। जब भी अम्माँ को समझाने की कोशिश करता, उनकी आग्नेय आँखें उसे भूनकर रख देतीं। वह अंदर ही अंदर टूटता रहा, जिसे न अम्माँ समझ सकीं और न सुमन। न चाहते हुए भी वह सब से दूर होता गया और अपनी नई गृहस्थी में डूबता चला गया।
अम्माँ का सारा प्यार अब भैया के लिए था। अपना सुख-दुख वह भैया-भाभी के साथ ही बाँटती और अपने सारे काम सधिकार भाभी को सौंपतीं। वह बहुत चाहता कि अम्मा उनके पास रहें। सुमन भी समझाती उन्हें निखिल के पास रहने के लिए, पर अम्माँ दो-तीन दिनों से ज़्यादा उन लोगों के पास नहीं टिकतीं। निखिल के घर मिलने वाली सारी सुख-सुविधाओं को ठोकर मार भैया के साथ अंत तक वह जुड़ी रहीं। सुमन समझे या न समझे वह अच्छी तरह समझता था, अम्माँ, भैया-भाभी के आड़े समय में निभाए गए फ़र्ज़ को ज़ाया नहीं होने देना चाहती थीं। वह चाहती थीं कि उनकी जगह भैया-भाभी को घर में ज़्यादा सम्मान मिले। सब कुछ समझते हुए भी अम्मा और सुमन को समझाना उसके बस में नहीं था। अम्माँ की मृत्यु के बाद तो वह कड़ी भी टूट गई, जिसने संबंधों में आई कटुता के बाद भी भाइयों को जोड़े रखा था। इन पाँच वर्षो में आई दूरी से दोनों भाई एक तरह से बेगाने हो गए थे।
वह अतीत के पलों में यों ही डूबा, जाने कब तक बैठा रहता, अगर सीमा ने आकर उसकी तंद्रा भंग नहीें की होती। कुछ औपचारिक बातों के बाद वह अपनी किताब कापी समेटती अंदर के कमरे में चली गई थी। तभी उसे बाहर से भाभी और अविनाश के बहुत धीमे स्वर में बात करने की आवाज़ सुनाई दी। बहुत ध्यान से सुनने पर, उसे समझ में आया कि भाभी अविनाश से उसके ट्यूशन के पैसे माँग रही थी, निखिल के इतने दिनों बाद घर आने पर वह रात में रूखा-सूखा खाना नहीं बनाना चाह रही थीं।
सुनते ही निखिल को लगा, जैसे धरती फट जाए और वह उसमें समा जाए। एक गहरी आत्मवेदना से उसकी आत्मा छटपटा उठी। अपने बेटे के लिए जहाँ उसने दो-दो ट्यूशन लगा रखे थे, वहीं अविनाश अपनी पढ़ाई का ख़र्च जुटाने के लिए न जाने कितने ट्यूशन पढ़ा रहा था। कुछ सोच कर वह उठा।
“भाभी, कुछ देर के लिए बाहर जा रहा हूँं। कुछ लोगों से मिलकर आता हूँ।”
“हाँ . . . हाँ जाओ, सब तुम्हारे विषय में पूछते रहते हैं।”
वह किसी से मिलने की बजाय बाज़ार की तरफ़ बढ़ चला। जब घर लौटा, तो बाज़ार से खाने-पीने का काफ़ी सामान साथ लेते आया जिसे देखते ही भाभी पहले की तरह की उसकी फ़ुज़ूलख़र्ची पर बिगड़ गई। वर्षोंं बाद भाभी की डाँट खाकर उसे लगा संबंधों के धागे उलझे ज़रूर थे पर टूटे नहीं थे।
रात खाने के समय कुछ इधर उधर की बातों के बाद सहसा भैया उससे बोले, “निखिल, अपनी जो दो एकड़ ज़मीन है, उसमें से मैं एक एकड़ ज़मीन सीमा की शादी के ख़र्चों के लिए बेच रहा हूँ, एक दो दिनों में पैसे मिल जाएँगे, बाक़ी बची तुम्हारी हिस्से की एक एकड़ ज़मीन, अब तुम सँभाल लो। गाँव की ज़मीन के ज़्यादा पैसे मिलेंगे नहीं, इसलिए उसे तुम किसी को बटाई पर दे दो, अब मुझसे खेती का काम नहीं सँभलता है।”
निखिल जैेसे आकाश से गिरा, जिस ज़मीन के लिए सुमन इतने दिनों से जोड़-तोड़ बैठा रही थी, कितनी आसानी से भैया ने बिना माँगे ही उसे सौंप दिया था। एक गहरे अपराध बोध से पीड़ित वह नज़रें चुराता चुपचाप उठ कर सोने चला गया।
रात में भाभी ने उसके सोने की व्यवस्था अम्माँ के कमरे में ही कर दी थी। भाभी ने अम्माँ का कमरा और चीज़ों को वैसे ही सहेज कर रख छोड़ा था, जैेसा कि उनके जीवित रहते हुए था। अम्माँ के शीशम के पलंग पर लेटते ही उसे गहरी आत्मीयता का अनुभव हुआ, पर नींद आँखों से कोसों दूर थी। एकांत में विश्लेषण करता उसका मन आत्मगलानि की पीड़ा से व्यथित हो रहा था। रह-रहकर अम्माँ की स्मृति उसके दिल पर हथौड़ा बरसा रही थी। उसे लग रहा था अभी किसी कोने से क्लांत शरीर और अवसन्न चित्त अम्माँ आँखों में ढेरों शिकायतें सँजोए उसके पास आ बैठेगी और उसके पास अपने स्वार्थी फ़ैसलों का जवाब नहीं होगा। क्या जवाब देगा? जीवन में अपनी इच्छित ऊँचाइयों को पाने के बाद उसने उसी पायदान को ठोकर मार दी जिसके सहारे वह वहाँ तक पहुँचा था। आज पहली बार उसे अपनी ख़ुदग़र्ज़ी का इतनी शिद्दत से आत्मबोध हुआ था।
सुबह उठने से पहले उसने मन नहीं मन एक निर्णय कर लिया था। अभी वह इतना गया-गुज़रा नहीं हुआ था कि पत्नी के बातों में आ, भैया भाभी की सहायता से मुँह मोड़ लेता। सुबह जब तक वह नहा-धोकर तैयार हुआ, भाभी ने उसके मनपसंद आलू मेथी बनाकर रख दिए थे। गरमा-गरम पूड़ियाँ तलती भाभी से वह बोला, “भाभी थोड़ी और पूड़ियाँ तल देना रास्ते के लिए। मैं आज ही अविनाश के साथ कानपुर जा रहा हूँ। उसका नामांकन इंजीनियरिंग में करवाने।”
फिर तो वह भैया और भाभी के किसी अगर-मगर के सामने नहीं रुका था। अविनाश का नामांकन करवाने के बाद आते ही भैया को ज़मीन बेचने से रोककर सीमा की शादी की तैयारियों में जुट गया था। अपने खाते से पैसा निकाल कर जितनी अच्छी शादी की व्यवस्था कर सकता था, की। एक ही तो लड़की थी दोनों भाइयों के बीच; वह कोई कसर छोड़ना नहीं चाहता था। इसी बीच अपनी छुट्टियाँ बढ़ाने के साथ-साथ सुमन और अपने बेटे आशीष को भी बुलवा लिया था।
पहुँचते ही सुमन को झटका-सा लगा। उसका सारा पासा ही उल्टा पड़ गया था। एकांत पाते ही निखिल पर बरस पड़ी थी। “मैं सोच भी नहीं सकती थी कि तुम मेरे साथ इतना बड़ा धोखा करोगे? यहाँ जिस काम के लिए आए थे, वह तो कर नहीं सके, उलटे यहाँ रुक कर अपनी सारी जमा-पूँजी लुटा रहे हो। मैं समझती थी तुम सुधर गए हो, पर तुम तो . . .”
तभी निखिल ने उसकी बात काटते हुए बोला, “इससे पहले कि तुम भैया और भाभी के लिए कोई अमर्यादित शब्द बोलोे, मैं तुम्हें बता देना चाहता हूँ कि मैं तुम्हारी किसी बात से अपना फ़ैसला नहीं बदलूँगा और अविनाश की पढ़ाई का ख़र्च तब तक उठाऊँगा जब तक कि वह अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो जाता। भैया भी यदि सिर्फ़ अपने लिए सोचते तो एक अच्छी नौकरी प्राप्त कर आराम की ज़िन्दगी बिता सकते थे। पर उन्होंने ऐसा नहीं किया, ताकि हम सब सुखी रह सकें, तो क्या उनके प्रति हमारी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है?”
थोड़ी देर रुक कर वह फिर बोला, “मेरी बात मानों तो तुम्हें एक सलाह दूँ—भाभी की बहुत बखिया उधेड़ ली। अब एक बार अपना स्वार्थ का चोला उतार कर अपने फ़र्ज़ पूरा करके देखो, कितनी आत्मसंतुष्टि मिलती है। लोगों की नज़रों में तुम्हारा क़द ख़ुद-ब-ख़ुद बड़ा हो जाएगा। फिर तुम्हें भाभी को नीचा दिखा कर ख़ुद को ऊँचा उठाने के लिए सैकड़ों बहाने नहीं गढ़ने पड़ेंगे। सीमा को अपनाकर देखो, बेटी के लिए तरसते तुम्हारे मन को कैसी तृप्ति मिलती है।”
उसकी बातों से अवाक् रह गई सुमन को वहीं बैठा छोड़ वह अपने काम में लग गया था। थोड़ी देर बाद निखिल को यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि सुमन शादी के कामों में पूरी तरह व्यस्त थी। हर बात भाभी से पूछ-पूछ कर बड़े उत्साह से कर रही थी। विदाई के दिन तक वह उसी लगन से कामों में लगी रही। इस दौरान सुमन को भी निखिल की आँखों में अपने लिए वही प्यार और सम्मान नज़र आया, जिसके लिए वह अब तक तरसती रही थी। अपनों के सुख-दुख से दूर वह हमेशा अपना ही सुख तलाशती रही, फिर भी उसकी ख़ुशी हमेशा अधूरी रही। आज वर्षों बाद, पहली बार उसे लगा उसकी ख़ुशी मुकम्मल हो पाई थी।
विदाई के समय जब सुमन अपना प्रिय जड़ाऊ सेट सीमा को पहना, उसे गले से लगा कर रो पड़ी, तब निखिल को लगा कि आँसुओं के साथ वर्षोंं से उसके मन पर जमा कलुष भी धुल गया है और आकाश में फिर से चाँद उग आया है अपनी शीतलता दिखेरने।