उड़ान

डॉ. शैलेश शुक्ला (अंक: 294, मार्च द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

सात साल पहले जब सीमा का ब्याह रमेश से हुआ था, तो उसकी माँ ने कहा था—यह लड़का मेहनती है, ईमानदार है, तुझे ख़ुश रखेगा। 

माँ ग़लत नहीं थीं। 

रमेश ने छोटी-सी नौकरी में भी सीमा को कभी किसी चीज़ की कमी नहीं होने दी। सर्दियों में ऊनी शॉल, त्योहार पर मिठाई, और हर रात थकान के बावजूद पूछना—“आज खाने में क्या बनाऊँ?” 

पर फिर नेहा की शादी हुई। नेहा—सीमा की बचपन की सहेली। और उस शादी में आया—विवेक कपूर। BMW, सूट-बूट, कैनेडा की नौकरी। 

विवेक की नज़र सीमा पर पड़ी। 

“आप बहुत सुंदर हैं।”

सीमा मुस्कुराई। उस मुस्कान में रमेश के सात साल कहीं खो गए। 

तीन महीने बाद सीमा ने रमेश के सामने तलाक़ के काग़ज़ रख दिए। 

“यह क्या है?” रमेश का हाथ काँप रहा था। 

“मैं आगे बढ़ना चाहती हूँ।”

“सात साल में मैंने तुम्हारे साथ क्या बुरा किया?” 

“तुमने कुछ बुरा नहीं किया। बस . . . तुम काफ़ी नहीं हो।”

रमेश चुप हो गया। उसके पास तर्क नहीं था—सिर्फ़ सात साल थे, जो अब बेकार हो गए थे। 

छह महीने बाद नेहा ने बताया कि विवेक कपूर कैनेडा में पहले से शादीशुदा है। सीमा के लिए वह बस एक “इंडिया वाला टाइमपास” था। 

सीमा ने फोन किया रमेश को। 

“मुझसे ग़लती हुई।”

“हाँ।” रमेश ने कहा और फोन रख दिया। 

कभी-कभी सबसे छोटा जवाब सबसे बड़ी सज़ा होता है। 

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