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15-03-2026

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डॉ. शैलेश शुक्ला (अंक: 294, मार्च द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

राजकुमार सोनकर आईएएस थे। सरकारी बँगला था, सफ़ेद गाड़ी थी, बच्चे प्राइवेट स्कूल में पढ़ते थे। 

और जाति का प्रमाण-पत्र—वह भी था। सुरक्षित। हर काम आता था। 

जब ट्रांसफ़र का ख़तरा होता, प्रमाण-पत्र निकलता। जब कोई सवाल पूछता, प्रमाण-पत्र निकलता। 

उनके दफ़्तर में सुशील पाण्डेय नाम का एक छोटा बाबू था। ईमानदार, समय का पाबंद। एक बार उसने फ़ाइल में गड़बड़ी पकड़ी—दस लाख की। 

“साहब, यह हिसाब ग़लत है।”

“तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझ पर उँगली उठाने की?” 

“साहब, मैं काम की बात कर रहा हूँ . . .”

“मैं दलित हूँ। मुझे नीचा दिखाने की कोशिश हो रही है। मैं अत्याचार की रिपोर्ट लिखवाऊँगा।”

सुशील सन्न रह गया। उसने दस लाख की गड़बड़ी पकड़ी थी—और अब वह ख़ुद मुलज़िम बनने वाला था। 

महीने भर की जाँच। निलंबन का डर। परिवार की बेचैनी। 

आख़िर एक सेवानिवृत्त जज ने जाँच की। गड़बड़ी साबित हुई। राजकुमार सोनकर का तबादला हुआ। 

पर उस तबादले में भी—प्रमाण-पत्र की वजह से—नई जगह बड़ा पद मिला। 

सुशील पाण्डेय ने एक दिन अपने बेटे से कहा, “बेटा, ईमानदारी अच्छी चीज़ है। पर इस देश में उसकी क़ीमत चुकानी पड़ती है।”

“तो बेईमान हो जाएँ, बाबा?” 

“नहीं। पर अकेले मत लड़ो। इकट्ठा होओ।”

व्यवस्था तब बदलती है जब एक नहीं, हज़ार सुशील एक साथ खड़े हों। 

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