सनम मेरी मंज़िल हो तुम
सत्यवान साहब गाज़ीपुरी
भले चाहे मुश्किल हो तुम
सनम मेरी मंज़िल हो तुम
मिले पास आए तो क्यूँ दूर जाना
न जाने ये क्यूँ हाथ हवा में हिलाना
कोई देख ले ना ये बातें बनाना
ये शरमा के मुझसे निगाहें चुराना
जो पलकें झुका के घटा बन के आतीं
वो होंठों से मदहोश मधु-रस पिलातीं
मेरे दिल में हर पल हो तुम
सनम मेरी मंज़िल हो तुम
ये क़ातिल निगाहें, ये गालों पे तिल भी
मचल जाए देखें जो नफ़रत के दिल भी
अदा यूँ बिखेरी कि दिल ये कराहे
खुलेआम ही तुझको बेख़ौफ़ चाहे
भुला के ज़माने की हर इक लकीरें
जो यूँ पास आती रहीं धीरे-धीरे
मेरे दिल में शामिल हो तुम
सनम मेरी मंज़िल हो तुम
ज़माने का दरिया न हमको डुबो दे
कहीं बीच राहों में तुझको न खो दें
बिछड़ने के ये ख़ौफ़ अब क्यूँ सँभालें
तुम्हें जिस घड़ी याद कर लें तो पा लें
इसी ख़्वाब को बस हक़ीक़त बना दो
ज़रा ख़ुश्बुओं की हवा फिर चला दो
क्यूँ आँखों से ओझल हो तुम
सनम मेरी मंज़िल हो तुम