प्रमाण-पत्र
डॉ. शैलेश शुक्ला
अजय मेहता तीन साल से उसी दफ़्तर में था जहाँ रमाकांत वर्मा क्लर्क था।
रमाकांत की फ़ाइलें हमेशा अजय की मेज़ से होकर गुज़रती थीं—और हमेशा देरी से।
एक दिन अजय ने धीरे से कहा, “रमाकांतजी, यह फ़ाइल दस दिन से रुकी है।”
“तुम मुझ पर दबाव बना रहे हो?”
“नहीं, बस काम की बात . . .”
“मैं अनुसूचित जाति से हूँ। तुम जैसे लोग हमें दबाते ही आए हो। SC/ST एक्ट जानते हो?”
अजय की साँस रुक गई। वह जानता था—मामला दर्ज़ होते ही नौकरी ख़तरे में पड़ जाएगी, चाहे वह कितना भी निर्दोष हो।
उसने माफ़ी माँग ली।
अगले हफ़्ते रमाकांत ने अजय की सीट के पास खड़े होकर ज़ोर से कहा, “मेरे मेज़ पर चाय रखा करो। साहब के लिए भी।”
अजय ने चाय रखी।
यह सिलसिला चलता रहा। छोटी-छोटी बातें—कभी फ़ाइल उठा दो, कभी गाड़ी बुलवा दो, कभी सर के सामने बुरा मत बोलो—और हर बार वही ढाल।
एक दिन अजय के पिता आए दफ़्तर। देखा बेटे को—सिर झुकाए, आँखें नम।
“क्या हुआ?”
“कुछ नहीं, बाबूजी।”
“झूठ मत बोल।”
अजय ने सब बताया।
बाबूजी देर तक चुप रहे। फिर बोले, “बेटा, जब ज़ुल्म उठाने वाला चुप रहे, तो ज़ुल्म करने वाले को लगता है—यही उसका हक़ है।”
अजय ने अगले दिन अफ़सर को लिखित शिकायत दी—नाम, तारीख़, घटना। सब कुछ।
रमाकांत ने SC/ST एक्ट की धमकी दी।
अजय ने कहा, “दीजिए। मैंने भी वकील से बात कर ली है।”
रमाकांत उस दिन से चुप हो गया।
अधिकार और दादागिरी में फ़र्क होता है—पर यह फ़र्क तभी दिखता है जब सामने वाला डरना बंद कर दे।