मुफ़्त की सरकार
डॉ. शैलेश शुक्ला
चुनाव से तीन महीने पहले नेताजी का ट्रक गाँव में आया।
उस पर लिखा था—“जनता का हक़, मुफ़्त में मिलेगा।”
साइकिल बँटी, मोबाइल बँटे, गैस सिलेंडर बँटे। गाँव ख़ुश था।
बुज़ुर्ग रामजतन बाहर नहीं आए। पोते ने पूछा, “दादा, साइकिल नहीं लेनी?”
“नहीं।”
“क्यों?”
“क्योंकि यह साइकिल मेरी नहीं है।”
“मुफ़्त में मिल रही है!”
“मुफ़्त कुछ नहीं होता, बेटा। इस साइकिल की क़ीमत तू चुकाएगा—नौकरी के रूप में जो नहीं आएगी, अस्पताल के रूप में जो नहीं बनेगा, सड़क के रूप में जो नहीं बनेगी।”
पोता चुप हो गया।
वोट के बाद सरकार बनी। गाँव में बिजली अभी भी बारह घंटे ही आती थी। नल में पानी तीन दिन में एक बार। सरकारी स्कूल में मास्टर तीन में से एक ही आता था।
किसी ने नेताजी से पूछा, “यह सब कब ठीक होगा?”
“जनता को तो हमने सब दे दिया—मोबाइल, साइकिल, गैस।”
“पर रोज़गार? शिक्षा? स्वास्थ्य?”
“वह तो अगले चुनाव में देखेंगे।”
रामजतन ने सुना और बोले, “नेता और जादूगर में यही फ़र्क है—जादूगर हाथ की सफ़ाई से तुम्हें ख़ुश करता है, नेता भविष्य की सफ़ाई से।”
गाँव वाले हँसे।
पर उस हँसी में दर्द था—क्योंकि वे जानते थे, रामजतन सच कह रहे हैं।
मुफ़्त देना सेवा नहीं, चालाकी है—जो नेता असली ज़िम्मेदारी से मुँह चुराने के लिए मुफ़्त का तमाशा खड़ा करे, वह जनता का नहीं, अपनी कुर्सी का सेवक है।