मेरी क़लम की आन तिरंगा

01-02-2026

मेरी क़लम की आन तिरंगा

सत्यवान साहब गाज़ीपुरी (अंक: 293, फरवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

धुँधली आँखों काँपते हाथों
धीमे क़दम की जान तिरंगा
सर पे रखू मैं रूह में थामूँ
ख़्वाबों का गुलदान तिरंगा
 
क्यों ये पत्ते वन के झड़ते
आँचल से मौसम छल करते
मर के भी जिस्म में रौशनी बाक़ी
थाम रखा है जान-तिरंगा
 
मौत खड़ी, भौंहें यूँ तानी 
ओले बरसे, रात तूफ़ानी 
छलनी हो चाहे सीना ही 
लड़ता सीना तान तिरंगा
 
धधके जिसके लिए सीना भी 
जिस रज को तरसे मौला भी 
दुनिया बस रंगों को देखें 
अपनी तो पहचान तिरंगा
 
लालच की इक भीड़ का दलदल
निगल रहा ईमान को हर पल
‘साहब’ तुम भी न करना सौदा
मेरी क़लम की आन तिरंगा

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