दगड़ू चला वोट बचाने
कमलेश कंवल
देवकी बाबू के अय्यारों की भाँति मेरी छठी इंद्री मुझे बार बार सचेत कर रही थी कि दगड़ू कुछ न कुछ झमेला करके आया है या करने वाला है। दगड़ू एक खाटी हिन्दुस्तानी दिहाड़ी मज़दूर है जो कभी अन्नदाता हुआ करता था। अब तो दोनों ढूँढ़ता रहता है अन्न भी और दाता भी। जीवन का मौसम कैसा भी हो पर उसका चेहरा सदैव सपाट भारत भूषण के चेहरे की तरह। मजाल है कि आप उसके चेहरे से भाँप सकें कुछ भी। मगर आज न जाने क्यों उतावला था। वो सीधे मेरे बेडरूम में घुस आया था। मेरे सिरहाने तन के खड़ा था। उसे यूँ खड़ा देख कर न चाहते हुए भी मुझे कृष्ण होने की फ़ीलिंग होने लगी थी। बस पैताने दुर्योधन की कमी थी।
“अब कुछ बोलेंगे कि यूँ ही विनोबा भावे बने रहोगे . . .” मैंने आध्यात्मिक मदहोशी को तोड़ते हुए पूछा था।
“वो नासमिटा . . . बलों घर आया था। ये काग़ज़ पत्तर दे गया है . . .” ये कहते हुए दो चार काग़ज़ मेरे बिस्तर पे उसने इस अदा से फेंके मानो वो अमेरिका हो और मेरा बिस्तर नागासाकी हिरोशिमा . . .
“बलो ये कौन होता है . . .?”
“अरे। वो ही कामचोर जो मरे जा रहे है। थोड़ा सा राष्ट्र का काम क्या उनको करना पड़ रहा है . . .”
“अच्छा। बी एल ओ। तो ये एस आई आर के काग़ज़ हैं। अरे मेरे प्यारे दगड़ू। टीवी देखना बंद कर दिया क्या? कितने समझा रहे हैं कि कितना ज़रूरी है। सरल है। एक सरल सा एक पेज का फ़ॉर्म ही तो भरना है। उसमें ही हाय तौबा मचाए हुए हो। जब देश के लिए इतना भी नहीं कर सकते तो लानत है। अरे। तुम तो भाग्यशाली हो कि वो अवतार पुरुष तुम्हारे ग़रीबख़ाने पे पधार कर तुम्हारी झोंपड़ी को पवित्र कर गए हैं। लाखों को तो उन्होंने दफ़्तर में बैठे-बैठे ही निपटा दिया।”
“लेखक बाबू मेरी भी तो सुनो।” घिघियाते हुए दगड़ू बुक्का फाड़ के रोने की मुद्रा में आ गया था, “तीन दिन हो गए बाबू! मजूरी पे नहीं गया हूँ। दर-दर भटक रहा हूँ कि कोई तो मदद कर दे। सुना था पार्टी वाले मदद कर रहे हैं। मगर मेरे को तो तीन-चार दिन से टरका रहे हैं। कल हमारे महल्ले के बड़के नेताजी का छुटका नेता हड़काते हुए कह रहा था—तुम कौन हमको वोट दिए थे जो तुम्हारा काम बड़के नेता करे? अब तुम्हींं बोलो क्या करें, जिसको वोट दिये थे वो तो अभी तक हार के सदमे से बाहर नहीं आया है। और घर में दूसरी ही आफ़त आई हुई है। झुमरी अलग मुँह फुलाए बैठी है। सरकार ने बीवियों को जो ठिकाने लगा दिया है। ससुरी सरकार ने एस आई आर में बीबी को रिश्तेदार तक नहीं माना। ये तो ठीक है कि नहीं माना तो नहीं माना लेकिन ससुरी सास को क्यों मान लिया? झुमरी तो बिफर गई है बर्तज—तुम अगर मुझको न चाहो तो कोई बात नहीं किसी और को चाहोगे तो मुश्किल होगी। ठान के बैठी है कि ‘दस हज़ार तो क्या दस लाख भी दे तो भी मेरी जूती उनको वोट देने वाली नहीं। ले ले मेरे सास ससुर का वोट। हम बहुओं के वोट के बिना जीत के तो दिखा दे। नानी दादी याद नहीं दिला दी तो कहना।’ और जब हम उसको देखे जा रहे थे तो हमको हड़काते हुए बोलने लगी, ‘अब काहे हमको टुकुर टुकुर देखे जाते हो। दो नावों में पैर रखने की आदत छोड़ दो तो ही अच्छा है।’ अब तुम्हीं कहो लेखक बाबू! काहे नहीं घबराएँ हम। इधर मजूरी पे जा नहीं पा रहे और ई ससुरी अलग जान खाए जा रही है। ऐसा लगता है हमरी जोरू का ससुरी सरकार से टाई अप है। दोनों मिल के खाए जात है हमका। याद है लेखक बाबू। पिछले वर्ष हम मिलवाए रहे उ से आपको मेले में। अरे वही अपना अब्दुलवा। कचहरी की तरफ़ से अभी आपके यहाँ आई रहे थे तो ससुरा वही खड़ा था। बोल रहा था कोई कागज बनवाना है कचहरी से। ससुरे तीन दिन हो गए। कोई ठौर-ठिकाना नजर नहीं आ रहा। मजूरी अलग मारी जा रही है। घरवाली भी पेट से है सो वो भी नहीं जा पा रही कमाने। सबको खाया जा रहा है ये डर कि कही वोटवा कट न जाए। वोट ही नहीं रहा तो क्या बचेगा? न कोई साड़ी देगा न दारू बाँटेंगे, न खातों में खटा खट रुपए आयेंगे और नहीं मुफ्त का अनाज मिलेगा और नहीं मुफ्त की बिजली। सो लेखक बाबू। हम तो सोच लिए है कि कुछ भी हो जाए मगर अपना वोट कटने नहीं देना है। वैसे बड़ा जुल्म हुई रहा है बाबू।”
डमरू के शराबी बाप की करतूतों का मुआवज़ा डमरू को भुगतना पड़ रहा है। उसके मतारी और बाप दोनों दारूबाज़ी में लगे रहे होंगे। वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाए ही नहीं। अब सज़ा भुगतेगा अपना डमरू। लिखा पढ़ा है नहीं सो दूसरे काग़ज़-पत्तर भी नहीं है। अब जब वोट ही नहीं रहेगा तो क्या करेगा वो जीके। न दारू न दवा न साड़ी न अनाज कुछ भी नहीं मिलना उसको . . . मेरा सारा देवत्व उड़न छू हो चला था। अपनी खड़ाऊ पैर में डाल कर मैं चल पड़ा था दगड़ू को साथ लेकर चौराहे की ओर जहाँ लोग-बाग धरने पे बैठे हुए थे।