बी. एल. गौड़ के उपन्यास ‘अक्सर लौटना नहीं होता’ में अभिव्यक्त विविध सांस्कृतिक आयाम

15-03-2026

बी. एल. गौड़ के उपन्यास ‘अक्सर लौटना नहीं होता’ में अभिव्यक्त विविध सांस्कृतिक आयाम

डॉ. शैलेश शुक्ला (अंक: 294, मार्च द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

डॉ. शैलेश शुक्ला
वैश्विक समूह संपादक
सृजन संसार अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह
आशियाना, लखनऊ - 226012, उत्तर प्रदेश
ईमेल पता : PoetShailesh@gmail.com 

सारांश

प्रस्तुत शोध पत्र सुपरिचित कवि एवं कहानीकार डॉ. बी. एल. गौड़ के प्रथम उपन्यास ‘अक्सर लौटना नहीं होता’ (प्रकाशन: आईसेक्ट पब्लिकेशन, भोपाल, 2025) में निहित विविध सांस्कृतिक आयामों का समीक्षात्मक विश्लेषण करता है। यह उपन्यास अपनी आत्मपरक-संस्मरणात्मक शैली में समकालीन भारतीय जीवन के उन जटिल सांस्कृतिक प्रश्नों को उठाता है जो वैश्वीकरण, नगरीकरण और प्रवासी-प्रवृत्ति के इस युग में अत्यन्त प्रासंगिक हो गए हैं। उपन्यास की केन्द्रीय सांस्कृतिक समस्या यह है कि भौतिक समृद्धि की अन्धी दौड़ में मनुष्य अपनी मूल संस्कृति, परम्परागत संस्कारों और पारिवारिक जड़ों से विच्छिन्न होता जा रहा है। इस विच्छेद का सर्वाधिक मार्मिक चित्रण उन वृद्ध माता-पिता के एकाकीपन में मिलता है जिनकी संतानें विदेश में बसकर अपनी जड़ों से कट जाती हैं।

उपन्यास में सांस्कृतिक आयामों की बहुलता है। पारिवारिक संस्कृति के क्षरण के साथ-साथ उसकी वैकल्पिक पुनर्रचना का चित्रण उपन्यास को मात्र समस्या-प्रधान नहीं रहने देता। ब्रज लोकगीत, गृहप्रवेश की परम्पराएँ, रक्षाबन्धन का पर्व और विवाह-संस्कार—ये सब भारतीय लोक-संस्कृति के जीवन्त चित्र हैं। प्रवासी भारतीयों (NRI) की सांस्कृतिक दुविधा—बाहर से पश्चिमी और भीतर से भारतीय—उपन्यास में गहरे द्वन्द्व के रूप में उपस्थित है। माता-पिता और सन्तान की पीढ़ियों के बीच सांस्कृतिक मूल्यों की खाई भी उपन्यास का एक महत्त्वपूर्ण आयाम है। इसके अतिरिक्त, ऋषिकेश के आश्रम-प्रसंग में वैदिक वानप्रस्थ-सिद्धान्त की आधुनिक पुनर्व्याख्या उपन्यास को दार्शनिक गहराई प्रदान करती है। प्रस्तुत शोध पत्र उपन्यास के प्रामाणिक उद्धरणों एवं पृष्ठ संदर्भों के आधार पर इन सभी सांस्कृतिक आयामों की क्रमबद्ध व्याख्या करता है।

बीज शब्द:

सांस्कृतिक आयाम, पारिवारिक संस्कृति, प्रवासी द्वन्द्व, लोक-परम्परा, वानप्रस्थ, आध्यात्मिकता, पीढ़ीगत संघर्ष।

1. प्रस्तावना

हिन्दी उपन्यास साहित्य की परम्परा में सांस्कृतिक चेतना सदा से केन्द्रीय रही है। जहाँ प्रेमचन्द ने ग्रामीण-सामाजिक संस्कृति को अभिव्यक्ति दी, वहीं समकालीन उपन्यासकारों ने महानगरीय सांस्कृतिक विखण्डन को अपना विषय बनाया है। इसी क्रम में डॉ. बी. एल. गौड़ का उपन्यास ‘अक्सर लौटना नहीं होता’ अपनी आत्मपरक-संस्मरणात्मक शैली में आधुनिक भारत की उस सांस्कृतिक विडम्बना को सामने रखता है, जिसमें वृद्ध माता-पिता संतानों के विदेश-प्रवास के कारण एकाकी और सांस्कृतिक रूप से निराश्रित हो जाते हैं।

उपन्यास की भूमिका में समीक्षक ममता कालिया ने सटीक दृष्टि से लिखा है—

“कुशल वास्तुकार की तरह गौड़ जी ने इस कथा में कई देश-संस्कृतियों और आचार-व्यवहार दिखा दिए हैं।1

तथा प्राक्कथन लेखक आलोक उन्नियाल ने स्पष्ट किया—

“यह कृति महानगरों के वयोवृद्ध जन के एकाकीपन व मानसिक संघर्ष को प्रतिबिम्बित करती है, साथ ही युवा वर्ग में विदेश-जीवन के आकर्षण व भौतिकवाद में लिप्त होने के फलस्वरूप रिश्तों में टूटन का अहसास कराती है।2

यह उपन्यास संस्कृति के बहुस्तरीय आयामों—परिवार, संस्कार, लोक-परम्परा, पीढ़ीगत द्वन्द्व, प्रवासी जीवन, आध्यात्मिक चेतना और सम्बन्धों की ऊष्मा—को एकसाथ समेटता है। प्रस्तुत शोध पत्र इन्हीं सांस्कृतिक आयामों को उपन्यास के आन्तरिक साक्ष्य के आधार पर विश्लेषित करने का प्रयास है।

2. उपन्यास का परिचय एवं कथा-परिवेश

‘अक्सर लौटना नहीं होता’ की कथावस्तु आत्मपरक (First Person Narrative) शैली में प्रस्तुत की गई है। कथानायक सचिन शर्मा अपने मित्र नारंग जी (रमेश चन्द्र नारंग) की जीवन-व्यथा को केन्द्र में रखकर समकालीन भारतीय समाज की सांस्कृतिक परतों को उघाड़ता है। नारंग जी रेलवे के इंजीनियरिंग विभाग में जम्मू-उधमपुर रेल प्रोजेक्ट पर कार्यरत थे।3 उनकी पत्नी नीलिमा की मृत्यु हो चुकी है और दोनों संताने—पुत्र निखिल तथा पुत्री नीता—विदेश में बस गई हैं। नारंग जी दिल्ली के अपने फ्लैट में अकेले जीवन व्यतीत करते हैं। नायक सचिन और उनकी पत्नी सुधा इस वृद्ध मित्र के लिए एक सांस्कृतिक परिवार का निर्माण करते हैं।

उपन्यास में तीन सांस्कृतिक भूगोल एक साथ सक्रिय रहते हैं—दिल्ली की महानगरीय संस्कृति, अमेरिका-प्रवासी भारतीयों की द्विधा-संस्कृति और ऋषिकेश-ओंकारेश्वर जैसे तीर्थ-स्थलों की आध्यात्मिक संस्कृति। इन तीनों भूगोलों का संयोजन उपन्यास को सांस्कृतिक दृष्टि से असाधारण रूप से समृद्ध बनाता है। लेखक स्वयं स्वीकार करते हैं कि इस उपन्यास का बीज उनके फेसबुक पर प्रकाशित ‘कुहासे के पार’ नामक धारावाहिक एपिसोड से पड़ा, जिसे साहित्यिक मित्रों ने अत्यन्त सराहा और जो अन्ततः 100 पृष्ठों की यात्रा पूरी कर एक उपन्यास का रूप ले सका।4

3. पारिवारिक संस्कृति का अपरदन और वैकल्पिक परिवार

भारतीय सभ्यता की आधारशिला सदा से संयुक्त परिवार की संस्कृति रही है। परिवार केवल सामाजिक इकाई नहीं, बल्कि सांस्कृतिक निरन्तरता का वाहन भी है। इस उपन्यास में परिवार की यह संस्कृति दो धरातलों पर अभिव्यक्त होती है—पहला, उसका क्षरण और दूसरा, उसकी वैकल्पिक पुनर्रचना। नारंग जी की स्थिति उस त्रासदी का प्रतीक है जब आधुनिकता और वैश्वीकरण की लहर में संताने अपने बूढ़े माता-पिता को अकेला छोड़ विदेश में बस जाती हैं।

इस पारिवारिक रिक्तता को नायक सचिन शर्मा और सुधा मिलकर भरते हैं। वे नारंग जी के लिए एक वैकल्पिक परिवार का सृजन करते हैं जो रक्त-सम्बन्ध से नहीं, बल्कि प्रेम, दायित्व और मानवीय स्नेह से बना है। यह वैकल्पिक परिवार भारतीय सांस्कृतिक परम्परा के उस तत्त्व को जीवित रखता है जिसे ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना कहते हैं। धीरे-धीरे नारंग जी की बेटी नीता भी इस परिवार का हिस्सा बन जाती है और सुधा उसकी माँ जैसी बन जाती है।

उपन्यास के उत्तरार्ध में नारंग जी और नीता के सचिन-सुधा के घर में स्थानान्तरित हो जाने का प्रसंग पारिवारिक संस्कृति के पुनर्निर्माण का प्रतीकात्मक चरण है। भारतीय परिवार में माता-पिता, बच्चे और मित्र-परिवार एक साथ जीते हैं—यह मूल्य यहाँ पुनः स्थापित होता है। इस वैकल्पिक परिवार की रचना में सुधा की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय है क्योंकि भारतीय संस्कृति में गृहस्वामिनी ही परिवार की धुरी होती है।

4. लोक-संस्कार एवं रीति-रिवाजों का सांस्कृतिक आयाम

भारतीय संस्कृति की जीवन्तता उसके लोक-संस्कारों और रीति-रिवाजों में निहित है। विवाह, गृहप्रवेश, राखी-बन्धन, पूजा-हवन आदि संस्कार केवल धार्मिक कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक बंधन हैं जो पीढ़ियों को एकसूत्र में बाँधते हैं। इस उपन्यास में इन सांस्कृतिक संस्कारों के अत्यन्त जीवन्त और प्रामाणिक चित्र मिलते हैं।

नायक के पुत्र श्रीधर और सुनयना के विवाह के अवसर पर जो सांस्कृतिक दृश्य उपस्थित होता है वह अत्यन्त भावपूर्ण है। मन्दिर में पूजा-हवन के पश्चात् सुनयना के गृहप्रवेश का वर्णन करते हुए कथानायक लिखता है कि द्वार पर आम के पत्तों का बन्दनवार बँधा है, चौखट पर चावल से भरा कलश और थाल में महावर का पानी भरा रखा है।5 यह दृश्य देखकर नायक स्वयं 40 वर्ष पूर्व के अपने गाँव के उस आँगन में पहुँच जाता है जब उसकी पत्नी सुधा दुल्हन बनकर घर आई थी।

इसी प्रसंग में ब्रज की लोक-संस्कृति का अत्यन्त मर्मस्पर्शी उल्लेख है। नायक स्मरण करता है कि उस दिन कुनबे की चाची-ताइयों के अलावा दोनों बहनें, चाची, बुआ और मौसी आदि की पूरी भीड़ थी और ब्रज के लोकगीतों का साहित्य में कोई सानी नहीं है—

“तेरी पायल की झनकार दुल्हनियाँ करती वन बेजार।6

विवाह के अवसर पर सभी महिलाओं को चाय के बाद सुधा ने प्रसाद स्वरूप एक-एक डिब्बा मिठाई देकर विदा किया और साथ ही आने वाले रविवार को रिसेप्शन में आने का अनुरोध किया।7 यह आतिथ्य-संस्कृति भारतीय परम्परा का अविभाज्य अंग है। जब श्रीधर अपनी माँ सुधा को बताता है कि वह सुनयना की माँ से उसका हाथ माँगने गया था8 तो सुनयना की माँ का यह कथन—‘बेटा! तुम दोनों एक-दूसरे को चाहते हो तो मैं कौन होती हूँ रोकने वाली। लेकिन मेरी एक बात माननी पड़ेगी। कल हम मन्दिर चलेंगे, वहाँ तुम दोनों का विधि-विधान से गठबन्धन होगा’ — भारतीय माँ की उस सांस्कृतिक दृष्टि का प्रतिनिधित्व करता है जो आधुनिकता को स्वीकार करते हुए भी संस्कारों की रक्षा करती है।

5. रक्षाबन्धन और कृत्रिम रिश्तों में सांस्कृतिक ऊष्मा

भारतीय संस्कृति में रक्षाबन्धन केवल भाई-बहन का पर्व नहीं, बल्कि सम्बन्धों की सांस्कृतिक स्वीकृति का उत्सव है। इस उपन्यास में रक्षाबन्धन का प्रसंग असाधारण सांस्कृतिक महत्त्व रखता है क्योंकि यहाँ यह पर्व एक ऐसे रिश्ते को औपचारिकता प्रदान करता है जो रक्त से नहीं, स्नेह से जन्मा है। नारंग भाई अपने बेडरूम से कलावे का गोला लेकर आते हैं और सुधा से कहते हैं—

“सुधा! शायद तू भूल गई कि आज रक्षाबन्धन है और इससे पहले भी हम दोनों ने अपना फर्ज कभी नहीं निभाया, चल अब मुझे राखी बाँध।9

सुधा नारंग भाई के हाथ में कलावा लपेट रही थी और उसकी आँखें एक नए रिश्ते की कहानी लिख रही थीं। कलावा बाँधते ही नारंग भाई ने सुधा की हथेली पर सोने की एक भारी चेन रख दी। यह दृश्य भारतीय संस्कृति की उस विशेषता को रेखांकित करता है जिसमें भावनात्मक सम्बन्ध संस्कारों के माध्यम से औपचारिक रूप लेते हैं। रक्षाबन्धन यहाँ केवल पर्व नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक अनुष्ठान है जो दो असम्बद्ध व्यक्तियों के बीच भाई-बहन के पवित्र बन्धन को स्थापित करता है।

6. प्रवासी भारतीयों और भारतीय संस्कृति का द्वन्द्व

इस उपन्यास का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक आयाम प्रवासी भारतीयों (NRI) और उनकी सांस्कृतिक जड़ों के बीच का तनाव है। नारंग जी के पुत्र निखिल और पुत्री नीता—दोनों अमेरिका में बस गए हैं। नीता सैन फ्रांसिस्को में रहती है और उसने एक अमेरिकन पुरुष एल्बर्ट से विवाह किया है। जब नायक और सुधा अमेरिका यात्रा के दौरान नीता से मिलने जाते हैं तो वह सफेद फर जैकेट और जींस में है—पश्चिमी जीवनशैली को पूरी तरह आत्मसात किए हुए। किन्तु नीता उनके पाँव छूने की कोशिश करती है—यह एक ऐसा संस्कार है जो पश्चिमी जीवनशैली के बीच भी जीवित रहता है।

नारंग जी के पुत्र निखिल जब अपनी बहन नीता के तलाक के बारे में सुनते हैं तो उनकी प्रतिक्रिया अत्यन्त ठंडी और उदासीन होती है। यह पश्चिमी व्यक्तिवाद की वह सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है जहाँ परिवार के सदस्यों के प्रति भावनात्मक जिम्मेदारी कम हो जाती है। उपन्यास में सचिन के मित्र के पुत्र श्रीधर और उनके सहयोगी इस बात को महसूस करते हैं—

“हमने विदेश में सैटल होने की सोच को जन्म देकर जिन्दगी में एक बड़ी भूल कर डाली और अपनी जिन्दगी के कई अमूल्य वर्ष व्यर्थ में गँवा दिए। आज क्या नहीं है अपने देश में। हमारी लालच हमें अपनों से दूर समन्दर पार ले जाती है।10

यह स्वीकारोक्ति भारतीय प्रवासी-संस्कृति के उस मर्मस्पर्शी सत्य को उजागर करती है जहाँ भौतिक उपलब्धि तो होती है किन्तु सांस्कृतिक और भावनात्मक मूल्यों का क्षरण होता रहता है। उपन्यास इस प्रश्न को बड़ी गहराई से उठाता है कि क्या वैश्वीकरण के इस दौर में भारतीय अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए रख सकते हैं?

7. पीढ़ीगत संघर्ष और माता-पिता की उपेक्षा का सांस्कृतिक संकट

भारतीय समाज परिवर्तन की जिस धारा में बह रहा है उसमें वृद्ध माता-पिता और युवा पीढ़ी के बीच सांस्कृतिक मूल्यों की खाई निरन्तर बढ़ रही है। उपन्यास का नायक जब अपनी पत्नी सुधा की उस मनोव्यथा को देखता है जिसमें उसे लगने लगा है कि ‘रिश्तों में गर्माहट न जाने कहाँ काफूर हो गई है’ तो वह उत्तर देता है—

“रिश्तों में प्यार और अपनेपन का स्थान कर्तव्यों ने ले लिया है, जिन्हें हम प्रेम के वशीभूत न होकर समाज की लोकलाज के निभाते हैं।11

यह कथन भारतीय पारिवारिक संस्कृति के उस सत्य को उजागर करता है जहाँ सम्बन्ध आत्मीयता से नहीं, औपचारिकता से निभाए जाते हैं। नायक इस सांस्कृतिक परिवर्तन को ‘प्राकृतिक नियम’ के रूप में समझाता है—

“हम सब अपने-अपने सर्कल बनाकर जीते हैं। एक समय हम अपने सर्कल के केन्द्र में होते हैं और हमारी परिधि पर होते हैं हमारे अपने और समय बीतने पर हमारे वे अपने उस परिधि से अलग होकर स्वयं अपने-अपने गोल घेरों का निर्माण करते हैं।12

किन्तु उपन्यासकार एकपक्षीय दोषारोपण नहीं करते—वे माता-पिता की अपेक्षाओं पर भी प्रश्न उठाते हुए कहते हैं—

“गलती दोनों ओर से होती है। माता-पिता को सोचना चाहिए कि उन्होंने कुछ अलग नहीं किया। अपनी संतान को अपने से कहीं अधिक आगे ले जाने की प्रबल इच्छा हर माता-पिता की होती है, यह संतान पर कोई एहसान नहीं होता।13

यह सन्तुलित दृष्टि उपन्यास को एकांगी नहीं बनने देती। पीढ़ीगत संघर्ष के इस सांस्कृतिक संकट में उपन्यासकार मानवीय संवेदनशीलता का पक्ष लेते हुए यह सन्देश देते हैं कि परस्पर सम्मान और थोड़ी भावनात्मक उपस्थिति से यह दूरी पाटी जा सकती है।

8. आध्यात्मिक संस्कृति और वानप्रस्थ की आधुनिक प्रासंगिकता

इस उपन्यास का सबसे गहरा और दार्शनिक सांस्कृतिक आयाम आध्यात्मिक संस्कृति से सम्बन्धित है। जब नारंग जी जीवन से उकता जाते हैं तब नायक उन्हें अपने साथ ऋषिकेश ले जाता है। इस यात्रा में चिदानन्द आश्रम का वर्णन भारत की तीर्थ-संस्कृति का सुन्दर चित्र प्रस्तुत करता है।14

ऋषिकेश प्रसंग में सबसे महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक उद्भावना वह है जब स्वामी योगानन्द वैदिक जीवन-दर्शन की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि हमारे वेदों और पुराणों में जीवन जीने के तरीके को विस्तार से बताया गया है—

“जीवन की अवधि को सौ बरस मानकर चार चरणों (आश्रमों) में बाँटा गया है—25 बरस तक शिक्षा, ब्रह्मचर्य, विवाह आदि। 25 से 50 तक गृहस्थ अर्थात् धन का अर्जन, परिवार का विस्तार और उसके बाद 50 से 75 बरस की यात्रा वानप्रस्थ की यात्रा कहलाती है।15

स्वामी जी आगे स्पष्ट करते हैं कि इस यात्रा को साधारण मनुष्य ठीक से तय नहीं कर पाते।16 वे अपने अधिकार आने वाली पीढ़ी को आसानी से सौंप नहीं पाते। यह वैदिक वानप्रस्थ-सिद्धान्त उपन्यास में आधुनिक जीवन के सन्दर्भ में पुनर्व्याख्यायित होता है। कथाकार केवल आधुनिक समस्याओं को चित्रित नहीं करते, बल्कि प्राचीन भारतीय जीवन-दर्शन में उनका समाधान भी खोजते हैं।

स्वामी जी का नारंग जी को परामर्श—अपने बेटे को फोन कर बेटी के विषय में पूछें17—यह दृश्य आध्यात्मिक चेतना और पारिवारिक संस्कृति का सुन्दर समन्वय है। तीर्थ-यात्रा यहाँ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि टूटे हुए परिवार को जोड़ने का माध्यम भी बन जाती है। एक अमेरिकन स्त्री भगवती चिदानन्द आश्रम में योग प्रशिक्षण के लिए आती है और भारतीय संस्कृति से इतनी प्रभावित हो जाती है कि वह सदैव के लिए भारत में ही बस जाने का निर्णय ले लेती है—यह प्रसंग भारतीय आध्यात्मिक संस्कृति की उस सार्वभौमिक आकर्षण-शक्ति को रेखांकित करता है जो विदेशियों को भी अपनी ओर खींचती है।

9. स्मृति, काल और सांस्कृतिक अनुभव

उपन्यास में स्मृति सांस्कृतिक चेतना की एक महत्त्वपूर्ण संरचना के रूप में उभरती है। भारतीय संस्कृति में अतीत केवल बीता समय नहीं, बल्कि वर्तमान में जीवन्त उपस्थिति है। नायक जब सुनयना का गृहप्रवेश देखता है तो उसे अपनी पत्नी के गृहप्रवेश की स्मृति 40 वर्ष पूर्व उसे वर्तमान से जोड़ देती है। यह सांस्कृतिक स्मृति ही है जो पीढ़ियों के बीच सेतु का काम करती है।

नायक की पत्नी सुधा जब कहती है—

“क्या आप भी महसूस करते हो कि जिन्दगी अब पहले जैसी नहीं रह गई। रिश्तों की गर्माहट न जाने कहाँ काफूर हो गई है। रिश्तों में प्यार और अपनेपन का स्थान कर्तव्यों ने ले लिया है।18

—तो यह केवल उसकी व्यक्तिगत पीड़ा नहीं, बल्कि समकालीन भारतीय सांस्कृतिक जीवन की सामूहिक व्यथा है। नायक की एक पुरानी कविता की पंक्तियाँ सुधा उद्धृत करती हैं—‘जिन्दगी से ले गया अमृत चुराकर कौन?’—यह काव्यात्मक संस्कृति उपन्यास को केवल गद्य-कृति नहीं रहने देती। नायक इसका उत्तर देते हुए कहता है—

“सुधा! दरअसल जिन्दगी से अमृत कोई चुराकर नहीं ले जाता, बल्कि वह चोरी हो जाता है और जो अमृत चुराकर ले जाता है उस चोर का नाम है ‘समय’।19”

यह कथन भारतीय दार्शनिक परम्परा में काल के महत्त्व की उस चेतना को प्रतिबिम्बित करता है जो संस्कृत-साहित्य से लेकर सूफी-काव्य तक विद्यमान है।

10. निष्कर्ष

बी. एल. गौड़ का उपन्यास ‘अक्सर लौटना नहीं होता’ सांस्कृतिक आयामों की दृष्टि से एक बहुस्तरीय और समृद्ध कृति है। इसमें भारतीय संस्कृति के वे सभी तत्त्व उपस्थित हैं जो समकालीन जीवन में संकटग्रस्त हैं—पारिवारिक एकता, लोक-परम्परा के संस्कार, पीढ़ीगत सेतु, प्रवासी भारतीयों का सांस्कृतिक द्वन्द्व और आध्यात्मिक जीवन-दर्शन। उपन्यास न केवल इन संकटों को चित्रित करता है बल्कि मानवीय प्रेम, मित्रता और आत्मीय सम्बन्धों के माध्यम से उनके समाधान की ओर भी संकेत करता है।

यह उपन्यास इस मर्मस्पर्शी सत्य को प्रतिपादित करता है कि सांस्कृतिक जड़ों से विच्छिन्न होकर जीवन अधूरा और अर्थहीन हो जाता है। नारंग जी का एकाकीपन उस सांस्कृतिक रिक्तता का प्रतीक है जो तब उत्पन्न होती है जब परिवार के सदस्य अपनी जड़ों से कट जाते हैं। इसके विपरीत, सचिन-सुधा का जीवन उस सांस्कृतिक समृद्धि का उदाहरण है जो परम्परा, संस्कार और मानवीय सम्बन्धों के सन्तुलन से उत्पन्न होती है।

भूमिका में ममता कालिया ने जो कहा—

“मिल-जुल सभ्यता में तालमेल के संकट उपन्यास की गति बनाए रखते हैं।20

—यह इस उपन्यास के सांस्कृतिक स्वर का सटीक सारांश है। कथाकार डॉ. बी. एल. गौड़ ने अपनी आत्मपरक-संस्मरणात्मक शैली में एक ऐसे उपन्यास की रचना की है जो पाठक को अपनी सांस्कृतिक पहचान, अपनी जड़ों और अपने सम्बन्धों के प्रति सजग करता है। लोक-संस्कार से लेकर वेदान्त दर्शन तक, परिवार से लेकर प्रवास तक—यह उपन्यास भारतीय सांस्कृतिक जीवन का एक सम्पूर्ण और प्रामाणिक दस्तावेज है। ‘अक्सर लौटना नहीं होता’—यह शीर्षक ही एक सांस्कृतिक उक्ति है। जो अपनी संस्कृति, अपने परिवार और अपनी जड़ों से एक बार विच्छिन्न हो जाता है, उसके लिए वापसी सदा सम्भव नहीं होती।

संदर्भ सूची (APA शैली)

  1. कालिया, ममता. (2025). भूमिका. बी. एल. गौड़, अक्सर लौटना नहीं होता (पृ. 5-6). आईसेक्ट पब्लिकेशन, भोपाल.

  2. उन्नियाल, आलोक. (2025). प्राक्कथन. बी. एल. गौड़, अक्सर लौटना नहीं होता (पृ. 9). आईसेक्ट पब्लिकेशन, भोपाल.

  3. गौड़, बी. एल. (2025). अक्सर लौटना नहीं होता (पृ. 13). आईसेक्ट पब्लिकेशन, भोपाल. ISBN: 978-93-48854-40-7

  4. गौड़, बी. एल. (2025). अपनी बात. अक्सर लौटना नहीं होता (पृ. 11-12). आईसेक्ट पब्लिकेशन, भोपाल.

  5. वही (पृ. 69).

  6. वही (पृ. 69).

  7. वही (पृ. 70).

  8. वही (पृ. 68).

  9. वही (पृ. 85).

  10. वही (पृ. 90).

  11. वही (पृ. 101).

  12. वही (पृ. 96).

  13. वही (पृ. 100).

  14. वही (पृ. 91).

  15. वही (पृ. 94).

  16. वही (पृ. 94).

  17. वही (पृ. 93).

  18. वही (पृ. 97).

  19. वही (पृ. 98).

  20. वही (पृ. 6).

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