राम तुम्हारा वृत्त स्वयं ही काव्य है… 17 Apr, 2019

राम तुम्हारा वृत्त स्वयं ही काव्य है…

राम तुम्हारा वृत्त स्वयं ही काव्य है…

हिन्दी राइटर्स गिल्ड की अप्रैल, 2019 मासिक गोष्ठी

 

’हिन्दी साहित्य में राम के विभिन्न रूप’ विषय पर इस शनिवार, 13 अप्रैल 2019 को हिन्दी राइटर्स गिल्ड ने अपनी मासिक गोष्ठी में एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया। रामनवमी के पावन अवसर पर हुई इस चर्चा में भाग लेने के लिए लगभग 40 लोग इस कार्यक्रम में उपस्थित थे। (हिन्दी राइटर्स गिल्ड की मासिक गोष्ठियाँ महीने के दूसरे शनिवार को 1:30 से 4:30 बजे तक स्प्रिंगडेल शाखा, ब्रैम्पटन में आयोजित होती हैं)

 कार्यक्रम का संचालन डॉ. शैलजा सक्सेना ने सँभाला और सभी उपस्थित लेखकों तथा श्रोताओं का स्वागत किया। उन्होंने रामनवमी तथा वैसाखी के पावन पर्वों की शुभकामनाएँ देते हुए भारत से पधारे वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामेश्वर काम्बोज ’हिमांशु’ जी तथा गिल्ड से जुड़े नए हिन्दी प्रेमियों के प्रति विशेष आभार प्रकट किया। कार्यक्रम की रूपरेखा स्पष्ट करते हुए उन्होंने बताया कि आज दो सत्र होंगे। पहले सत्र में ’हिन्दी साहित्य में राम के विभिन्न रूप’ पर चर्चा होगी तथा दूसरे सत्र में रचनाएँ, गीत, ग़ज़लें आदि होंगी।

विषय की प्रस्तावना करते हुए डॉ. शैलजा ने मध्यकाल में तुलसी के सगुण राम और कबीर के निर्गुण राम के आकार-प्रकार में अंतर की अपेक्षा दोनों भक्त कवियों के प्रेम और समर्पण भाव की समानता को अधिक महत्त्वपूर्ण ठहराया। उन्होंने कबीर की राम यानी परमशक्ति राम के प्रति समर्पण की पराकाष्ठा को इस दोहे से रेखांकित किया: 

 “मैं तो कूता राम का, मुतिया मेरा नाँव। 
गले राम की जेवड़ी, जित खींचे तित जाँव”

मध्यकाल के बाद मैथिलीशरण गुप्त जी की ’साकेत’ और फिर निराला की ’राम की शक्तिपूजा’ की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि राम के भीतर आधुनिक मनुष्य की उद्भावना निराला ने की और राम से कहलवाया; ’धिक जीवन जो पाता ही आया विरोध/ धिक साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध’! उन्होंने कहा कि राम द्वारा अपने जीवन को धिक्कार कर, अपने को साधनहीन कहने में एक आम आदमी की पीड़ा दिखाई देती है, सर्वशक्तिशाली भगवान की नहीं। राम के भीतर इसी मानवीयता को प्रश्न और संशय के रूप में श्री नरेश मेहता ने अपने काव्य ’संशय की एक रात’ में दिखाया है जहाँ राम, अपनी व्यक्तिगत समस्या, सीता-हरण पर एक पूरी सेना को मृत्यु की संभावना पर ले जाकर नहीं खड़ा करना चाहते । डॉ. शैलजा ने श्री नरेश मेहता द्वारा गढ़ी राम की मानवीय छवि की बात करते हुए डॉ. नरेन्द्र कोहली के रामकथा पर आधारित उपन्यास की भी चर्चा की जिसमें राम अद्भुत प्रबंधनकर्ता (मैनेजर) दिखाई देते हैं। सर्व-साधन संपन्न लंकेश्वर रावण से साधनहीन आदिवासी जनता को लड़ने के लिए की गई तैयारी को जिस बारीक़ी और गहराई से कोहली जी के राम सँभालते हैं, वह आज के ’मैनेजमेंट’ विद्यार्थियों के लिए भी उपयोगी है।     

आगे चर्चा को विस्तार देने के लिए उन्होंने सर्वप्रथम प्रसिद्ध साहित्यकार श्री रामेश्वर काम्बोज ’हिमांशु’ जी को आमंत्रित किया जिन्होंने श्री नरेश मेहता द्वारा लिखित ’प्रवाद पर्व’ को अपने वक्तव्य का केंद्र बनाते हुए कहा कि इस खंड काव्य में राम राज-नियमों की सत्ता के बीच राजा के बंधन और उससे उत्पन्न पीड़ा को प्रकट करते हुए एक आधुनिक मनुष्य के रूप में दिखाई देते हैं। वे पति रूप में सीता पर संदेह नहीं करते परन्तु राजा के आदर्श को स्थापित करने को भी अपना धर्म समझते हैं। राम जनमानस से उठी हर आवाज़ को ’अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ देना चाहते हैं, हर साधारण जन को भाषा का वह अधिकार देना चाहते हैं जो उन्हें कभी नहीं मिला चाहे इसके लिए उन्हें अपनी प्राण प्रिया को भी छोड़ना पड़े। राम राजा का यह दायित्त्व मानते हैं कि राजा व्यक्तिगत स्वार्थों और सुविधाओं से ऊपर उठा हुआ होना चाहिए। राम का कहना है:

 ’राजभवनों और राजपुरुषों से ऊपर/
राज्य और न्याय/
प्रतिष्ठापित होने दो भरत’

’हिमांशु’ जी के वक्तव्य ने दर्शकों को ’प्रवाद पर्व’ के ’पुराण पुरुष’ राम के लोकनायक रूप से जोड़ा और चर्चा को बहुमुखी बनाया।

 इसके बाद डॉ. इन्दु रायज़ादा जी ने राम पर अपने विचारों से अवगत कराया। साथ ही राम के पति रूप पर संशय जताते हुए मन में उठे कुछ प्रश्नों का ख़ुलासा भी किया। प्रश्न आज के विषय के अनुकूल न होने के कारण चर्चा से अछूते रह गए।

 अगली वक्ता श्रीमती आशा बर्मन जी ने अपने वक्तव्य का आधार ’श्रीरामचरित मानस’ को बनाया। उन्होंने तुलसी द्वारा भाव और भाषा, दोनों को तत्कालीन शास्त्रीय परिभाषाओं से निकाल कर जन-सामान्य से जोड़ने की प्रशंसा की। आशा जी ने कहा कि तुलसी के राम को पूजने के लिए किसी विधि-विधान की आवश्यकता नहीं, उनके राम जन-मन के राम हैं, जिनके लिए तुलसी कहते हैं:  

 ’तुलसी मेरे राम को, रीझ भजो या खीज।
भौम पड़ा जामे सभी, उल्टा सीधा बीज।’

 उनके बाद के वक्ताओं ने राम और उनके गुणों पर लिखित अपनी रचनाएँ तथा वक्तव्य प्रस्तुत किए। श्री सतीश सेठी ने रामराज्य पर रचना पढ़ी तो श्री विद्याभूषण ने अपनी रचना में धरती से आकाश, पौधों से जीव, राम को प्रत्येक वस्तु में विद्यमान बताया। श्री बाल कृष्ण ने राम नाम का महत्व बताते हुए राम धुन या ओम का सही उच्चारण पर बल दिया। श्रीमती प्रमिला भार्गव ने सीता-त्याग से असहमति व्यक्त करते हुए अपनी बात रखी। गिल्ड की सभा में पहली बार उपस्थित हुई श्रीमती अमरजीत कौर ’पंछी’ जी ने गुरुवाणी में राम नाम और भक्ति के महत्व बताते हुए एक सुंदर रचना का पाठ भी किया। श्री अनिल कुन्द्रा जी ने राम नाम के जाप की शक्ति का प्रमाण देते हुए परिवार में घटित सच्ची घटना से अवगत करवाया। श्रीमती कृष्णा वर्मा ने राम के प्रति अपने भाव प्रकट करते हुए कहा कि राम सत्य सनातन है, जीवन का मूल मंत्र हैं, प्रत्येक भोर का स्वर हैं, चरित्र, मर्यादा, शील, संयम और नैतिकता हैं। राम का अनुसरण ही जीवन का सच्चा अर्थ है।

इस कार्यक्रम में पुलिट्ज़र पुरस्कार से सम्मानित श्री बैरी ब्राउन भी, अपनी लोक-संपर्क अधिकारी श्रीमती रेनु मेहता के साथ उपस्थित थे। श्री बैरी ब्राउन ने एक किताब ’द वर्ल्ड बिफ़ोर रिलीजन, वार एंड इनैक्यैलिटी’ लिखी है जिसमें महाभारत के युद्ध को विश्व का पहला बड़ा युद्ध बताया है। उन्होंने अपने संक्षिप्त वक्तव्य में अपनी लंबी रिसर्च और उससे निकले तथ्यों के आधार पर कृष्ण वंशज यादवों से ही ज्यूज़ के होने और ब्राह्मण धर्म से ज्यूडिज़्म के होने को बताया। समय कम होने से वे अगली गोष्ठी में फिर आएँगे और दर्शकों के प्रश्नों के उत्तर भी देंगे।  

 कार्यक्रम के दूसरे सत्र में उन लोगों ने कविता पढ़ी जिन्होंने पहले सत्र में भाग नहीं लिया था। इस का प्रारंभ अखिल भंडारी जी की ग़ज़ल से हुआ जिसे बहुत पसंद किया गया:

’ये माना ज़िन्दगी तो एक सफ़र है
सफ़र में हैं मगर, जाना किधर है’

दूसरी वक्ता थीं, श्रीमती भुवनेश्वरी पांडे, जिन्होंने ’श्री रामचन्द्र कृपालु भज मन हरन भव भय दारुनम’ श्री राम की स्तुति का मधुर गायन किया। तत्पश्चात मन के विभिन्न पहलुओं की पर्तें खोलती सुरजीत कौर जी की कविता ’तपोवन’ ने मन को छू लिया। डॉ. नरेन्द्र ग्रोवर जी ने आज ही के दिन सौ वर्ष पहले घटी जलियाँ वाला बाग की घटना को याद करते हुए सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता ’जलियाँवाला बाग में बसंत’ का पाठ किया। जिसकी पंक्तियाँ थीं:-

’कोमल बालक मरे यहाँ गोली खा कर
कलियाँ उनके लिए गिराना थोड़ी लाकर” 

श्रीमती पूनम चन्द्रा ’मनु’ ने अपनी कविता में रिश्तों के बदलते रूप की बात की:

"जाने ये रिश्ते क्यों चेहरा अपना बदल लेते हैं
भूल जाते हैं जिन्हें पल में ग़ैरों की तरह
वे ही नाम पत्थरों पर साथ लिखे मिलते हैं’

श्रीमती रिंकु भाटिया जी ने अपने मधुर स्वर में एक लोक गीत ’माँए मेरिए नी/ शिमले दी राहे/ चम्बा कितनी दूर’ का गायन कर सबको विभोर किया।

अंत में डॉ. शैलजा ने अपना एक हाइकु – ’लिख वक़्त के/ सीने पे विश्वास की/ नई लिखाई’ कहते हुए सबका धन्यवाद देकर कार्यक्रम का समापन किया।

बदलते मौसम का ख़ूबसूरत सुहाना दिन था। कार्यक्रम आत्मीय-संवाद पूर्ण होने से उपजे आनंद पूर्ण रहा, साथ ही इस पावन पर्व पर गर्मा-गरम चाय, समोसे, बर्फी, लड्डू तथा जलेबियों का सबने भरपूर आनंद उठाया। इस जलपान का प्रायोजन श्रीमती कैलाश महंत, मीनाक्षी सेठी तथा कृष्णा वर्मा ने किया था।  

- प्रस्तुति कृष्णा वर्मा एवं डॉ. शैलजा सक्सेना

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