डॉ. गरिमा संजय दुबे के प्रथम कहानी संग्रह 'दो ध्रुवों के बीच की आस' का लोकार्पण 08 May, 2019

डॉ. गरिमा संजय दुबे के प्रथम कहानी संग्रह 'दो ध्रुवों के बीच की आस' का लोकार्पण

डॉ. गरिमा संजय दुबे के प्रथम कहानी संग्रह 'दो ध्रुवों के बीच की आस' का लोकार्पण

डॉ. गरिमा संजय दुबे के प्रथम कहानी संग्रह 'दो ध्रुवों के बीच की आस' का लोकार्पण

वामा साहित्य मंच की सुपरिचित, लोकप्रिय, युवा लेखिका डॉ. गरिमा संजय दुबे के प्रथम कहानी संग्रह "दो ध्रुवों के बीच की आस" का लोकार्पण एवं चर्चा संगोष्ठी दिनांक 28 अप्रैल 2019 प्रीतम लाल दुआ सभाग्रह, इंदौर में हुआ। समारोह में लेखक व प्रकाशक पंकज सुबीर, वरिष्ठ साहित्यकार मनोहर मंजुल व लेखिका ज्योति जैन ने पुस्तक पर चर्चा की। स्वागत भाषण संस्था की अध्यक्ष पद्मा राजेंद्र ने दिया। आत्मकथ्य में लेखिका ने अपनी रचना प्रक्रिया की जानकारी देते हुए अपनी कहानी में आधुनिक युग की समस्याओं को चित्रित करने की बात की। उन्होंने कहा, "युग बदला है तो समस्याएँ भी बदली हैं, इसलिए हल भी नए होने चाहिए। जीवन में संतुलन का समर्थन करती हूँ लेकिन अतिवाद से बचने का प्रयास रहता है, इसीलिए पुस्तक और एक कहानी का शीर्षक दो ध्रुवों के बीच की आस सूझा।"

ज्योति जैन ने पुस्तक पर अपने विचार रखते हुए कहा, "गरिमा के प्रथम कहानी संग्रह दो ध्रुवों के बीच की आस के प्रथम प्रयास में उनकी कहानियों की परिपक्वता अचंभित करती है।" 

वरिष्ठ पत्र लेखक व साहित्यकार मनोहर मंजुल ने अपने वक्तव्य में कहानियों पर चर्चा करते हुए कहा, "गरिमा की कहानियाँ समाज के विभिन्न दृष्टिकोणों को प्रस्तुत करती हैं। उसकी लेखनी समाज के प्रति उसके दायित्व का बोध कराती है।"

प्रकाशक व लेखक पंकज सुबीर ने लेखिका के कहानीकार स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए कहा, "गरिमा का पहला क़दम सधा हुआ और संतुलित है। इनकी कहानियों में विषयों का विस्तृत संसार है। कहानी संग्रह वही सफल होता है, जिसकी कहानियों के पात्रों की छटपटाहट औऱ बैचैनी पाठक अपने में महसूस करें । वही इनकी कहानियों में देखने को मिला है। कहानियों के विषय की विविधता चकित करती है, और गरिमा ने अपने पहले ही कहानी संग्रह से अपने लिए एक बड़ी रेखा खींची है जिसके आगे बहुत और बहुत सी श्रेष्ठ कृतियों की अपेक्षा बढ़ गई है।" सुबीरजी ने कहा, "इंदौर के साहित्यिक कार्यक्रमों में समय की प्रतिबद्धता, कार्यक्रम के प्रति उत्साह, साहित्य की समय के साथ क़दमताल सीखने लायक़ है।

परिवार के प्रतिनिधि के रूप में डॉ. दीपा मनीष व्यास नेअपने वक्तव्य में गरिमाजी के लिखने से छपने के सफ़र की रोचक और गंभीर चर्चा की।

पंकज सुबीर ने "अब मैं सो जाऊँ", "पन्ना बा" व "जीवन राग" कहानियों के बारे में बात करते हुए कहा कि अब मैं सो जाऊँ आपको बेचैन कर देती है। पन्ना बा में किन्नर जीवन की व्यथा का वर्णन है, और जीवन राग में जीवन की छोटी-छोटी ख़ुशियों व साकार रागात्मकता की बात है। ज्योति जैन ने कहा कि, लिव इन, किन्नर, डूब विषयों पर लेखिका की कहानियाँ गहरे से प्रभावित करती हैं और कहानियों की परिपक्वता व विषयों की विविधता चकित करती है।

इस अवसर पर पारिवारिक मित्रों और संबंधियों के अलावा वरिष्ठ साहित्यकार सरोज कुमार, संजय पटेल, जवाहर चौधरी, सूर्यकांत नागर, डॉ. पद्मा सिंह, सतीश राठी, पुरुषोत्तम दुबे, अश्विनी दुबे,  हरेराम वाजपेयी, प्रदीप नवीन, अशोक शर्मा, सुषमा दुबे समेत नगर के सभी साहित्यकार मौजूद थे। 

अतिथियों का स्वागत मदनलाल दुबे, शांता पारिख, सुभाष चंद्र दुबे, मीनाक्षी रावल, मनीष व्यास तथा भावना दामले ने किया।

सरस्वती वंदना संगीता परमार ने प्रस्तुत की। 

कार्यक्रम का संचालन अंतरा करवड़े ने किया व आभार वसुधा गाडगिल ने माना।

सतीश राठी
आर 451, महालक्ष्मी नगर,
इंदौर452010

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