05-05-2019

ये निरा अकेलापन

विजय प्रताप 'आँसू'

 ये निरा अकेलापन।

 

मन भाये मीत कुछ, अन गाये गीत कुछ –
चेतना की कोठरी में सेंध जब लगाते हैं
आँसुओं की पोटली में छेद कुछ बनाते हैं
और बेध जाता है शाम का सवेरापन।
ये निरा अकेलापन।

 

रात के अँधेरे में, चाँदनी के डेरे में –
पुरवईया बाँसुरिया प्रेम–धुन सुनाती है
साँस मेरी बावरिया दर्द गुनगुनाती है
और जागते दृगों में स्वप्न का बसेरापन।
ये निरा अकेलापन।

 

एक गीत प्यार का, फागुनी बयार का –
एक कड़ी ही सही कोई तो सुनाएगा
मछियारी साँसों को ओस ही पिलाएगा
और बीत जाएगा दर्द का घनेरापन।
ये निरा अकेलापन।

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