06-06-2007

उजाला छिन न पाएगा

डॉ. राजेन्द्र गौतम

यह धुआँ
सच ही बहुत कडुआ - 
घना काला 
क्षितिज तक दीवार फिर भी 
         बन न पाएगा।
 
लाश की सूरज दबी 
चट्टान के नीचे
सोच यह मन में 
ठठा कर रात हँसती है
सुन अँधेरी कोठरी की वृद्ध खाँसी को
आत्ममुग्धा- गर्विता यह 
व्यंग्य कसती है
 
एक जाला-सा 
समय की आँख में उतरा
   पर उजाला सहज ही यों 
           छिन न पाएगा।
 
                संखिया कोई--
                कुओं में डाल जाता है
                हवा व्याकुल 
                गव भर की देह है नीली
                दिशाएँ निःस्पंद सब
                बेहोश सीवाने
कुटिलता की गुंजलक 
होती नहीं ढीली
 
                पर गरुड़-से 
                भैरवी के पंख फैलेंगे
                चुप्पियों के नाग का फन 
      तन न पाएगा।
 

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