सुबह की हलकी मीठी सर्दियों में एक पेड़ के नीचे करुणा किशोर से बात करते हुए पूछ पड़ी, "किशोर मेरे ख़त का जवाब दिए बिना, मेरे प्यार को ठुकरा कर कैसे तुम मुझे छोड़ कर चले गए? क्या भरोसा नहीं था मुझ पर या प्यार नहीं था मुझसे? इतने सालों में एक बार ये तक नहीं जान लेने की कोशिश की, कि मैं कैसी हूँ कहाँ हूँ या ज़िंदा भी हूँ कि नहीं। जवाब दो किशोर क्यों मुझे किसी और से शादी करने के लिए मजबूर कर दिया?"

इतने में एक छोटी बच्ची अपनी गेंद लेने आयी, करुणा ने पूछा, "बेटी क्या नाम है तुम्हारा?"

वो बच्ची बोली, "मेरा नाम ’करुणा-किशोर’ है," और बोलने लगी, "पापा चलो न जल्दी।"

करुणा निःशब्द होकर किशोर की ओर देखने लगी। 

किशोर ने बच्ची से कहा, "हाँ तुम खेलो; अभी चलते हैं।"

फिर किशोर बोला, "करुणा, तुम्हारे सिवा किसी और के बारे में सोचना इस जनम में तो मुमकिन नहीं है; शादी तो बहुत दूर की बात है। ’करुणा-किशोर’ मेरी गोदी ली हुई गुड़िया है और अब मैं अपना पूरा जीवन इसी को बड़ा करने में लगा देने वाला हूँ। इन दोनों नामों को जीवन-भर के लिए जोड़ के रखूँगा यही सपना है . . . तुम्हारी चिट्ठी मिलने से काफ़ी पहले ही मैं तुम्हारे पिता से मिल आया था और उन्हें मैंने बताया था कि . . ."

इतने में तेज़ हवा चली और . . .

छन्न से करुणा का सपना टूटा, और बहुत देर सोचती रही . . . एक लम्बे अरसे के बाद करुणा ने सुकून की साँस ली थी। मन ही मन ये मान लिया था कि सचमुच किशोर ने किन्हीं ना सुलझने वाली मुश्किलों की वज़ह से मुझसे दूरियाँ बढ़ा ली होंगी और उसे माफ़ करते हुए एक ख़ुशी के साथ अपने गृहस्थी के कामों की ओर चल पड़ी। 

इतने में उसके पिता का फोन आया और उन्होंने बताया कि किशोर कई वर्षों से कैंसर से पीड़ित था और अभी कुछ देर पहले ही समाचार आया है कि वो अब इस दुनिया में नहीं रहा, मुझे माफ़ करना बेटी उसने क़सम दी थी कि तुम्हें ये बात कभी ना बताऊँ। करुणा बस चुप सी रह गयी . . .

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