18-04-2008

सफलता का रहस्य — भावनात्मक बुद्धिमत्ता

शशि पाधा

जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्राणी सफलता के उच्चतम शिखर पर पहुँचने की अभिलाषा रखता है। और इसके लिये वो निरन्तर प्रयत्नशील भी रहता है। आजतक केवल बुद्धि तथा प्रतिभा को ही जीवन की सफलता की सोपान समझा जाता रहा है। पढ़ाई में होशियार बच्चे को देख कर यह मान लिया जाता था कि यह बच्चा बड़ा होकर अवश्य एक सफल अधिकार बनेगा अथवा  उच्च पदासीन होकर जीवन यापन करेगा। किन्तु आज के प्रतिस्पर्द्धा के युग मे ऐसा देखा गया है कि यह आवश्यक नहीं है कि उच्च बौद्धिक स्तर वाले बच्चे ही आगे जाकर अपनेकार्यक्षेत्र या व्यवसाय में सफल हों।आपितु ऐसे भी उदहारण हैं कि कई मध्यम बुद्धि वाले लोग भी अपने व्यक्तित्व के अन्य गुणों के कारण सफलताकी चर्म सीमा को छू लेते हैं।

वास्तव में ऐसा क्यों होता है ? सफलता में बौद्धिक स्तर के महत्व कीधारणा को तोड़ने वाले हार्वर्ड विश्विद्यालय से मनोविझान में पी. एच्. डी. तथा विझान संबन्धी अनेक लेखों के लेखक “डेनियल गोलमेन” हैं। इन्होंने सन् १९९५ में अपनी पुस्तक “इमोशनल इंटैलिजेन्स -व्हाई इट कैन मैटर मोर दैन आई क्यु” में तथा पुन: “व्हेयर मेक्स ए लीडर” में यह स्पष्ट किया है कि जीवन में प्रतिभा एवं बुद्धि के महत्व को नकारा नहीं जा सकता किन्तु जीवन पथ पर अग्रसर होने के लिये एवं सफलता प्राप्त करने के लिये प्रतिभा के साथ-साथ भावनात्मक बुद्धिमत्ता का होना आवश्यक है। यानि कोई भी प्रतिभावान व्यक्ति अगर भावनात्मक स्तर पर भी  परिपक्व होगा तो दोनों गुण सोने पे सुहागा जैसे कार्य करेंगे। इस विषय में एक बात अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि बौद्धिक स्तर जन्मजात तथा वंशानुगत हो सकता है किन्तु भावनात्मक बुद्धिमत्ता का विकास किया जा सकता है।

भावनात्मक बुद्धिमत्ता से तात्पर्य यह है कि मनुष्य अपनी निजी भावनाओं जैसे क्रोध,उद्वेग, खुशी, तनाव आदि को पहचान कर उन्हें इस तरह से संयमित एवम् निर्देशित करे कि वे उसकी सफलता तथा उद्देश्य पूर्ति में सहायक हो सकें। वो अपनी प्रतिभा तथा भावनात्मक योग्यता के अनुसार जीवन के हर क्षेत्र में परिश्रम करते हुए अपने व्यवहारिक तथा व्यवसायिक जीवन में भी दूसरों की भावनाओं को समझ कर समझदारी से प्रतिक्रिया करे। वास्तव में अपनी भावनाओं की सही पहचान एवम् उनका सही दिशा की ओर निर्देशन करना ही भावनात्मक बुद्धिमत्ता है।

मानव के मस्तिष्क का सही विश्लेषन करें तो पता चलता है कि उसके दो भाग हैं। बायें भाग में तर्क बुद्धि है तथा दायें भाग के द्वारा मनुष्य अन्त:करण की आवाज़ को सुनता और परखता है। दोनों भाग एक दूसरे पर आश्रित हैं और दोनों का सामजंस्य ही मनुष्य के सफल जीवन की पूंजी है।

भावनात्मक बुद्धिस्तर के विकास के लिये पाँच मुख्य गुणों का विकास अत्यावश्यक है —

१. खुद की पहचान — जब मनुष्य अपनी निजी भावनाओं को तथा उनके कारणों को पहचान कर उन्हें सही तरह से निर्ेशित करता है तो वे पग पग पर उसकी सहायक बन जाती हैं ।यह आत्मविश्लेषन का गुण भावनात्मक बुद्धिमत्ता की प्रथम सोपान है। ऐसा व्यक्ति अपनी योग्यताओं एवम्‌ कमियों का सही मूल्यांकन करके अपने सहयोगियों द्वारा समय समय पर दिये गये सुझावों का स्वागत करता है। ऐसे व्यक्ति की परख करने के लिये यह देखा जाता है कि वो सुख-दुख, तनाव-खुशी आदि पर कैसी प्रतिक्रिया करता है, आस पास के परिवेश मे अपने आप को कितना ढालने की चेष्टा करता है तथा अपनी जिम्मेवारियों का निर्वाह कितनी कर्त्तव्य  परायणता से करता है। ऐसे व्यक्ति में अदम्य आत्म विश्वास होता है तथा वो अपने विचारों को तटस्थता के साथ व्यक्त करने में संकोच नहीं करता।

२. आत्म संयम — अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रख कर किसी भी परिस्थिति में शान्त रहना, नकारात्मक विचारों को पीछे धकेल कर सकारत्मक विचारों के सहारे कार्यकुशलता का परिचय देना ही आत्मसयंम अथवा आत्म नियंत्रण है इस विषय में यह आवश्यक हो जाता है कि मनुष्य क्रोध, उत्तेजना, अनिर्णयवादि दृष्टिकोण, अनिष्ठा, तनाव आदि नकारात्मक विचारों  पर विजय पाकर संयम, विश्वसनीयता, कार्यसंलग्नता आदि सकारात्मक गुणों का विकास करता है। ऐसा व्यक्ति कार्य के प्रति पूर्ण समर्पित रहकर अन्तरात्मा  के आदेशों को समझ कर अपनी योग्यतानुसार कार्यप्रणाली में बदलाव लाने तथा नवीन प्रयोग करने में भी संकोच नहीं करता।

३. संवेदनशीलता — दूसरों की भावनाओं को समझना और उनका आदर करनाभावनात्मक बुद्धिमत्ता का एक प्रमुख गुण है। मनुष्य जब यह पहचान लेता है कि उसकी व्यक्तिगत भावनाओं का उसकी कार्यप्रणाली एवं कार्यक्षेत्र पर क्या असर पड़ता है तथा वो अपने सहयोगियों की भावनाओं, योग्यतायों तथा विचारों का आदर करते हुए समझदारी से एक अटूट संगठन बना कर चलता है तो हर क्षेत्र में उसे मित्रों तथा सहयोगियों का सहयोग ही मिलेगा।

४. प्रेरणा शक्ति — भगवत् गीता में लिखा है “फल की चिन्ता किये बिना एकाग्रचित्त होकर, तन्मयता से कार्य की ओर समर्पित रहना चाहिये”। भावनात्मक बुद्धिमत्ता रखने वाला व्यक्ति भी कार्य के प्रति पूर्णतय: समर्पित रहकर परिश्रम, उद्यम, तथा लगन से अपना कार्य करता जाता है तथा फल की चिन्ता की ओर ध्यान नहीं लगाता। बौद्धिक तथा भावनात्मक बुद्धिमत्ता का समाजंस्य रखने वाले लोग कार्य को शुरू करने से घबराते नहीं अपितु उनमें कार्य करने का अदम्य उत्साह होता है। वे अपनी लगन एवम् उत्साह से अपने सहयोगियों को भी प्रेरित करते रहते हैं।

४. सामाजिक व्यवहार कुशलता — समाज की विभिन्न इकाइयों, समुदायों के साथसौहार्दपूर्ण संबंध स्थापित करके कुशलता से सहयोगियों तथा मित्रों को साथ ले कर चलने वाला व्यक्ति भावनात्मक स्तर पर परिपक्व माना जाता है। अपने उद्देश्य की प्राप्ति की ओर संलग्न ऐसा व्यक्ति  दूसरों से सहयोग की आशा रखते हुये स्वयं भी सदैव सहयोग के लिये तत्पर रहता है। ऐसे व्यक्ति का प्रभावमय व्यक्तित्व होता है और वो खुले दिल से विचारों का आदान प्रदानकरता है। ऐसे प्रभावी व्यक्ति नये-नये प्रयोग करने से भी संकुचाते नहीं हैं तथा विश्व में औद्योगिकी जगत में तथा समाज में आने वाले बदलाव के प्रति जागरूक रहते हैं। आज के प्रतिस्पर्द्धा  के युग में कुछ  विद्यार्थी बौ्धिक योग्यता के अनुसार परिश्रम करते हुए परीक्षा में तो अच्छे अंक पाते ही हैं किन्तु नौकरी के लिये साक्षात्कार के समय या कार्यक्षेत्र में सफल नहीं हो पाते हैं। आज के औद्यौगिक घराने या मल्टीनेशनल कंपनियाँ साक्षात्कार के समय आवेदक की केवल शैक्षिक अथवा बौद्धिक योग्यता नहीं देखतीं अपितु आवेदक की व्यवहारिक एवम् व्यवसायिक योग्यता भी परखती है जब यह बात सत्य है कि भावनात्मक बुद्धिमत्ता का विकास किया जा सकता है तो बच्चों को भावनात्मक रूप से परिपक्व बनाने के लिये माता पिता, गुरूजनएवम् समाज के सही योगदान की आवश्यकता है। इसके लिये घर का स्नेहपूर्ण वातावरण, माता-पिता का आपस में प्रेम तथा आदरपूर्ण व्यवहार, बच्चों की भावनाओं का आदर तथा उन्हें अपने विचार व्यक्त करने की छूट देने की आवश्यकता है। जो बच्चे बचपन से ही हँसी खुशी वाले घर में, प्रेरणा देने वाले अध्यापक एवं प्रबुद्ध एवम् प्रगतिशील समाज की देख रेख में पलते हैं उनकी बुद्धि का चहुँमुखी विकास होता है और सफलता हर क्षेत्र में उनके कदम चूमती है। “गोलमेन” की यह महत्त्वपूर्ण खोज कि “प्रतिभा के साथ भावनात्मक विकास होना आवश्यक है” भारतवासियों के लिये कोई नयी बात नहीं। हमारे पौराणिक ग्रन्थों में भी इन्द्रियों पर संयम, मन पर नियंत्रण,सहिष्णुता, संवेदनशीलता, आत्मशान्ति तथा आत्मविश्लेषण के विषय में खूब लिखा गया है। मन की चंचलता पर काबू पाकर अपनी इन्द्रियों को सही दिशा की और लगाना ही सही मायने में “योग”  और “ध्यान” है। अत: आज के युग में हम अपने ग्रन्थों से प्रेरणा लेकर इस दिशा की और सही कदम  बढ़ायें तो हर क्षेत्र  में सफल हो सकते हैं।

0 Comments

Leave a Comment