समकालीन गीत और वीरेन्द्र आस्तिक 

01-04-2020

समकालीन गीत और वीरेन्द्र आस्तिक 

डॉ. अवनीश सिंह चौहान

पिछले दिनों (दिसंबर 30, 2019) लखनऊ में 'उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान' द्वारा जब श्रद्धेय वीरेन्द्र आस्तिक जी (जन्म : 15 जुलाई 1947) को 'साहित्य भूषण सम्मान' से सम्मानित किया गया, तब उन्हें और उनके परिवार को बधाइयाँ एवं शुभकामनाएँ देने वालों का तांता लग गया। यह तांता उनके घर पर भी लगा था और बाहर भी- ख़ासकर फ़ेसबुक और व्हाट्सएप्प पर सैकड़ों शुभ-संदेशों के साथ छात्र-छात्राओं, शोधार्थियों, पाठकों, श्रोताओं, मित्रों, शुभचिन्तकों, कवियों, आलोचकों, शिक्षकों, पत्रकारों का उमड़ पड़ना। यद्यपि यह बात कहने की नहीं है- साहित्य जगत इस घटना से लगभग पूरी तरह से परिचित है ही- फिर भी, बिना लाग-लपेट के, यहाँ कहने की अनुमति चाहता हूँ। अनुमति इसलिए कि-  "कब से तुम गा रहे" (कीर्तिशेष आ. ठाकुरप्रसाद सिंह जी), "जो गाना था वह न गा सके"  (कीर्तिशेष आ. डॉ शिवबहादुर सिंह भदौरिया जी), "इस सदी का गीत हूँ मैं गुनगुनाकर देखिये" (आ. माहेश्वर तिवारी जी), "गीत गाता चल ओ साथी गुनगुनाता चल" (कीर्तिशेष आ. रवीन्द्र जैन जी, फ़िल्म; गीत गाता चल, 1975),  "मैं फिर से गाऊँगा" (कीर्तिशेष आ. दिनेश सिंह जी), "मैं तुम्हें गाता रहूँगा" (कीर्तिशेष आ. किशन सरोज जी), "तेरे प्यार के नगमे गाऊँगा" (आ. मनोज मुंतशिर जी, फ़िल्म: हाफ़ गर्लफ्रेंड), "मैं समय का गीत हूँ" (आ. वीरेन्द्र आस्तिक जी) जैसे तमाम महत्वपूर्ण गीत, गीत सृजन की अभीप्सा का संकेत करते हुए, 'भाव-सेवा' के लिए रचे तो जाते हैं, किन्तु उन्हें समय से नोटिस नहीं किया जाता है। ऐसे में, भला गीतकारों की कौन सुध ले- वे लिखते रहें, खपते रहें, मिटते रहें और अपनी "स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथा" की उद्घोषणा कर संतुष्ट हो लें। कहने वाले कहेंगे- इससे अधिक और क्या? नहीं, इससे भी अधिक बहुत कुछ है, जीव-सेवा हेतु, समाज-सेवा हेतु, राष्ट्र-सेवा हेतु, विश्व-सेवा हेतु- कहने और करने के लिए। 

शायद तभी शुद्ध, सात्विक एवं शाश्वत मूल्यों को उद्घाटित करने वाले गीतऋषि श्रद्धेय श्री वीरेन्द्र आस्तिक जी स्पष्ट रूप से कह देते हैं-  "मैं कलियुग का सच हूँ, सच/का निपुण प्रवक्ता-सा/आँखें तो टपकें पर/हिरदय पुरयिन पत्ता-सा।/अक्ल खुली क्या, मुक्त हुआ मन/दुनिया के सामान से।" कलिकाल का यही सच है- "यह कलिकाल मलायतन मन करि देखु बिचार" (कवि-कुल कमल बाबा तुलसीदास) और इसीलिये सत्य में स्थित हो आस्तिक जी जन-हित के पथ का वरण करना ज़्यादा श्रेष्ठ समझते हैं- "शब्द-सर में डूब जाते/पीर जन की कौन हरता/मोक्ष का पद त्याग,/जनहित का चुनो पथ,/कौन कहता।/चुभ रहे थे कील-कंकण/चलती सड़कों से उठाए।" आज जब करोड़ों लोग जन्म और मृत्यु से परे मोक्ष पद प्राप्ति के लिए तमाम ठठकर्म कर रहे हैं, तब 'मोक्ष का पद त्याग' करने का उपदेश तो आस्तिक जी जैसा कोई कर्मयोगी ही दे सकता है, क्योंकि- "सकल जीव बसहिं महादेवा/जीव सेवाहु सिव की सेवा" (पूज्यपाद श्रीरामकृष्ण परमहंस)। 'सेवा-भाव' की शब्दाग्नि में निरंतर दहने वाले सुकंठी आ. आस्तिक जी मन, वचन और कर्म से पवित्र एवं निर्मल हैं- "मन क्रम बचन सो जतन बिचारेहु। रामचंद्र कर काजु संवारेहु" और स्वभाव से विनम्र एवं सहज भी- "सहज सुभाय सुभग तन गोरे" (कवि-कुल-कमल बाबा तुलसीदास)।  यह मैं नहीं कह रहा हूँ! उनको पढ़ने पर, उनको सुनने पर, उनसे मिलने पर, उनसे बातचीत करने पर स्वयं प्रकट हो जाता है कि कैसे साकार-सदेह-निश्छल-निर्मल विनम्रता एवं सहजता का दिग्दर्शन उनकी भेदरहित कृतज्ञता के अखण्ड-भाव में समाहित है और कैसे उनकी रागवेषित सहज टिप्पणियाँ इस बात की पुष्टि करती हैं- "कुछ ख़ास बात ज़रूर होगी कि मुझे आप सभी आत्मीयों का इतना प्यार मिल रहा है, सभी को अभिवादन", "हमें नवगीत को किसी सीमा तक नहीं, व्यापकता की ओर ले जाना होगा" और "आत्मीय अवनीश, नवगीत की विशद चर्चा करके (आस्तिक जी को साहित्य भूषण मिलने पर समाचार प्रकाशित करने के सन्दर्भ में) आपने नवगीत को ऊँचाई प्रदान की है। हमलोग तो सिर्फ़ माध्यम हैं। बहुत बहुत बधाई" (आस्तिक जी, फ़ेसबुक)।  

मूर्धन्य कवि, आलोचक एवं सम्पादक श्रद्धेय श्री वीरेंद्र आस्तिक जी बाल्यकाल से ही अन्वेषी, कल्पनाशील, आत्मविश्वासी, स्वावलंबी, विचारशील, कलात्मक एवं रचनात्मक रहे हैं। बाल्यकाल में मेधावी एवं लगनशील होने पर भी न तो उनकी शिक्षा-दीक्षा ही ठीक से हो सकी और न ही विरासत में मिले शास्त्रीय संगीत और गायन में वह आगे बढ़ सके। जैसे-तैसे 1962 में हाईस्कूल की परीक्षा अच्छे अंकों से उत्तीर्ण की और एक-दो वर्ष संघर्ष करने के बाद 1964 में देशसेवा के लिए भारतीय वायु सेना में भर्ती हो गये। पढ़ना-लिखना चलता रहा और छोटी-बड़ी पत्रिकाओं में वीरेंद्र बाबू और वीरेंद्र ठाकुर के नामों से छपना भी प्रारम्भ हो गया। आपकी पहिला कविता 1971 में 'साप्ताहिक नीतिमान' (जयपुर ) में छपी थी। उन दिनों आस्तिक जी दिल्ली में रहा करते थे। दिल्ली में नई कविता का दौर चल रहा था, सो उन्होंने यहाँ नई कविता और गीत साथ-साथ लिखे। 1974 में भारतीय वायु सेना छोड़ने के बाद वह कानपुर आ गए और अगले वर्ष (1975) से ही भारत संचार निगम लि. को अपनी सेवाएँ देने लगे। कानपुर में छंदबद्ध कविता की लहर थी। इस नये माहौल का उनके मनोमस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ा और वह गीत के साथ ग़ज़लें भी लिखने लगे। 1980 में आ. रामस्वरूप सिन्दूर जी ने एक स्मारिका प्रकाशित की, जिसमें - 'वीरेंद्र आस्तिक के गीत' (गीतों की संख्या 24) प्रकाशित हुए। 1984 में उन्होंने कानपुर विश्वविद्यालय, कानपुर से एम.ए. (हिंदी) की परीक्षा उत्तीर्ण की। 2007 में  बीएसएनएल में लम्बे अरसे तक अपनी सेवाएँ देने के बाद ससम्मान सेवानिवृत्त हुए। 

600 से अधिक समकालीन गीत और 100 से अधिक शोधपरक आलेख, जोकि प्रतिष्ठित अख़बारों, पत्रिकाओं, यथा- 'दैनिक जागरण', 'दैनिक हिंदुस्तान', 'सन्डे मेल', 'जनसंदेश टाइम्स', 'प्रेसमेन', 'विधान केसरी', 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान', 'वागर्थ', 'आजकल', 'कल के लिए', 'गगनांचल', 'नये-पुराने', 'अतैव', 'मधुमती', 'गीत नवांतर', 'पाखी', 'संकल्प रथ', 'उत्तरायण', 'नवनीत', 'प्रयास', 'उत्तरार्द्ध', 'अलाव', 'पूर्वाभास', 'कविताकोश', 'अनुभूति', 'हिंदी समय'  आदि  और महत्वपूर्ण समवेत संकलनों, यथा- 'कानपुर के कवि' (सं.- आ. प्रतीक मिश्र जी, 1985), 'हिंदी के मनमोहक गीत' (सं.- आ.  इसाक अश्क जी एवं आ. चंद्रसेन विराट जी, 1997), 'श्रेष्ठ हिंदी गीत संचयन' (सं.- आ. कन्हैयालाल नंदन जी, 2000), 'बीसवीं सदी के श्रेष्ठ गीत' (सं.- आ. मधुकर गौड़ जी, 2003), 'बंजर धरती पर इंद्रधनुष : मैं और मेरी पसंद' (सं.- आ. कन्हैयालाल नंदन जी, 2003), 'गीत नवांतर-5' (सं.- आ. मधुकर गौड़ जी, 2006), 'शब्दपदी' (सं.- आ. निर्मल शुक्ल जी, 2006), 'शब्दायन : दृष्टिकोण एवं प्रतिनिधि' (सं.- आ. निर्मल शुक्ल जी, 2012), 'गीत वसुधा' (सं.- आ. नचिकेता जी, 2013), 'सहयात्री समय के' (सं.- आ. डॉ रणजीत पटेल, 2016), 'शिखर के सात स्वर' (सं.- आ. डॉ मधुसूदन साहा जी एवं डॉ के के प्रजापति, 2016), 'नई सदी के नवगीत : खण्ड-2' (सं.- आ. डॉ ओम प्रकाश सिंह, 2016) आदि में प्रकाशित और आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर प्रसारित हुए, के यशस्वी क़लमकार आस्तिक जी मुख्य रूप से कानपुर देहात की अकबरपुर तहसील के रहने वाले हैं।

वीरेन्द्र आस्तिक जी की 'परछाईं के पांव' (गीत-ग़ज़ल संग्रह, 1982), 'आनंद! तेरी हार है' (गीत-नवगीत संग्रह, 1987), 'तारीखों के हस्ताक्षर' (राष्ट्रीय त्रासदी के गीत,  उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से अनुदान प्राप्त, 1992), 'आकाश तो जीने नहीं देता' (नवगीत संग्रह 2002), 'दिन क्या बुरे थे' (नवगीत संग्रह, सर्जना पुरस्कार, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, 2012), 'गीत अपने ही सुनें' (प्रेम-सौन्दर्यमूलक नवगीत संग्रह, 2017) आदि बहुचर्चित काव्य-कृतियों ने उन्हें नई ऊँचाईयाँ प्रदान कीं। इसी दौरान सितम्बर 2013 में भोपाल के जाने-माने गीतकवि एवं सम्पादक आ. राम अधीर जी ने 'संकल्प रथ' पत्रिका का महत्वपूर्ण विशेषांक- 'वीरेन्द्र आस्तिक पर एकाग्र' प्रकाशित किया। इस विशेषांक में भाव और विचार से आस्तिक वीरेंद्र आस्तिक पर तमाम लेखकों ने अपनी सार्थक क़लम चलाई है। आस्तिकता को रेखांकित करते हुए 'परछाईं के पाँव' की भूमिका में कीर्तिशेष कवि एवं आचार्य आ. डॉ रवीन्द्र भ्रमर जी ने सच ही लिखा था- "रेखांकित करने योग्य एक विशेष बात यह है कि वीरेंद्र आस्तिक के गीतों में निर्गुण संत-भक्तों जैसी एकांत समर्पण भावना और घनीभूत रागात्मकता के बीज मिलते हैं। इनका उपनाम 'आस्तिक' होना निरर्थक नहीं प्रतीत होता है। प्रेम मंदिर के पुजारी की तुलना में और अधिक आस्तिक दूसरा कौन हो सकता है? वीरेंद्र कि यह आस्तिकता इनके गीतों में एक ख़ास तरह का आध्यात्मिक आभास उत्पन्न करती है।" आस्तिक जी की रचनाधर्मिता के बारे में वरिष्ठ आलोचक डॉ. सुरेश गौतम जी कहते हैं- "संवेदन से मानवता का अर्थ निकालने वाले आस्तिक का साहित्यिक सफ़र बहुत लंबा नहीं है। लगभग एक दशक में आस्तिक ने तीन क़दम 'वीरेंद्र आस्तिक के गीत', 'परछाई के पाँव' और 'आनंद! तेरी हार है', रखे हैं, लेकिन जमा कर रखे हैं। जीवन के उतार-चढ़ावों एवं परिवेश की तल्ख़ अनुभूतियों के बीच आस्तिक का मन सामाजिक सरोकारों से बुना है। उनके व्यक्तित्व का रचाव लयबद्ध एवं तालमय है। गीतों की बुनावट सांगीतिक है, कसाव मानव मन की आंतरिकता एवं सौंदर्य से जुड़ा है। कसाव और रचाव की तालबद्ध अनुभूतियाँ गीतकार के संवेदनशील मन पर थाप देती हैं और वह थाप युगनद्ध हो मन-आत्मा को मथ डालती है (काव्य परिदृश्य : अर्द्धशती पुनर्मूल्यांकन (खण्ड-2), श्री अल्मोड़ा बुक डिपो, माल रोड, अल्मोड़ा, 1997, पृ. 353)।

नवगीत सृजन एवं आलोचना के ज़रिए ख्याति प्राप्त करने वाले आ. श्री वीरेंद्र आस्तिक जी मानते हैं कि नवगीत मूलत: ऋग्वेद से विरासत में मिले गीत की आधारशिला पर ही खड़ा हुआ है और इसीलिये आज गीत अपनी यात्रा में कई पड़ावों को पार कर नवगीत के रूप में समकालीन लोक-जीवन की संवेदना, संस्कृति एवं सरोकारों को मुखरित कर रहा है। सर्वाधिक चर्चित समवेत संकलन 'धार पर हम (1998, बड़ौदा विश्वविद्यालय में एम.ए. पाठ्यक्रम में निर्धारण : 1999-2005) एवं 'धार पर हम- दो' (2010, नवगीत-विमर्श एवं नवगीत के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर) के प्रकाशन से आस्तिक जी को ज़बरदस्त सराहना मिली। एक प्रतिष्ठित समीक्षक के रूप में उन्होंने विभिन्न कृतियों में यादगार भूमिका आलेख भी लिखे हैं, जिनमें परम आ. आचार्य रजनीश (ओशो) कृत 'केनोपनिषद' (प्रवचनों का अनुवादित संकलन, 1989), आ. माँ प्रबुद्धानन्द कृत 'अवकाश' (कविता संग्रह, 2000), श्री मनोज जैन 'मधुर' कृत 'एक बूँद हम' (नवगीत संग्रह, 2012), अवनीश सिंह चौहान कृत 'टुकड़ा कागज़ का' (नवगीत संग्रह, 2013), आ. शंकर दीक्षित कृत 'चाँदनी समेटते हुए' (नवगीत संग्रह, 2015), डॉ संतोष तिवारी कृत 'रिश्ते: मन के मन से' (कहानी संग्रह, 2017), डॉ. टी. रवींद्रन कृत 'परिवर्तन के बाद' (कविता संग्रह, 2018), आ. रामनारायण 'रमण' कृत 'जोर लगा के हइया' (नवगीत संग्रह, 2020) आदि प्रमुख हैं। हाल ही में उनकी आलोचना पुस्तक- 'नवगीत: समीक्षा के नये आयाम' (2019) के ज़रिए उन्होंने गीत-नवगीत क्या है, इसे जानने-समझने का मनोयोगपूर्वक प्रयास किया है। 

संपादन के साथ लेखन को धार देने वाले आस्तिक जी के नवगीत किसी एक काल खंड तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनमें समयानुसार प्रवाह देखने को मिलता है। यह प्रवाह उनकी रचनाओं की रवानगी से ऐसे घुल-मिल जाता है कि जैसे स्वातंत्र्योत्तर भारत के इतिहास के व्यापक स्वरूप से परिचय कराता एक अखण्ड तत्व ही मानो नाना रूप में विद्यमान हो। इस दृष्टि से उनके नवगीत, जिनमें नए-नए बिम्बों की झलक है और अपने ढंग की सार्थक व्यंजना भी, भारतीय जन और मन को बड़ी साफ़गोई से व्यंजित करते हैं। राग-तत्व के साथ विचार तत्व के आग्रही आस्तिक जी की रचनाओं में भाषा-लालित्य और सौंदर्य देखते बनता है- शायद तभी कन्नौजी, बैंसवाड़ी, अवधी, बुंदेली, उर्दू, खड़ी बोली और अँग्रेज़ी के चिर-परिचित सुनहरे शब्दों से लैस उनकी रचनाएँ भावक को अतिरिक्त रस से भर देती हैं। अनुभूति की प्रमाणिकता, सात्विक मानुषी परिकल्पना एवं अकिंचनता का भाव इस रस-सिद्ध कवि-आलोचक को पठनीय एवं महनीय बना देता है- "हम ज़मीन पर ही रहते हैं/अम्बर पास चला आता है।/ हम न हिमालय की ऊँचाई/ नहीं मील के हम पत्थर हैं/ अपनी छाया के बाढ़े हम/ जैसे भी हैं हम सुन्दर हैं।/ हम तो एक किनारे भर हैं/ सागर पास चला आता है।"

साहित्य संगम (कानपुर, उत्तर प्रदेश) द्वारा 'रजत पदक' एवं 'गीतमणि- 1985' की उपाधि- 17 मई 1986, श्री अध्यात्म विद्यापीठ (नैमिषारण्य, सीतापुर) के 75 वें अधिवेशन पर काव्य पाठ हेतु 'प्रशस्ति पत्र'- फरवरी 1987, अखिल भारतीय साहित्य कला मंच (मुरादाबाद) द्वारा 'अलंकार सम्मान'- 2012, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान (लखनऊ) द्वारा 'सर्जना पुरस्कार'- 2012, निमित्त साहित्यिक संस्था (कानपुर) द्वारा 'अलंकरण सम्मान'- 2013, श्री सत्य कॉलेज ऑफ़ हायर एजुकेशन (मुरादाबाद) द्वारा 'गीतांगनी  पुरस्कार/सम्मान'- 2014, बैसवारा शोध संस्थान (लालगंज, रायबरेली) द्वारा 'सुमित्रा कुमारी सिन्हा स्मृति सम्मान'- 2015, संकल्प संस्थान (राउरकेला, उड़ीसा) द्वारा 'संकल्प साहित्य शिरोमणि सम्मान'- 2016, संयोग साहित्य (भायंदर-मुंबई, महाराष्ट्र) द्वारा 'संयोग गीत वैभव सम्मान'- 2018, 'कादम्बरी' और 'महाकोशल शहीद स्मारक ट्रस्ट' (जबलपुर, म.प्र.) द्वारा  'स्व. यदुनंदन प्रसाद बाजपेयी सम्मान'- 2019 से अलंकृत आस्तिक जी स्वस्थ रहें और शतायु हों, परम पिता परमेश्वर से यही प्रार्थना है।

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