दिशाओं के अहंकार को ललकारती भुजाएँ
और
चीखकर बेदर्दी की इन्तहां को चुनौती देतीं
हथेलियों में धँसीं कीलें



एक-एक बूँद टपकता लहू
जो सींचता है उसी ज़मीन पर
लगे फूल के पौधों को
जहाँ सलीब पर खड़ा है सच
जब भी लगता है कि
हार रहा है मेरा सच
सलीब को देखता हूँ



लगता है कोई खड़ा है मेरे लिए
झूठ के ख़िलाफ़

0 Comments

Leave a Comment