सायबान

04-02-2019

"सिर्फ मैं ही जानती हूँ कि यह घर वैसा ही हो गया जैसे आत्मा के बिना शरीर। हाय अम्मा तुम मुझे अकेला क्यों कर गई?" वह बड़बड़ाई। उसकी नज़रें आँसुओं में धुँधलाने लगीं।

"हाँ अम्मा का हर बात में हस्तक्षेप सहन नहीं होता था मुझे। उनकी आदत थी मेरा कहीं आने-जाने में, खाना पकाने में, घर के हिसाब-किताब में, मेरे हर काम में गलती निकालना, नुक्ता-चीनी करना।"

"वह बच्चा क्या माँगने आया? तेरा भाई क्यों आया? पीहर में रोज़-रोज़ फोन क्यों किया करती हो? यह बिजली क्या मुफत आती है दिन भर कमरे में जलाये रखती हो। पानी गिराने का हिसाब भी है? सब्जी में इतना तेल क्यों डालती हो?" ... और मैं जल जाती थी।

क्यों दूँ मैं इनको बात-बात पर सफाई। परन्तु सफाई देना मेरी मजबूरी थी। वह मेरी सास थी। बेटा घर आते ही पूरी रिपोर्ट देना जैसे उनका मुख्य कर्त्तव्य था। हर बात फर-फर सुनाती जैसे कोई दास्तान अधूरी न रह जाय और मैं हाथ मलती रह जाती।

सुगरा बेगम देखने में दुबली-पतली, हड्डियों का ढाँचा थी। तन की कमज़ोर लेकिन अन्दर से मज़बूत। कई साल पहले लगे आँखों के लेंस इतने तेज़ की मजाल है कि फर्श पर चलती बारीक सी चींटी भी इनकी नज़र से बच जाए। अम्मा अठहत्तर से कुछ ऊपर ही थी। सुनने में ऊँचा ही सुनती थी लेकिन हर बात में बाल की खाल निकालने में माहिर।

वसीम और समीरा की शादी अम्मा की पसन्द से हुई थी। घर में देवर, नन्द का कोई झँझट नहीं। समीरा को क्या पता था कि वो एक सास का रिश्ता ही सब रिश्तों से भारी पड़ जायेगा।

"बच्चे स्कूल से आने वाले हैं। मेरे बच्चे भूखे रहेंगे क्या?" अम्मा जी ज़ोर से चीखीं।

"वाह अम्मा ये बच्चे मेरे तो कुछ लगते ही नहीं? मुझे फिकर नहीं है? आज कपड़े धोने में थोड़ी देर हो गई और इनके बच्चे भूखे मरेंगे। आयेंगे तब गर्म रोटी सेक दूँगी।" उसने ज़ोर से जवाब दिया। फिर धीरे से बोली, "जानती हूँ भूख के मामले में खुद कच्ची है और सुनाया जा रहा बच्चों के नाम से।"

सुगरा बेगम बोली, "आज खाना नहीं पकेगा क्या घर में? या फिर टी.वी. में देख-देख कर होटल से खाना मँगवाने की आदत पड़ गई है। आग लगे मुए इन टी.वी. वालों को घर बैठी बहू-बेटियाँ बिगाड़ रहे हैं, उनको होटलों से खाना मँगवाने की आदत डाल रहे हैं।"

कुछ दिन पहले समीरा को बुखार था। वसीम रात का खाना बाज़ार से ले आया था। सुनाया अभी तक जा रहा है।

अचानक अम्मा ने वाशिंग मशीन के पास सर्फ की थैली ज़मीन पर पड़ी देख ली। सर्फ की थैली हाथ में उठाये प्रश्न चिन्ह बनी खड़ी हो गईं।

"ज़रा भी कद्र नहीं है मेरे बच्चे की कमाई की। देखो साबुन और पानी दोनों बहाये जा रहे है।"
"अम्मा! कामवाली ने छोड़ दी। अभी मैं उठाने वाली थी।"

"अरे उसका तो यह घर नहीं है। लेकिन तेरे मियाँ की कमाई बरबाद हो रही है और तुझे अफ़सोस नहीं? भई हद है लापरवाही की।"

"कतरा-कतरा से समन्दर बनता है बन्नो। यही दस-बीस रुपये भी कम खर्च करो तो थोड़ी बचत होगी। हमने बच्चों के लिए बचाया है। तुम क्या बचाओगी...," अम्मा ने ताना दिया।

"बेचारा मेरा बेटा कमा-कमा कर परेशान इधर बीबी पूरा वेतन ही रोज़ कपड़े धो-धोकर पानी में बहा रही है। कितना सर्फ-साबुन आता है हम भी तो कपड़े धोते थे मगर हफते के हफते।"

आठ साल का मोन्टू अधिक देर तक बाहर खेलता रह जाता, कभी दस साल की नीलोफर देर तक सोती रह जाती। अम्मा शुरू हो जाती।

"अरी हमारा ख्याल तुझे नहीं है पर औलाद तो तेरी अपनी है उनकी आदतें तो मत बिगाड़। लड़की है लड़की की तरह पाल। याद रख इसे दूसरे घर जाना है।"

"अम्मा अभी यह छोटी बच्ची है। इसके खेलने-खाने के दिन है। समय आने पर समझ आ जायेगी।"

"हाँ क्यों नहीं। जैसी तुम्हें समझ आई है। अल्लाह के घर जब तमीज़ बँट रही थी तुम तो गलियों की सैर करने निकली हुई थी। मैं ही तुम्हारे पीछे पड़ी रहती हूँ। क्या करूँ बहू बेटे का दर्द आता है। बड़ी मुश्किल से कमा कर लाता है। तुम्हें नहीं कहूँ तो एक दिन में ही वेतन उड़ा दोगी।" अम्मा का रिकार्ड अब बेटे की तरफदारी में बजने लगा।

अम्मा की छोटी बहन ख़ातून ख़ाला जयपुर से आई हुई थी। वह भी कुछ कम नहीं थी।

"अरी आपा! तुम्हारे कमरे में आलतू-फालतू सब सामान भर दिया है। इस घर की मालकिन को स्टोर रूम में रखते हैं? मेरा मन करता बेटा बहू की अच्छी खबर लूँ। तो क्या तुम भी घर का फालतू सामान हो गई। तुम्हारी दुनिया इस कमरे में बसा दी गई। इसे लाई तब तुम्हारे रोम-रोम से खुशी छलक रही थी। अपनी प्यारी बहू लाई हूँ। आज उसी सास के साथ ऐसा व्यवहार? इतना असंवेदनशील व्यवहार देख मेरा मन पीड़ा से छटपटा गया है।"

अतीत की परछाइयाँ मन के आँगन में उतर आईं थीं। सुगरा और उसके पति ने शहर की भीड़ से अलग-थलग इस पॉश कालोनी में घर बनाया था। अक्सर देखा गया है कि लोग सबसे अच्छा कमरा होता है वो अपने लिए पसन्द करते है। माँ के देहान्त या पिता के सेवानिवृत होते ही या बेटे के हाथ घर की बागडोर आते ही बेटे-बहू उसी कमरे को सबसे पहले हथिया लेते हैं बहाने तो सौ मिल जाते हैं।
पिता की बरसी के अगले दिन वसीम बोला, "अम्मा! देखो पापा कि बरसी मैंने कितने शानदार ढंग से मनाई है। सब तारीफ कर रहे है।"

सुगरा बेगम बोली, "बेटा ऐसा होता आया है भले ही जीते जी हम अपने माँ-बाप को न पूछें। किंतु मरने के बाद अपनी प्रतिष्ठा बनाने के लिए उनकी बरसी धूमधाम से मनाते हैं नाम होता है ना।"
"ऐसा क्यों कहती हैं आप?"

खातून बोली, "तुम माँ का कितना ख्याल रखते हो? सच तो यह है कि उन्हें अहसास करा रहे हो कि तुम्हारी हमें अब आवश्यकता नहीं। तुम बोझ लग रही हो। क्या तुम समझ पाते कि माँ-पिता के मरने के उपरांत उनके लिए व्यर्थ के दिखावे करने से कहीं बेहतर है, उनके जीते जी उनकी सेवा की जाए। आज तुम माँ की उपेक्षा कर रहे हो कल तुम्हारा बेटा यही व्यवहार करेगा। यही प्रकृति का नियम है।" खातून ने कहा

"नादान हैं हम लोग जो उन लोगों की कद्र नहीं करते। अरे ये तो वह दरख्त हैं जिसकी छाँव में बचपन बीता। पले-बड़े हुए। माँ औलाद के हित के लिए हर पल सोचती है कैसे इनका फायदा करूँ? ...और औलाद? माँ का अपनी गृहस्थी में अनावश्यक हस्तक्षेप ही समझा जाता है।"

जिस आँगन में कभी खुशियों के फूल खिलते थे। अब वह जगह गिला-शिकवा का घर बन जाता है।

बेटे की नौकरी दूसरे शहर में थी। बेटे की याद सताती माँ फोन करती, "अरे हमें भी वहाँ ले जा, तेरी जुदाई में मेरी हड्डीयाँ गल रही हैं।"

"वहाँ जाने से खर्च बढ़ जायेगा," समीरा समझाती।

"तेरी भाभियाँ भी तो कम खर्च में घर चला रही हैं।"

"कहीं से कहीं बात ले जाती हैं, अम्मा ने पता नहीं जवानी में कितने बदाम-पिस्ते खाये होंगे। ताने बाजी में कितनी लम्बी दौड़ लगा लेती है," मन ही मन वह बोली।

"अम्मा अपने शहर के बाहर बच्चों की स्कूल के दस खर्चे बढ़ जाते हैं।"

"सब खर्चा तो तेरा है।"

"अच्छा आप जो हर फेरीवालों की आवाज़ पर कहती हो इन बच्चों को आइसक्रीम दिला, चाट लेकर दो, यह सब मेरा खर्चा है?" समीरा चिढ़कर कहती -

"तुमने ही तो इनकी आदतें बिगाड़ी हैं। कहती रहती हो पढ़ो तो पिज़ा दूँगी, सबक याद करो दो आइसक्रीम मिलेगी। आदतें तो खुद बिगाड़ दी अब बच्चों का कसूर गिनवाने बैठती हो। सच्ची बातें कड़वी लगती हैं बन्नो!"

अजीब सी सिचुएशन थी। अम्मा पर तो हर समय किसी न किसी बात का दौरा पड़ता है।

"जवाब तो मैं भी देना खूब जानती हूँ लेकिन अम्मा जी ऊँचा सुनती हैं। वे कम सुनेंगी उनसे अधिक पड़ोसी सुनेंगे। खैर इतनी सच्ची तो मैं भी नहीं हूँ कि चुपचाप सुन लूँ। उनके कमरे में जाकर धीरे-धीरे जवाब देकर उकसाना मेरे बाऐं हाथ का खेल है फिर तो दिन भर का रिकार्ड चालू।

पड़ोसन नज़मा भी कभी टमाटर, कभी चाय, लहसुन प्याज कुछ भी बेहिचक माँगने आ जाती।

"अरी इसको बाज़ार का रास्ता बताओ। मेरा बेटा परदेश भुगत रहा है और यह बहू बेगम गैरों को लुटा रही है।"

अम्मा पूरे घर में नज़र रखती है। "यहाँ पंखा क्यों चल रहा है? कमरे में कोई नहीं है तो लाईट क्यों जलती छोड़ दी। टी.वी. चलेगा, पंखा चलेगा कपड़े मशीन से धुलेंगे। यहाँ तक की चटनी, मसाला भी बिजली खर्च करके ही पीसे जायेंगे। हज़ारों का बिल आता है यहाँ किसे परवाह।"

आज दो महीने हो गये। अचानक अम्मा जी की तबियत खराब हुई और अल्लाह को प्यारी हो गईं। वसीम वापस नौकरी के लिए रवाना हो गए। पहली रात ही घर का सूनापन डराने लगा। अजीब सी चुप्पी चारों ओर छा गई। ऐसा लगाता है अम्मा की मौजूदगी में एक हिफाज़त का अहसास था। उनके उठने, बैठने, खाँसने की आवाज़ों से ढाढस बना रहता और अब एक ख़ौफ़ सा उत्पन्न हो गया। उसने डर से अपनी आँखें बन्द कर लीं। पूरी रात नींद नहीं आई।

रात देर से सोने के कारण आँख पूरे सात बजे खुली बच्चों के स्कूल की बस निकल चुकी थी।
अम्मा सुबह नमाज़ पढ़ने जल्दी उठती थी। उसे भी उठा देती थी। लेकिन अब आए दिन इस तरह के नए-नए सिलसिलों ने परेशान करना शुरू कर दिया। कभी बच्चों का टिफिन छूट जाता कभी बस।

इन दो महिनों में अम्मा की याद कदम-कदम पर आने लगी।

अम्मा के डर से कामवाली बाई बर्तन साफ करने में चार टिकिया विम की खर्च करती थी अब छः भी कम पड़ती हैं। छुट्टी तो जब चाहे करने लगी।

अम्मा का डर था या क्या था। धोबी ने कभी कपड़ा नहीं खोया। लेकिन अब कभी वसीम की शर्ट तो कभी नीलू की फ्राक नहीं मिलती है।

"ओह अम्मा... ये क्या हो रहा है," उसके मुँह से निकलता।

"हाय अम्मा क्या जादू की छड़ी थी आपके पास? आपके डर से नज़मा कभी-कभार आती थी पर अब तो उसके चक्कर बढ़ गए हैं। चीज़ें दे-देकर महीने का बैलेंस जो बिगड़ जाता है," वह बड़बड़ाई।
"हाय अम्मा तुम सच कहती थी। सिर्फ तुम्हारी दखलअन्दाज़ी से ही हर चीज़ इतनी कंट्रोल में रहती थी।"

दरवाज़ा खोला तो देखा चाचा का बेटा शफीक था।

"बैठिए। मैं चाय लाती हूँ।"

"अरे अभी तो आया हूँ बैठो ना," उसने हाथ पकड़ते हुए कहा। वह हाथ छुड़ा अन्दर चली गई। उसकी साँसें क्रोध से बढ़ गईं।

"मुझे अकेली देखकर इसकी इतनी हिम्मत बढ़ गई?" उसने पड़ोसन को फोन कर बुला लिया। उसे देख कर वह काम याद आने का बहाना कर चला गया।

"हाय अम्मा आपकी मौजूदगी में किसी की हिम्मत नहीं होती थी मुझे गन्दी निगाह से देखने की।"

सच दिखने में कमज़ोर वजूद लेकिन बुजुर्ग भी एक ताकत होते है। अब चारों तरफ की परेशानियों में गिरने लगी। जो बिजली का बिल चार हज़ार आता था अब छः हज़ार हो गया। पहले किराना का सामान दो हज़ार के स्थान पर तीन हज़ार हो गया।

"ओ अम्मा। आप क्यों चली गई? हाँ मैं पहले आपसे छुटकारा पाने की दुआ करती थी। मुझे आपका हर बात में टोकाटोकी करना नहीं सुहाता था लेकिन यह मालूम नहीं था की आप की हर बात मेरे लिए ढाल का काम करती थी।

सच है हर घर में बुजु़र्ग होना चाहिए। परिवार से बुजुर्गों को बेगरज़ मोहब्बत हो जाती है। लेकिन हर नई पीढ़ी सोचती है हम सही कर रहे हैं वे गलत है। वह सोफे पर बैठी फूट-फूट कर रोने लगी। अम्मा आप तो मेरे लिए सायबान थीं।

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