रोपित होता पल

01-09-2019

रोपित होता पल

डॉ. हंसा दीप

मैं लगभग दौड़ रही थी। आठ बजकर पचास मिनट वाली ट्रेन मुझे पकड़नी ही थी। अगर यह ट्रेन मैं नहीं पकड़ पायी तो आज तो अनर्थ हो जाएगा। इससे जुड़ी हुई अगली शटल बस भी नहीं मिल पाएगी और परीक्षा हाल में समय से नहीं पहुँच पाऊँगी, प्रश्नपत्र नहीं दिया जाएगा और छात्रों के द्वारा इसका एक बड़ा मामला बना दिया जाएगा। मेरे सौरमंडल में बड़ा ग्रहण लगने वाला था और मैं उसके प्रकोपों से भलीभांति परिचित थी, पाक-साफ कैरियर में दाग भी लग सकते थे।  

यही कारण था कि घर से स्टेशन तक की मैराथन की दौड़ में पहले नंबर पर थी मैं, मेरे पीछे कई लोग थे जो खरामा-खरामा चले आ रहे थे। मैंने अपना स्वर्ण पदक जीत कर सबसे पहले अंदर घुसने का रिकॉर्ड बना लिया था। अब केवल कार्ड स्वाइप करने भर की देर थी। लेकिन यह क्या, कार्ड मुझे हरी झंडी ही नहीं दिखा रहा था। एक बार में, दो बार में, तीसरी बार में भी नहीं..., हर बार लाल रंग का बड़ा-सा क्रॉस ही नज़र आ रहा था मशीन पर। मैं हक्का-बक्का थी, बार-बार वही देखना चाहती थी कि मशीन पर हरा रंग दिख जाए, अलट-पलट कर हर कोशिश से। एक तरह से मिन्नतें कीं उस मशीन से कि कैसे भी करके मेरा कार्ड स्वीकार ले क्योंकि अगर इसी समय अंदर दाख़िल नहीं हो पाई तो सामने खड़ी ट्रेन चली जाएगी और फिर अगली ट्रेन के लिये आधे घंटे की प्रतीक्षा अगले कई सालों तक मेरा पीछा करती रहेगी। 

चेहरे पर उड़ती हवाइयाँ बेबसी की कहानी कह रही थीं। यहाँ से कैसे निकला जाएगा, टैक्सी से पूरे पचास डॉलर का ख़र्च करके भी समय पर नहीं पहुँच पाऊँगी। सड़क के पूरे रास्ते में तो इस समय अधिकतम ट्राफ़िक होता है ऐसे में अंडरग्राउंड रेलवे ही शीघ्र पहुँचाने वाला रास्ता था। अब करूँ तो क्या करूँ, मेरा रक्तचाप उच्चतम अंक तक पहुँच गया था। सारी एहतियात बरतने के बावजूद इस बात का ख़्याल नहीं रखा था मैंने कि कभी किसी तकनीकी वज़ह से यह मेट्रो कार्ड काम नहीं करे तो विकल्प क्या होगा! मैं उस मेट्रो मशीन को देखते हुए एक मूर्ति में तब्दील होती जा रही थी, जड़वत, काठ-सी।    

तभी एक आवाज़ आयी, मधुर-मीठी-सी आवाज़, कानों में शहद उड़ेलती जो मुझसे कह रही थी – “आप मेरे कार्ड से निकल जाएँ...” वहाँ से बाहर निकलने वाली आवाज़ थी जिसने मेरे लिये अपना कार्ड स्वाइप करके मेरा मार्ग खोल दिया था। मैं बग़ैर पलक झपकाए अंदर घुस गयी थी। मानो वह मेरे लिये आख़िरी साँस हो अगर मैं चूक गई तो मृत्यु निश्चित है और उस संजीवनी साँस को लेकर मैंने ट्रेन में घुसकर ही दम लिया। जब सिर उठाकर पलट कर देखा तब उस लड़की को ढूँढ़ने लगी, वहाँ बहुत लोग थे पर वह नहीं थी। वह तो विपरीत दिशा में जा रही थी, वहाँ होती भी कैसे।

नि:संदेह यह कोई चमत्कार नहीं था कि सुबह की मेरी अच्छी, लंबी और ध्यानमग्न पूजा का प्रतिफल ईश्वर के द्वारा दे दिया गया हो। यह तो एक जीती-जागती लड़की की आवाज़ थी जिसने मेरी गहरी चिंता को भाँप कर तुरंत मदद का हाथ बढ़ा दिया था और फिर अपने रास्ते पर चली गयी थी। सवेरे-सवेरे किसके पास इतना समय होता है कि किसी के धन्यवाद का भी इंतज़ार करे। लेकिन मेरे लिये यह बहुत ही ग्लानि वाली बात थी कि मैं उसका धन्यवाद भी न कर सकी जिसने मुझे इतने बड़े संकट से बचाया था। वह देख रही होगी मेरी परेशानी को और मेरे लिये कार्ड स्वाइप करके वह भी जल्दी में होगी सो चली गयी होगी। मैं हर किसी के चेहरे को पढ़कर भाँपने की कोशिश करने लगी कि कोई तो मेरी ओर देखकर मुस्कुरा रहा हो ताकि मुझे मिली हुई मदद की प्रतिक्रिया देख सके मगर वहाँ तो हर कोई मेरी उपस्थिति से अनभिज्ञ होकर अपनी दुनिया में खोया हुआ था। आखिर थक-हार कर मैंने भी चेहरों को पढ़ना बंद कर दिया।  

तब से पूरे रास्ते में एक-एक करके वे सारे पल सामने आए जब मैंने ख़ुद को ऐसी स्थितियों से अलग कर लिया था। अपने-आपको स्व-केंद्रित करके हर किसी को जो उस समय मुसीबत में फँसा होता था मैं उसे उसके हाल पर छोड़ कर चल दिया करती थी। मदद नहीं की तो नहीं की पर उसके बाद कभी मदद न करने का अफ़सोस भी नहीं किया। आज मेरी मदद करके वह लड़की उन देखकर अनदेखे किए गए समय के टुकड़ों को मेरे सामने आने को मजबूर कर गयी थी। एक के बाद एक रील की तरह घूमते जा रहे थे वे दृश्य और ऐसा लग रहा था जैसे कि वे पल ही ऐसे नकचढ़े हों कि उन्हें किसी से कोई मतलब ही नहीं रहा हो, अलग से एटीट्यूड दिखाते, अपने में खोए, न लेना न देना मगन रहना की धुन में मस्ती से मेरी डोर को घुमाते, वरना इतनी निष्ठुर नहीं हूँ मैं जितनी उन पलों में हो जाती हूँ।       

वह सर्दियों की ठंडी शाम थी जब मैं घर लौट रही थी, मुझे कोई जल्दी नहीं थी। पाँच मिनट के बाद भी घर पहुँचती तो कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ता लेकिन तब भी मैंने उस महिला को देख कर भी नहीं देखा था। वह महिला जिसे शायद पता ही नहीं था कि वह सही दिशा में जा रही है या नहीं। वह परेशान होकर मदद के लिये इधर-उधर देख रही थी। चाहती तो मैं उससे पूछ सकती थी कि – “आपको कहाँ जाना है बताइए मुझे।” लेकिन मैं उसके पीछे से निकल कर अपने रास्ते चली गयी थी। हाड़-माँस के इंसान को अनदेखा करके इस तरह कन्नी काट कर गयी थी जैसे कि मेरे सामने कोई था ही नहीं। 

उस बस में एक दिन ऐसा ही वाक़या हुआ था। बस अपनी गति से चली जा रही थी सामने रास्ते से गुज़र रहे एक बुज़ुर्ग व्यक्ति को बचाने के लिए ड्रायवर ने ज़ोर से ब्रेक लगाया, धक्का कुछ ऐसा लगा कि एक महिला अपनी सीट से गिर कर चारों खाने चित्त हो गयी। ड्रायवर ने तुरंत बस रोकी। अब उस बस को कम से कम आधा घंटा लगना था वहाँ से खिसकने में। कितने बजे, कितने मिनट, कितने सेकंड का समय था, घटनाक्रम क्या था जब ब्रेक लगा था, किस स्थिति में महिला गिरी थी, उसे कितनी चोट लगी आदि सब कुछ विस्तार से नोट किया जाना था। इसीलिये बस के रुकते ही आगे-पीछे जहाँ से भी बाहर निकलने का रास्ता पास दिखा, एक-एक करके सारी सवारियाँ उतर कर चली गयीं। ज़ाहिर है कि उन सबमें मैं भी शामिल थी। उस महिला को मदद की ज़रूरत अवश्य रही होगी, किसी ने उसे पलट कर देखा तक नहीं कि वह किस हाल में है। भीड़ के साथ-साथ मैं भी उसे छोड़ कर चली गयी थी यह सोचते हुए कि “और लोग भी तो जा रहे हैं, मैं अकेली ही क्यों रुकूँ।” 

शायद यही विचार बस में सवार हर एक व्यक्ति के दिमाग़ में चल रहा होगा और देखते ही देखते बस खाली हो गयी थी। मैंने सोचा भी नहीं कि बेचारी बुज़ुर्ग महिला को कितनी चोट लगी होगी, एम्बुलेंस तो नहीं बुलानी पड़ी होगी... ऐसा-वैसा कोई सवाल उठा ही नहीं मन में, समय कहाँ था किसी की चिंता करने का। कोई गिरे या पड़े मेरी बला से, ऐसा ही कुछ सोचा होगा वहाँ से तेज़ी से निकल कर जाते हुए।   

एक बार नहीं कई बार ऐसा हुआ कि मैंने अपनी इंसानियत को दबा कर रखा। बार-बार दबा कर रखने से फिर अंदर छुपी वह मानवीय प्यार की झलक दिखना भी बंद हो गयी जो यदा-कदा दिख जाती थी। मेरा अकड़ूपन यहाँ-वहाँ हर जगह अपनी ही चिंता करता रहा, ‘मैं’ से बाहर कभी आया ही नहीं। हर बार एक तैयार बहाने के साथ कि – “मुझे देर हो रही है..., मेरे पास बिल्कुल समय नहीं है।” 

एक बार तो मेरी उपेक्षा इस क़दर अमानवीय थी कि इस समय वे पल मेरी आँखों के सामने से गुज़रते हुए मुझे आत्म-क्षोभ से भर गए। उस दिन सारी रात से क़हर ढाता बर्फ़ीला तूफ़ान थमा था लेकिन तापमान शून्य से बीस डिग्री नीचे था। फुटपाथ के रास्तों पर बर्फ़ जम गयी थी जिस पर पैरों को फिसलने से बचाना आसान नहीं था। उस समय एक माँ को अपने बच्चे के साथ रास्ता पार करना था। वह मदद के लिये इधर-उधर देख रही थी। उस माँ के साथ एक मासूम बच्चे को बचाने के लिये भी मेरे क़दम नहीं बढ़े थे। मजबूरन वह अपने बच्चे के साथ बर्फ़ीली फिसलन पर चल रही थी। उसका संतुलन बिगड़ा और वह गिरी, बच्चे का स्ट्रोलर भी उसके हाथ से छूट गया और फिसल कर जा टकराया बर्फ़ के ढेर से। मैं जा नहीं पायी बचाने के लिये क्योंकि मुझे डर था कि मैं अगर बचाने गयी तो मैं भी गिरूँगी। अगर चाहती तो एक कोशिश तो कर ही सकती थी मैं। यह भी संभव था कि शायद अपने को बचाते हुए मैं उन्हें भी बचा लेती और आज इन पलों में थोड़ा-सा अच्छा महसूस करवाती स्वयं को।

लेकिन नहीं, दिल तो ऐसा पत्थर हो जाता था उस समय कि बस अड़ ही जाता था न पसीजने के लिये। आज वह लड़की भी मुझे मेरे हाल पर छोड़ कर जा सकती थी परन्तु उसने रुककर, मेरी सहायता करके जैसे पाषाण को पिघला दिया था। उसके इस क़दम ने भविष्य के लिये मुझे इंसान बनाने की एक सफल कोशिश की थी, बाध्य कर दिया था कि मैं भी किसी की सहायता करने में पीछे न रहूँ फिर चाहे वे हाइवे पर किसी कार वाले के मदद माँगते हाथ हों या पार्क में साइकिल चला रहे बच्चों के टकराने की आवाज़ हो, फ़ुटपाथ पर ठोकर खाकर गिरता कोई अनजान शख़्स हो या फिर बग़ैर छतरी के पानी में भीगती बुज़ुर्ग महिला हो। एक के बाद एक, ऐसी सारी घटनाओं के दृश्य चल रहे थे सामने जब मैंने केवल अपने ही बारे में सोचा था, आसपास के लोगों की ओर देखा तक नहीं था।  

आगे जो होगा वह तो होगा पर इन बीते पलों की भरपाई कैसे करूँ मैं। अब न चाहते हुए भी वे सारे उपेक्षित किए गए पल कचोट रहे थे। अपनी उस बेरुख़ी का पश्चाताप मेरे लिये बेहद ज़रूरी हो गया था।

दूसरे दिन कक्षा का माहौल अलग था। सारे मिड-टर्म ख़त्म होने के बाद छात्र ख़ुश थे, परीक्षाओं का तनाव काफ़ी कम हो गया था जिसका प्रभाव उनके चेहरों से झलक रहा था। अक्सर मौखिक अभ्यास के दौरान हम हल्की-फुल्की बातें करते थे। आज वही वाक़या सुनाया मैंने कि किस तरह एक अनजान लड़की मेरी मदद करके चली गयी थी। जो पाठ मैंने अभी-अभी पढ़ा था उसे पढ़ाने की जल्दी जो थी मुझे। कक्षा में सभी ने सुना, आश्चर्यचकित हुए और उस लड़की के लिये तालियाँ बजने लगीं। सारे छात्र खड़े होकर उस अपरिचित मददगार की सराहना कर रहे थे तालियों की गड़गड़ाहट के साथ। 

मुझे लगा शायद मैंने पश्चाताप कर लिया है और उस अनजान लड़की के परोपकार की भरपाई हो गयी है। ये सारे छात्र भी अब किसी की मदद न करने के पहले एक बार सोचेंगे ज़रूर। एक नहीं कई लोग मैंने तैयार कर दिए थे उस कर्ज़ को चुकाने के लिये। मेरी हताशा-निराशा में कर्ज़ मुक्ति की अनुभूति तो हुई साथ ही ऐसा लगा जैसे इस एक पल ने उन सारे नकचढ़े पलों को मात दे दी हो। 

1 Comments

  • यही तो है नयी शुरुआत __ बगडे़ हुए पलों को सुधार लेने की कवायद । सहज ,सरल ममस्पर्शी भाव अभिव्यक्त करता हुआ आपका लेखन

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