मिथक और साहित्य

01-08-2021

मिथक और साहित्य

डॉ. रेखा उप्रेती

मिथक आदिम विश्वासों पर आधारित ऐसे आख्यान हैं जिनकी घटनाएँ और चरित्र प्राय: मानवेतर और तर्कातीत होते हैं लेकिन किसी सांस्कृतिक समाज के सामूहिक मन पर उसकी जड़ें गहरे समाई रहती हैं। प्रागैतिहासिक काल में मानव द्वारा कल्पित और सृजित ये आख्यान कालांतर में प्रकृति, इतिहास, सामाजिक-सांस्कृतिक द्वंद्व और विकास के समानांतर विकसित, परिवर्तित, परिवर्द्धित होते हुए मनुष्य की जातीय अस्मिता या सांस्कृतिक पहचान के रूप में अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं। डॉ. नगेन्द्र के शब्दों में कहें तो “सामान्य रूप से मिथक का अर्थ है ऐसी परम्परागत कथा जिसका संबंध अतिप्राकृत घटनाओं और भावों से होता है। मिथक मूलत: आदिम मानव के समष्टि-मन की सृष्टि है जिसमें चेतन की अपेक्षा अचेतन प्रक्रिया का प्राधान्य रहता है। मिथक की रचना उस समय हुई जब मानव और प्रकृति के बीच की विभाजक रेखाएँ स्पष्ट नहीं थीं – दोनों एक सार्वभौम जीवन में सहभागी थे। वे परस्पर सहयोग एवं संघर्ष के सूत्रों में बँधे हुए थे और चेतन मानव का मन अज्ञात रूप से प्रकृति की घटनाओं को अपने जीवन की घटनाओं तथा अनुभवों के माध्यम से समझाने का प्रयास करता था। समष्टि मन द्वारा प्रकृति के तत्वों और घटनाओं के मानवीकरण की यह अचेतन प्रक्रिया ही मिथक रचना का मूल है।” लम्बे समय तक कपोल कल्पित कथा या धार्मिक विश्वासों के रूप में रूढ़ मान लिए जाने के बावजूद आधुनिक युग में मिथकों के प्रति विद्वानों की धारणा में आमूल परिवर्तन उपस्थित हुआ। मिथक को ज्ञान की अनेक शाखाओं ने अपने अध्ययन का विषय बनाया और मिथक को मानव समाज के विकासात्मक अध्ययन और उसके सांस्कृतिक व्यक्तित्व की पहचान का महत्वपूर्ण माध्यम स्वीकार किया गया।

हिंदी में ‘मिथक’ शब्द अंग्रेज़ी शब्द ‘मिथ’ के पर्याय रूप में प्रयुक्त होता है। मिथ शब्द यूनानी भाषा के ‘माइथॉस’ से निष्पन्न है जिसका अर्थ है– ‘आप्तवचन’ अर्थात अतर्क्य कथन। हिंदी में मिथक शब्द स्वयं में आधुनिक युग की देन है। डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अंग्रेज़ी शब्द ‘मिथ’ के हिंदी पर्याय के लिए यह शब्द गढ़ा। कुछ विद्वान् संस्कृत शब्द ‘मिथस’ अर्थात ‘परस्पर’ से मिथक की अर्थ संगति मिलाते हुए इसे सत्य और कल्पना के परस्पर मिश्रण का वाचक मानते हैं तो एक धारणा ‘मिथ्या’ शब्द से इसकी समकक्षता बताते हुए इसे असत्य या कपोल कथा से जोड़ती हैं। डॉ. नगेन्द्र ने इन धारणाओं का खंडन करते हुए कहा है कि – “‘मिथक’ संस्कृत का सिद्ध शब्द नहीं है। संस्कृत में इसके निकटवर्ती दो शब्द हैं: 1) ‘मिथस’ या मिथ :- जिसका अर्थ है परस्पर और 2) ‘मिथ्या’, जो असत्य का वाचक है। यदि ‘मिथक’ का सम्बन्ध ‘मिथस’ से स्थापित किया जाए तो इसका अर्थ हो सकता है सत्य और कल्पना का परस्पर अभिन्न सम्बन्ध या एकात्म्य। मिथ्या से सम्बन्ध जोड़ने पर ‘मिथक’ का अर्थ ‘कपोल कथा’ बन सकता है। परन्तु, वास्तव में, ‘मिथ’ के पर्याय रूप में मिथक शब्द के निर्माण में अर्थ साम्य की अपेक्षा ध्वनि-साम्य की प्रेरणा ही अधिक रही है।”  

हिंदी आलोचना के क्षेत्र में ‘मिथक’ भले ही अर्वाचीन शब्द हो लेकिन मिथक की अवधारणा भारतीय साहित्य के लिए नयी नहीं है। मिथ या मिथक के समानार्थी अनेक शब्द भारतीय साहित्य में प्रयुक्त होते रहे हैं। कथा, गाथा, निजंधरी, देवकथा, धर्मगाथा, कल्प कथा, पुराण, पुराणकथा, पुरावृत्त, पुराख्यान जैसे शब्दों का प्रयोग मिथक के लिए होता रहा है। लेकिन आधुनिक काल में मिथ या मिथक शब्द की अर्थवत्ता व्यापक प्रसार प्राप्त कर गयी है और उपर्युक्त हिंदी पर्यायों से वह पूर्णत: व्यक्त नहीं हो पाती। इन सभी शब्दों की अर्थ परिधि मिथक के किसी न किसी तत्व से जुड़ी होने पर भी उसके सम्पूर्ण अभिप्राय को स्पष्ट नहीं कर पाती। फिर भी मिथक के स्वरूप को समझने में इन शब्दों की आंशिक भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। 

मिथक की कोई सर्वमान्य परिभाषा या उसके स्वरूप की निश्चित पहचान भले ही संभव न हो पर  मिथक संबंधी विभिन्न मतों के विवेचन के आधार पर मिथक के विषय में तीन तरह की धारणाएँ पहचानी जा सकती हैं। 

  •  मिथक आदिमानव के प्रकृति के साथ हुए साक्षात्कार की कथात्मक अभिव्यक्ति है। मानसिक विकास के प्रारंभिक स्तर पर मानव प्रकृति को अपनी ही तरह सजीव मानता था और प्रकृति की घटनाओं, प्राकृतिक दृश्यों, क्रियाकलापों, परिवर्तनों पर मानवीय आचरण और संबंधों का आरोपण करता था। इसी क्रम में मिथकों का निर्माण हुआ। इनका लक्ष्य जगत का काल्पनिक निरूपण नहीं बल्कि आदिम शैली में जगत के मूलभूल सत्य का गंभीर परिदर्शन है। प्रकृति के विभिन्न उपकरणों की अधिष्ठात्री शक्ति को देवी-देवता मानकर तथा उनकी उत्पत्ति, उत्पत्ति के कारण, कार्यकलाप, प्रणयाचार, अलौकिक चमत्कार, शक्तियाँ, महत्व, उपासना पद्धति आदि की व्याख्यात्मक अभिव्यक्ति मिथक है।

  •  मिथक  मानव का मनोवैज्ञानिक सत्य है। मिथक में आदि मानव की आदि जिज्ञासाओं, और कल्पनाओं की अभिव्यक्ति बिम्बों और रूपकों के माध्यम से हुई है। इनके माध्यम से आदि मानव की मानसिक सच्चाइयों का उद्घाटन होता है। ये सम्पूर्ण मानव जाति के सामूहिक अवचेतन के स्वप्न हैं, इच्छाजन्य दिवास्वप्न हैं, आभ्यांतर घटनाओं की, संवेदनाजन्य अनुभवों की प्रतीकात्मक अभिव्यक्तियाँ हैं।

  • मिथक आदिम समाज के जीवंत सन्दर्भ हैं। वे सामाजिक व्यवस्था के संरक्षण और दृढ़ीकरण का माध्यम हैं। गंभीर धार्मिक आवश्यकताओं, नैतिक आकांक्षाओं, सामाजिक स्वीकृतियों और व्यावहारिक आवश्यकताओं के तोष के लिए कहा गया आदिम वास्तविकता का कथात्मक पुनर्जन्म है। मिथकों की अपेक्षा उन सभी स्थितियों में होती है जिनमें किसी सामाजिक, नैतिक नियम, प्रथा, अनुष्ठान या विश्वास का समर्थन, प्राचीनता का प्रमाण, सत्यता और पवित्रता की आवश्यकता होती है।

ये तीनों प्रकार की धारणाएँ परस्पर विरोधी प्रतीत होने पर भी एक दूसरे की पूरक हैं और सम्मिलित रूप से मिथक के बहुआयामी स्वरूप पर प्रकाश डालती हैं। मिथकों का कथा संसार अलौकिक है, तर्क से परे है, लेकिन सृष्टि के साथ मानव के रागात्मक संबंधों को व्यक्त करता है।  वह एक ओर मानवीय इतिहास का प्रारंभिक चरण है तो दूसरी और मनुष्य की कल्पना शक्ति और सृजनात्मक चेतना की असीम संभावनाओं का भी परिचायक है। किसी भी देश या जाति की सांस्कृतिक विरासत को सँजोकर रखने में इनकी महती भूमिका होती है, इसी कारण डॉ. शम्भुनाथ सिंह मिथक को ‘जातीय अतीत का सबसे बड़ा खजाना’ मानते हैं।’ वस्तुत: मिथक किसी भी सभ्यता संस्कृति की पहचान का सशक्त साधन है। इसमें संस्कृति के विविध सूत्र जटिल संरचना में बुने रहते हैं और इन्हीं सूत्रों से किसी संस्कृति के विविध उपादान विकसित होते हैं।

मिथक और साहित्य

‘मिथक ही साहित्य है’ की घोषणा करने वाले आधुनिक अमरीकी समीक्षक रिचर्ड चेज़ का तर्क है कि साहित्य का शुद्ध रूप मिथकात्मक ही होता है और उसी के आधार पर साहित्य या कला का मूल्यांकन होना चाहिए। वे मानते हैं कि मिथक के अतिरिक्त साहित्य या कला में जिन तत्वों की खोज की जाती है वे उसके अन्तरंग तत्व नहीं हैं। चेज़ के अतिरिक्त हर्बर्ट रीड, लेस्ली फीडरल और नार्थोप फ्राई आदि आलोचकों ने भी साहित्य में मिथक की अनिवार्य उपयोगिता का उद्घोष किया। यद्यपि अधिकांश विद्वान इस प्रकार के मत को अतिवाद से ग्रस्त मानते हैं। स्वयं रिचर्ड चेज़ ने भी कालांतर में अपने मत में बदलाव करते हुए स्वीकार किया कि ‘मिथक सम्पूर्ण साहित्य का नहीं वरन एक विशेष प्रकार के साहित्य का प्रकार है।’  मनोविज्ञान भी मिथक और साहित्य के बीच जन्मजात सम्बन्ध स्वीकार करता है। फ्रायड दोनों को अवचेतन मन की प्रतीतियों का व्यक्त रूप कहते हैं। वे मानते हैं कि स्वप्न की तरह साहित्य और मिथक भी अवचेतन मन की इच्छापूर्ति के साधन या विधान हैं। किन्तु मनोविज्ञानवादियों  का यह मत अंशत: ही मान्य है क्योंकि साहित्य के कुछ रूपों जैसे स्वप्न कथा आदि के सन्दर्भ में ही यह तथ्य लागू हो सकता है। हर प्रकार के साहित्य को अवचेतन मन की इच्छापूर्ति मात्र नहीं माना जा सकता। मिथक और साहित्य में एक समानता यह भी है कि दोनों में मनुष्य के रागात्मक भावों का प्राधान्य रहता है। वस्तुपरक सत्य आत्मपरक होकर ही अभिव्यक्ति पाता है। डॉ. नगेन्द्र के शब्दों में– “साहित्य और मिथक दोनों ही मानव की समग्र चेतना अथवा समग्र मानव की चेतना को वाणी  प्रदान करते हैं। इसी अर्थ में मिथक तथा साहित्य दोनों को लोक-मानस की अभिव्यक्ति माना गया है।” मिथक और साहित्य दोनों में शाश्वत सत्य और युगीन सत्य का सम्मिलित रूप व्यक्त होता है और दोनों जीवन की सार्वभौम अनुभूतियों को व्यंजित करते हैं। इसप्रकार साहित्य और मिथक की अवधारणाएँ एक दूसरे से साम्य रखती हैं और एक दूसरे के संरचनात्मक उपकरणों का भी उपयोग करती हैं, फिर भी दोनों अभेद नहीं हैं। साहित्य के अनेक रूपों में मिथकीय तत्व नहीं होता और मिथक की सारी सामग्री साहित्य नहीं कही जा सकती। भारतीय साहित्य में मिथकों का बहुतायत प्रयोग मिलता है, फिर भी पुराणों को साहित्य न कहकर शास्त्र माना गया है। मिथक और साहित्य के पृथकत्व का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि भारतीय काव्यशास्त्र में पुराण को साहित्यिक परिधि से बाहर रखा गया है, जबकि प्राचीन भारतीय साहित्य की सभी विधाएँ पुराणों के आख्यानों को आधार बनाकर रची गयी हैं। 

तात्विक और स्वरूपगत अंतर होने पर भी यह निर्विवाद है कि साहित्य निरंतर मिथक को विषयवस्तु या अभिव्यक्ति के उपकरण के रूप में प्रयोग करता रहा है और मिथक साहित्य के माध्यम से अपना स्वरूप विकसित, परिवर्तित और परिवर्धित करता रहता है। किसी भी संस्कृति में मिथकों की उपस्थिति जहाँ एक ओर उसके धार्मिक विश्वासों के रूप में सुरक्षित है तो दूसरी ओर साहित्य ने भी उसे जनमानस की स्मृति में रचनात्मक रूप से जगाए रखा है। हेराल्ड के. शिलिंग ने भी समाजतात्विक  दृष्टि से मिथक का विश्लेषण करते हुए माना कि मिथक साहित्य का ऐसा माध्यम है जो किसी संस्कृति के मूल, गहनतम आस्थाओं, विश्वासों और अंतर्दृष्टि की अभिव्यक्ति के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है। मिथक समाज और समय सापेक्ष होते हुए जातीय मूल्यवत्ता के वाहक होकर साहित्य में प्रस्तुत होते हैं। भारतीय सन्दर्भों में देखें तो हमारी मिथकीय आस्थाएँ साहित्य के रूप में अधिक सुदृढ़ रही हैं, इसीलिए वैदिक मिथकों के इंद्र, वरुण आदि देवताओं के स्थान पर साहित्य में सँजोए गए राम, कृष्ण आदि के चरित्र जनमानस को अधिक उद्वेलित, प्रेरित करते हैं।

प्रारंभ में साहित्य और मिथक समरूप ही नहीं बल्कि अभिन्न थे। डॉ. नगेन्द्र के शब्दों में– “साहित्य में मिथक का प्रयोग आरम्भ से ही होता रहा है, वरन कहना यह चाहिए कि साहित्य का आरम्भ मिथक से हुआ है या साहित्य मूलत: मिथक रूप ही था। भारतीय साहित्य का आदि रूप वैदिक मिथकों में प्राप्त होता है, उधर यूरोपीय साहित्य का मूल रूप भी होमर-पूर्व काल के यूनानी मिथकों में मिलता है और मध्य एशिया तथा पूर्वी एशिया के चीनी-जापानी साहित्य के विषय में भी यही सत्य है।”  भारतीय महाकाव्यों– रामायण और महाभारत में मिथकों को आधार बनाकर जिस साहित्य की नींव रखी गयी वह सम्पूर्ण भारतीय साहित्य का उपजीव्य बनकर शताब्दियों तक निरंतर साहित्य रचना का अजस्र स्रोत बनी रही। मध्यकालीन और आधुनिक साहित्य में भी मिथकीय आख्यानों को आधार बनाकर रचना करने की प्रवृति में कोई न्यूनता नहीं आयी। आधुनिक कविता में मिथक पर शोध करते हुए डॉ. शम्भुनाथ सिंह ने लिखा है– “कविता में इसके महत्त्व का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि मिथक की अवधारणाओं से ठीक परिचित हुए बिना भी हिंदी के आधुनिक कवियों की श्रेष्ठतम उपलब्धियाँ मिथकीय कथाओं पर आधारित हैं। बाक़ी में भी प्रतीक या संकेत के स्तर पर मिथक की भूमिका निर्णायक है।” 

वस्तुत: संस्कृत से लेकर अर्वाचीन भारतीय भाषाओं के अत्याधुनिक युग तक सभी साहित्यकार अपनी कथा संरचना में मिथकीय आख्यानों का आश्रय लेते आए हैं। भास, कालिदास, भारवि, श्री हर्ष, क्षेमेन्द्र, कुमारदास प्रभृति संस्कृत के कालजयी महाकवि, विमल सूरि, स्वयम्भू, पुष्यदन्त जैसे प्राकृत अपभ्रंश के प्रमुख कवि, कंबन, पम्प, सारलादास, बलरामदास, कृत्तिवास, काशीराम दास, एक नाथ, माधव कन्दली, शंकरदेव, तुन्चन, नन्नय, मोल्ल, तुलसीदास, प्रेमानंद, जैसे भारतीय भाषाओं के महाकाव्यकार, जयदेव, विद्यापति, ज्ञानेश्वर, चंडीदास, सूरदास, आण्डाल, मीरा बाई जैसे लोकप्रिय गीतकार, भारतेंदु, सुब्रह्मण्य भारती, माईकल मधुसूदन दत्त, रवीन्द्र नाथ टैगोर, मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, शिवाजी सावंत, भैरप्पा, दिनकर, धर्मवीर भारती, गिरीश कर्नाड, प्रतिभा राय, नरेंद्र कोहली आदि आधुनिक चेतना संपन्न सृजनकार सभी मिथक के दुर्निवार आकर्षण में बँधे हैं और युगानुरूप उसके पुनर्सृजन में सफल रहे हैं।

संदर्भ ग्रंथ —

नगेन्द्र- मिथक और साहित्य 
ए.ए. मैकडोनल- वैदिक माइथॉलोजी
शम्भुनाथ- मिथक और आधुनिक कविता 
रमेश गौतम- हिंदी नाटक: मिथक और यथार्थ  
विजयेन्द्र स्नातक- भारतीय मिथक कोश
राधाकृष्णन- द हिन्दू व्यूज़ ऑफ़ लाइफ़ 
उषा पुरी विद्यावाचस्पति- भारतीय मिथक कोश 
रमेश कुंतल मेघ, 2008,  मिथक से आधुनिकता तक 

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