किराए का मकां

रचनासिंह 'रश्मि'

वो घर मेरा था....
मकां किराए का था
ऐश-ओ-आराम नहीं
पर वहाँ मेरे
सुखों का सामान था
पूरेपन से महकता
कमरा, रसोई, आँगन था
घर के बाहर पेड़-पौधे
गलियों में अपनापन था
जहाँ बसा घर मेरा
उसका मुझमें बसेरा था
चाँदनी रातें
ख़ुशनुमा सवेरा था
वो घर मेरा था....।

एक दिन वो आया
मकां अपना बनाया
नया जहां बसाया
छोड़कर जाने का
समय आया था
चलते समय लगा
दीवारों को बाहों में भर लूँ
बाहर खड़े दरख़्तों से
कुछ बातें कर लूँ
जी घबराया
आँखो से पानी आया था
इस घर से रिश्ते गहरे
मेरी यादों के झरोखे थे
मकां वो छूट गया
स्मृतियों के डेरे
मुझको हैं घेरे।

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