24-02-2008

जब कभी मैं अपने अंदर देखता हूँ

सजीवन मयंक

जब कभी मैं अपने अंदर देखता हूँ।
क्या बताऊँ कैसे मंजर देखता हूँ॥


अर्श मुट्ठी में सिमट कर आ गया।
एक क़तरे में समंदर देखता हूँ॥


बाढ़ में डूबी हुई है पूरी बस्ती।
वहीं अपना डूबता घर देखता हूँ॥


मुल्क के लोगों में क्यों दहशत भरी है।
क्या हुआ घर से निकलकर देखता हूँ॥


अपने वादे रोज़ ही वो भूल जाता।
एक दिन में भी मुकर कर देखता हूँ॥


ख़्वाबगाहों से कभी निकले नहीं वो।
आज मैं उनको सड़क पर देखता हूँ॥


खो गया है इस ज़माने में कहीं पर।
कहाँ है अपना मुकद्दर देखता हूँ॥


आज संसद मुख्य मुद्दे भूल बैठी।
बेतुकी बातें ही अक्सर देखता हूँ॥


लाठियों से बात करती है हुकूमत।
हर जगह मैं अपना ही सर देखता हूँ॥

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