घर-घर पढ़ा जाने वाला उपन्यास - ‘जिन्हें जुर्म-ए-इश्क़ पे नाज़ था’

15-08-2019

घर-घर पढ़ा जाने वाला उपन्यास - ‘जिन्हें जुर्म-ए-इश्क़ पे नाज़ था’

डॉ. सुधा ओम ढींगरा

घर-घर पढ़ा जाने वाला उपन्यास - ‘जिन्हें जुर्म-ए-इश्क़ पे नाज़ था’
पुस्तक : जिन्हें जुर्म-ए-इश्क़ पे नाज़ था (उपन्यास)
लेखक : पंकज सुबीर
प्रकाशन : शिवना प्रकाशन, पी.सी. लैब, सम्राट कॉम्प्लैक्स बेसमेंट, सीहोर, मप्र, 466001, दूरभाष- 07562405545 
प्रकाशन वर्ष : 2019
मूल्य : 200 रुपये
पृष्ठ : 288

ऐसा अद्भुत उपन्यास बहुत कम पढ़ने को मिलता है। हिन्दी साहित्य में तो मैंने पहला ही पढ़ा है। समसामयिक, दुर्लभ, नाज़ुक, गंम्भीर और चिंतनशील विषय का कुशलता से निर्वाह किया गया है। ग़ज़ब की क़िस्सागोई। जो विषय उपन्यास में उठाया गया है, वह विषय अपने आप में बहुत सी भ्रांतियाँ, पूर्वाग्रह, संशय, विरोधाभास और प्रश्न समेटे हुए है। जिन्हें लेकर बुद्धिजीवी अक्सर द्वंद्व में और अंधविश्वासी भ्रम में रहते हैं। जिसकी थाह सही अर्थों में कोई नहीं पा सका, मगर अपने-अपने तरीक़ों से उसे परिभाषित ज़रूर कर दिया गया है। उपन्यास धर्म की भ्रांतियों, पूर्वग्रहों, संशय और विरोधाभासों को स्पष्ट करता हुआ कई प्रश्नों के उत्तर देता है। पाँच हज़ार साल के इतिहास को नई दृष्टि से देखा और परखा गया है। 

डैन ब्राउन ने ‘द विन्ची कोड’ में बाइबल की थियोरी और सलमान रश्दी ने ‘स्टैनिक वर्सेज़’ में क़ुरआन में तथ्यों के आभाव पर रोशनी डाली है। पर पंकज सुबीर ने अपने उपन्यास ‘जुर्म-ए-इश्क़ पे नाज़ था’ में सभी धर्मों के मूल तत्व, जिस पर हर धर्म टिका हुआ होता है, की पड़ताल की है। मूल तत्व जिसे हर धर्म में भुला दिया गया है; जिससे हर धर्म का स्वरूप ही भिन्न हो गया है। काग़ज़ों पर लिखे शब्दों के अर्थों को ही बदल दिया गया है। अफ़सोस की बात है कि भारतीय दर्शन, मीमांसा, जीवन पद्धति तक उसे भुला चुके हैं। पाँच हज़ार साल पहले के इतिहास, विभिन्न धर्मों पर किया गया शोध, हिन्दू धर्म की, इस्लाम की, यहूदियों की, क्रिश्चियन की, बौद्धों की, पारसियों की और जैन धर्म की तथ्यों से भरपूर ढेरों जानकारियाँ हैं। इतिहास को खंगालता, शोध परक और बौद्धिक श्रम लिए उपन्यास का एक-एक पृष्ठ भीतर के ज्ञान-चक्षु खोल देता हैं और उपन्यास हाथ से छूटता नहीं।

लेखक ने निर्लिप्त होकर, निष्पक्ष लिखा है। उपन्यास पढ़ते हुए महसूस होता है जैसे किसी मलंग ने या सूफ़ी लेखक ने लिखा है, जिसके लिए सब धर्म एक बराबर हैं। न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर.... बस सभी धर्मों का मूल मन्त्र, प्रेम, विश्वास और इंसानियत की पैरवी की है। ये हैं तो हिंसा पैदा ही नहीं होती। दुःख की बात तो यही है कि आज धर्मों में यही मूल मन्त्र ग़ायब हैं और हिंसा बलवती हो गई है। अहिंसा तो भारतीय मूल्यों में भी मिटती जा रही है, जो पूरे विश्व में हमारी पहचान है। उपन्यास में लेखक ने दुनिया के सभी प्रमुख धर्मों पर बात की है, उनके सिद्धांतों पर चर्चा की है। हर धर्म के मूल तक पहुँच कर लेखक ने अपने पाठक के लिए जैसे किसी नई दुनिया के दरवाज़े खोलने का काम किया है। जैसे-जैसे पाठक इस उपन्यास को पढ़ता जाता है, वैसे-वैसे उसके सामने नई-नई जानकारियों के दरीचे खुलते जाते हैं। लेखक समभाव से समदृष्टि रखते हुए हर धर्म के बारे में पड़ताल करता हुआ गुज़र जाता है। 

हालाँकि यह मेरा प्रिय विषय है और मैंने स्वयं भी इस विषय पर बहुत शोध किया हुआ है। पर इस उपन्यास ने मेरी तलाश और भटकन दूर कर दी। 

उपन्यास के आरंभ में ही लेखक ने एक लम्बी चर्चा के माध्यम बहुत सारी बातों की व्याख्या की है। इस व्याख्या में उदाहरण लिए हैं, संदर्भ लिए हैं और उनके द्वारा धर्म का फिर से परिभाषित करने का कार्य किया है। यदि आप यह कहेंगे कि यह उपन्यास धर्म को ख़ारिज करता है, तो आप ग़लत होंगे, यह उपन्यास असल में धर्म में आए हुए विचलन को, भटकाव को ख़ारिज करता है। यह पहुँचने की कोशिश करता है उन बिन्दुओं तक, जो दुनिया के हर धर्म में मानव के भले के लिए तय किए गए थे।

यह उपन्यास केवल एक उपन्यास नहीं है, यह असल में एक समीक्षा है कि हमारी यह मानव जाति पाँच हज़ार साल पहले अपने लिए क्या तय कर के निकली थी और आज पाँच हज़ार साल बाद कहाँ है? यह उपन्यास परत दर परत पाँच हज़ार सालों की कहानी को स्पष्ट करता हुआ चलता है। और उस कहानी के साथ फिर-फिर लौटता है आज की कहानी पर। भारत-पाक विभाजन पर बहुत सी रचनाएँ सामने आई हैं, लेकिन यह अपनी तरह का एक अनोखा प्रयास है, जिसमें विभाजन के मूल कारणों तक जाने की कोशिश की गई है। इतिहास के पात्रों के साथ सवाल-जवाब करते हुए उस विभाजन के सूत्र तलाशने की कोशिश लेखक ने की है। यही कोशिश इस उपन्यास को अपने समय से आगे का उपन्यास और अत्यंत विशिष्ट उपन्यास बना देती है। जो नई सूचनाएँ भारत  और पाकिस्तान के विभाजन को लेकर सामने आती हैं उन्हें पढ़कर पाठक दंग रह जाता है। यह उपन्यास उस धीमी प्रक्रिया का विस्तार से विश्लेषण करता है, जो अलगाववाद के रूप में पैदा हो रही होती है। और जिसकी परिणति अंततः भारत-पाक विभाजन के रूप में सामने आती है। इस पूरी प्रक्रिया की बात करते समय लेखक किसी को क्षमा नहीं करता है। वह इतिहास के हर उस पात्र को कठघरे में खड़ा करता है, जो भारत-पाक विभाजन से जुड़ा हुआ है।

‘जिन्हें जुर्म-ए-इश्क़ पे नाज़ था’ एक रात का उपन्यास है। क़स्बे और उसके पास की बस्ती में किन्हीं कारणों से दो सम्प्रदायों के मध्य दंगे शुरू हो जाते हैं।  दंगे के कारणों को उपन्यास पढ़ कर ही जाना जा सकता है। दंगों से पैदा हुई दहशत, असुरक्षा और ख़ौफ़ की रात का इतना स्वाभाविक और बख़ूबी से चित्रण किया गया है कि भय का क़हर बरपाने वाली रात बेहद वास्तविक लगती है और पाठक स्वयं को दंगे में फँसा हुआ महसूस करता है। 

उपन्यास के मुख्य पात्र रामेश्वर का चरित्र शुरू से लेकर अंत तक बहुत परिपक्व और सुलझा हुआ रहता है। लेखक ने इस पात्र का निर्वाह बेहद कुशलता से किया है, बौद्धिकता से लबालब और संवेदना से भरपूर। धर्म और सम्प्रदाय, राजनीति में धर्म का प्रवेश, देश का बँटवारा, कांग्रेस, मुस्लिम लीग, हिंदू महासभा, आर एस एस, सांप्रदायिक दंगे और उनके पीछे की तथ्य परक कहानियाँ दंगे के दौरान वह बताता है। रामेश्वर जो कहता है, इस कहन को जिस शैली में बाँधा गया है, वह अक्सर उन विदेशी उपन्यासों में देखने को मिलती है, जिनमें इतिहास के तथ्यों की पुष्टि की जाती है। 

ज़िला कलेक्टर वरुण कुमार और एडिशनल एस पी भारत यादव दो ऐसे पात्र हैं, जो सरकारी तंत्र और प्रशासन के प्रति विश्वास और आदर पैदा करते है। दंगे में वे सिर्फ़ इंसानियत धर्म को निभाते हैं और दंगाइयों को पछाड़ कर पीड़ितों को बचाते हैं। युवा पात्र विकास, खुर्शीद को सही मार्गदर्शन मिलने पर उनका बेहतरीन सामने आता है। 

युवा पीढ़ी उचित मार्गदर्शन के आभाव में कन्फ्यूज़्ड है। धार्मिक ग्रंथों की शिक्षाएँ, व्याख्या और अर्थ ही धार्मिक नेताओं ने सुविधानुसार बदल दिए हैं; जिससे युवा पीढ़ी भटक गई है, सही अर्थों में धर्म को, उसकी परिभाषा को समझती ही नहीं। सोशल मिडिया मनघड़ंत ज्ञान बाँट रहा है। ऐसे में ‘जुर्म -ए-इश्क़ पे नाज़ था’ ताज़ी हवा के झोंके सा महसूस होता है, जो दिल दिमाग़ के सारे जाले साफ़ कर देता है।

मुख्य पात्र रामेश्वर द्वारा विकास को कही गईं कुछ बातें मन -मस्तिष्क पर गहरी छाप छोड़ती हैं -

“सुनो बच्चे.....नफ़रत करना बहुत आसान है, लेकिन प्रेम करना बहुत मुश्किल है। इसलिए ये दुनिया आसान काम को ही चुनती है। मगर जीने के लिए का असली आनंद मुश्किल काम करने में ही है। मार देना बहुत आसान है, मगर बचा लेना बहुत कठिन है। इसलिए ज़्यादा लोग पहले वाले आसान काम को ही चुनते हैं। एक बात याद रखना भीड़ जिस भी दिशा में जा रही होती है वह दिशा और वह रास्ता हमेशा ग़लत होता है। भीड़ कभी सही दिशा में नहीं जाती है इसलिए क्योंकि भीड़ स्वयं नहीं चलती उसे चलाया जाता है।” 

“पाकिस्तान बन जाने के बाद भी जो मुसलमान यह देश छोड़कर वहाँ नहीं गए, वो सब हमारे भरोसे पर यहाँ रुक गए थे। इस भरोसे पर कि कुछ भी हुआ तो हम उनको बचाएँगे। जिस तरह यह सलीम यहाँ रुका हुआ है न हमारे भरोसे पर, ठीक उसी तरह। अब ये हम सब की ज़िम्मेदारी है कि हम इस भरोसे को बचा कर रखें। हमारे अपने ही कुछ लोग हमें इस भरोसे को तोड़ देने के लिए उकसाते हैं, लेकिन तोड़ने वालों को कभी याद नहीं रखा जाता, जोड़ने वालों को याद रखा जाता है।”
 
एक जगह रामेश्वर भारत को बताता है, “मुसलमानों ने अपनी कट्टरता नहीं छोड़ी और धीरे-धीरे यह हुआ कि हिन्दू, जो दुनिया के दूसरे धर्मों के मुक़ाबले में कम कट्टर धर्म था, वह भी कट्टर होता चला गया। हिन्दुओं ने धार्मिक कट्टरता का पाठ मुसलमानों से ही सीखा है। आज तो स्थिति यह है कि आज का हिन्दू तो मुसलमानों की तुलना में और अधिक कट्टर हो गया है। और अब यह कट्टरता ही मुसलमानों को परेशान कर रही है।”

“भारत में इस्लाम कैसा होना चाहिए! यह बात केवल सूफ़ी संतों ने समझी, लेकिन उन सूफ़ी संतों का संदेश ही मुसलमान नहीं समझ पाए। मुसलमानों ने अपना आदर्श सूफ़ी संतों को न बनाकर आक्रमणकारी योद्धाओं को बनाया।”

उपन्यास पढ़ते हुए ऐसी बहुत सी बातें हैं जो जिज्ञासा बढ़ाती हैं। उत्सुकता जागती है, कभी मन विचलित होता है, कभी शांत तो कभी उद्वेलित। 

रामेश्वर के साथ एक और पात्र है, शाहनवाज़। रामेश्वर उन्हें अपने बेटा मानते हैं और उसी के इर्द-गिर्द सारा उपन्यास घूमता है। बहुत कुछ आपको बता दिया, अब आप उपन्यास पढ़ कर पूरी कहानी जानें। इतना कहूँगी कि उपन्यास बेहद पठनीय है और यह उपन्यास घर-घर पढ़ा जाना चाहिए। लेखक ने शिल्प में कई नए प्रयोग किए हैं, जो उपन्यास को रोचक बनाते हैं। 

मुझे अंत बहुत प्रभावशाली लगा। बेहद सकारात्मक। दंगे के बाद जिस भारत का जन्म होता है, उसे हिन्दू और मुसलमान दोनों थामते हैं।

डॉक्टर जोसफ़ मर्फ़ी की पुस्तक ‘दा पॉवर ऑफ़ यौर सब कांशियस माइंड’ पूरे विश्व में बहुत पढ़ी गई; क्योंकि इस पुस्तक में लेखक ने उस शक्ति को मनुष्य के भीतर बताया है, जिसे सभी धर्मों में तलाशा जाता है। अपनी भिन्नता के कारण यह पुस्तक बहुत सराही गई है। 

‘जिन्हें जुर्म- ए-इश्क़ पर नाज़ था’ पंकज सुबीर का उपन्यास भी एक भिन्न संदेश देता है और एक ऐसा पैग़ाम ले कर आया है, जिसे पढ़ कर ही समझा जा सकता है।

सुधा ओम ढींगरा
संपर्कः 101,  Guymon Ct., Morrisville, NC- 27560, USA
ईमेलः sudhdrishti@gmail.com
 

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