दुनिया की छत - 5 स्केन्सेन : जीता-जागता अजायबघर

15-12-2019

दुनिया की छत - 5 स्केन्सेन : जीता-जागता अजायबघर

डॉ. रेखा उप्रेती

स्टॉकहोम में आज हमारा दूसरा दिन है। महलों, क़िलों, अजायबघरों की भरमार है चौदह द्वीपों में फैले इस शहर में। सब कुछ तो देखा नहीं जा सकता, और सच कहें तो बंद गलियारों में सजी नुमाइश देखने की बहुत ललक है भी नहीं। वातानुकूलित चारदीवारी के गाइडिड टूर नहीं...हम चाहते हैं खुला-उघड़ा परिवेश... जहाँ उन्मुक्त हवाओं में साँस लेते हुए अपनी इच्छा से चहल क़दमी की जा सके। 

कल गेम-ला-स्तेन में एक भारतीय दूकानदार से बातचीत करते हुए पता चला था एक ओपन-एयर-म्यूज़ियम के बारे में .. तो हम वहीं जाने का निश्चय कर रहे हैं। होटल से चेक-आउट कर लिया है और सामान क्लॉक-रूम में रखवा हम निकल पड़े हैं। हमें दोर्गार्दोन द्वीप पर जाना है। पहले सेन्ट्रल स्टेशन जाएँगे, वहाँ से ट्राम लेकर आगे प्रस्थान करेंगे। 

पर कहने-सुनने में यह जितना आसान लग रहा है, उतना है नहीं। दरअसल स्टॉकहोम ख़ासा भीड़-भाड़ वाला शहर है। कल शाम वापस लौटते हुए भी अहसास हुआ कि मेट्रो खचाखच भरी हुई है। अपनी दिल्ली मेट्रो और राजीव-चौक की ठेलम-ठेल का स्वाद याद आ गया। आज सुबह भी वही हाल है। हर दो-तीन स्टेशन के बाद मेट्रो बदलनी पड़ रही है। जहाँ से बदलनी है वहाँ भी सही प्लेटफ़ॉर्म को ढूँढ़ना और पहुँचना मशक़्क़त का काम है। यहाँ से इतनी दिशाओं के लिए इतनी सारी लाइंस हैं कि अच्छा-ख़ासा दिमाग़ भी चकरा जाता है। 

 

सेंटर-स्टेशन से बाहर निकल हम ट्राम टर्मिनल की तरफ़ बढ़ रहे हैं। यहाँ से 7 नंबर की ट्राम हमें हमारे लक्ष्य द्वीप तक ले जाएगी। टर्मिनल पर भीड़ है। हम क़तार में काफ़ी पीछे खड़े हैं और जब तक ट्राम में चढ़े हैं, वह बेहिसाब भर चुकी है। ख़ैर दिल्ली के सार्वजानिक वाहनों में सफ़र करने वालों को इस तथ्य से परेशानी नहीं होनी चाहिए। हम धीरज धर खड़े हैं। इस उम्मीद में कि किसी स्टेशन में यह ख़ाली होगी और बैठने की सीट न सही, सीधे खड़े हो सकने की आरामदायक जगह ज़रूर मिल जाएगी। मगर ये हो न सका… लगभग 35 किलोमीटर की यह दूरी 25 मिनट तक बिना हिले-डुले खड़े रहकर ही पार करनी पड़ी। हमारा स्टॉप अभी दो स्टेशन आगे है, पर जाने क्या सोचकर हम एक मनोरम-से दिखते स्थल पर उतर गए हैं।

ट्राम से उतर तो गए हैं पर यह नहीं पता कि अब किस दिशा में जाना है। हम थोड़ा-सा पीछे की तरफ़ जाकर एक साइड रोड पकड़ लेते हैं। राह है… कहीं तो ले जाएगी। राह के साथ-साथ मुड़ते हुए हम एक बड़े से पार्क में पहुँच गए हैं। यहाँ छोटे बच्चों का कोई शिविर चल रहा है शायद..। माँ या पिता की उँगलियाँ थामे नन्हे-मुन्ने इस ओर बढ़ रहे हैं।.. रास्ता घूमता-घामता हमें झील किनारे ले आया है। घने पेड़ों के झुरमुट तले शीतल छाया में हमें बिठा ख़ुद ग़ायब होता कह रहा है, “लो, इससे अच्छे ठौर पर तुम्हें और कौन-सी राह ले आता भला!!”

 झील का पाट काफ़ी चौड़ा है। दूर दूसरे किनारे पर अर्धगोलाकार बनाती अनेक नई-पुरानी इमारतें दिख रही हैं। इस किनारे पर नीचे पैर लटका कर हम बैठ गए हैं। हल्की-हल्की लहरें किनारे से टकरा हमारा हाल पूछ जाती हैं। हवा में झूलते पत्तों के पंख अलग सत्कार में लगे हैं। ऐसा सुकून है कि हम यहाँ से हिलना नहीं चाहते। 

“आगे चलें क्या?” हम दोनों बीच-बीच में एक-दूसरे का मन टटोलने को पूछ लेते हैं। आख़िर इस प्रश्न को कब तक टाल सकते हैं। चला जाए।
आज धूप का मिज़ाज कुछ गरम है। चलते-चलते प्यास लग आयी है। सड़क कोने के एक ठेलेनुमा रेस्तरां से पानी और कोक ख़रीद हम फिर से मुख्य सड़क पर आ गए हैं। वहीं, जहाँ बिना सोचे ट्राम से उतर गए थे। हमें जिस पार्क या ओपन एयर म्यूज़ियम में जाना है, वह यहाँ से दो स्टॉप आगे है। इस स्थान पर लगे एक साइनबोर्ड पर ही बारह अलग-अलग अजायबघरों के नाम और दिशा संकेत दिख रहे हैं। लगता है यहाँ लोग कम अजायबघर ज़्यादा हैं। इधर हमारे ठीक सामने भी एक बहुत प्रसिद्ध और काफ़ी बड़ा म्यूज़ियम खड़ा है। “नौरदिस्का म्युसीत” यानी “नोर्दिक म्युसियम”। ख़ूब ऊँची इमारत नायाब-सी है, जो दूर-दूर से नज़र आती है। मुख्य द्वार तक पहुँचने के लिए भी पच्चीस-तीस सीढ़ियाँ हैं। कम ऊँची और ख़ूब लम्बी सीढ़ियाँ..। हम सीढ़ियाँ चढ़कर इमारत के साथ तस्वीर क्लिक कर नीचे उतर आए हैं। म्युसियम की इस आलीशान इमारत के भीतर पंद्रह सौ तेईस ईस्वी से लेकर अब तक की नोर्दिक जीवन-शैली के नमूने संगृहीत हैं, ऐसा बाहर लिखा हुआ है। 

भीतर जाकर तो नहीं पर सामने से आती 7N नंबर की दो डिब्बे वाली ट्राम में चढ़कर हमने नोर्दिक जीवन-शैली के एक नमूने को तो अकस्मात् देख ही लिया। यह सोचकर की 7 नंबर वाली ट्राम हमें सही ठिकाने पहुँचा देगी, हम उसके पीछे वाले कोच में चढ़ गए। पर भीतर का नज़ारा देखकर हम कुछ अचकचा गए हैं। कोच में कैफ़े जैसा माहौल है। मेज़-कुर्सियों के बीच पेस्ट्री और चाय या कॉफ़ी के प्याले भरे हैं और अधेड़ उम्र की महिलाएँ और सज्जन बैठे उसका आनंद ले रहे हैं। हम अचकचाए खड़े हैं और सबकी नज़र एक साथ हमारी ओर उठ आयी है। हमें सहसा समझ नहीं आ रहा कि क्या करें, तो जैसे चढ़े थे वैसे ही झट से नीचे उतर गए हैं। अब उस कोच से झाँकती एक महिला जो संभवत: परिचारिका है, इशारे से बता रही है कि हम आगे वाले कोच में चढ़ सकते हैं। हम फिर से ट्राम में सवार हो गए हैं। टी.टी. महाशय ने अपनी टिकिट मशीन आगे कर दी है। सेन्ट्रल स्टेशन से ख़रीदा हुआ अपना टिकिट निकाल हमने मशीन के आगे लगा दिया है। पता नहीं यह टिकिट इस ख़ास ट्राम में मान्य है भी या नहीं। शुक्र है ‘बीप’ की आवाज़ संग हरी बत्ती टिमटिमा उठी है। यह विंटेज ट्राम है, सौ साल से भी अधिक पुरानी। इस रूट पर कभी-कभी चलती है। पीछे वाले कोच में चलता-फिरता कैफ़े है। आज अनजाने ही हमें इसकी सवारी का आनंद मिला, वाह!! यायावरी जो न करा दे।

दोरगार्दोन द्वीप में स्थित ‘स्कैन्सेन’ संग्रहालय स्वीडन का बहुचर्चित मुक्ताकाशी अजायबघर है।… ओपन एयर म्यूज़ियम..। 1891 में बना यह संग्रहालय औद्योगिकीकरण से पूर्व स्वीडन के विभिन्न भागों में रहने वाले निवासियों की जीवन-चर्या को आज भी जीवंत रखे हुए है। योरप में औद्योगिकीकरण के कारण तेज़ी से बदलती जीवन-शैली का प्रभाव जब स्वीडन पर भी पड़ने लगा तब इस संग्रहालय के संस्थापक ऑर्टर हेज़ेलिअस ने अपनी परंपरागत जीवन-चर्या को सँजो कर रख लेने की प्रेरणा से इसकी परिकल्पना की। उन्होंने स्वयं स्वीडन के अलग-अलग भागों में बसे देहातों का दौरा किया और वहाँ पर बने अलग-अलग प्रकार के मकानों, पवनचक्कियों, चर्चों, भवनों आदि की सामग्री को इकठ्ठा कर यहाँ पहुँचाया और हूबहू उनके मौलिक रूप में पुनर्निर्मित करवा दिया। इस तरह के पूरे एक सौ पचास निवास यहाँ निर्मित किए गए जिनमें से एक सौ सैंतालिस को सचमुच विविध स्थानों से नावों में लादकर यहाँ लाया गया। 

इस म्यूज़ियम में आने से पहले हम भी नहीं जानते थे कि हम पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी के स्वीडन की जीवंत झाँकी लेने जा रहे हैं। टिकिट ख़रीदकर भीतर जाते हुए हम समझ नहीं पा कि किस तरफ़ से शुरू करें। .. फिर यूँ ही हम ने एक राह पकड़ ली है और सत्तर एकड़ में फैले इस पहाड़ीनुमा टापू पर ख़ुद को छोड़ दिया है। ऊँचा-नीचा पहाड़ी रास्ता पार करते समय बीच-बीच में कुछ मकान दिख रहे हैं। छोटे-छोटे पर सुन्दर, नक्काशीदार और आकर्षक। धूप काफ़ी तेज़ है, हम सुस्ताने की लिए कभी पेड़ की छाँव का आश्रय ले रहे हैं, कभी किसी सूने पड़े मकान के बरामदे की सीढ़ियों पर टिक कर बैठ जाते हैं। खिड़कियों के शीशों से झाँकने पर भीतर बिछा कालीन और मेज़-कुर्सियाँ दिख रही हैं। सब-कुछ इतना साफ़-सुथरा और व्यवस्थित कि लगता है अभी गृह-स्वामी आकर पूछेगा, “आप कौन!!” 

आगे एक तरफ़ चिड़ियाघर है जहाँ स्केडेनेविया में पाए जाने वाले सभी प्रकार के पशु-पक्षियों को रखा गया है। दूसरी तरफ़ हाट-बाज़ार हैं जहाँ सदियों पुराने हस्तशिल्प के नमूने सँजो कर रखे गए हैं। छोटी-छोटी दुकानों पर सजी मोहक वस्तुएँ और उन्हें बनाने और बेचने वाले कारीगर…

नीचे उतरने पर एक्वेरियम है। ‘बाल्टिक सी साइंस सेंटर’ जहाँ जलीय जीव-जंतुओं के साथ-साथ बाल्टिक सागर में डूबी नौकाओं के अवशेष भी मौज़ूद हैं। देखकर अजीब सी सिहरन हो रही है। कल्पना में उभर रहे हैं अनेक साहसी नाविक जो सागर की उत्ताल लहरों की ललकार का सामना करते हुए निकल पड़ते होंगे जाने किस-किस अभियान पर… कितने नाविकों ने मंज़िल पायी होगी, कितनों ने जान गँवाई होगी, कौन जाने.. 

पहाड़ी के साथ-साथ ऊपर चढ़ते हुए अब हम एक भरे-पूरे गाँव में पहुँच गए हैं। लाल रंग की ईंटों से बनी एक ऊँची मीनार सामने खड़ी है जो एफ़िल टावर की पूर्वज जैसी प्रतीत हो रही हैं। इसके नीचे लगे सूचनापट के अनुसार यह हौलेस्तेद बेलफ़्री है… यानी ‘घंटे का घर’। 1730 में निर्मित 40 मीटर ऊँचा यह ढाँचा स्वीडन के किसी चर्च का भाग था, जिसे चर्च में आग लग जाने के बाद यहाँ स्थापित कर दिया गया। कुछ और आगे जाने पर पवचक्की दिख रही है। लकड़ी का बना छोटा सा घर, ऊपर लकड़ी की बड़ी-बड़ी चार पंखुड़ियाँ जो हवा में हिलते हुए ऊर्जा पैदा करती होंगी। भीतर झाँकने पर चक्की के बड़े-बड़े पाट दिख रहे हैं।…

एक परिसर में बने लकड़ी के घर में कुछ चहल-पहल दिख रही है। कुछ पर्यटक घर के भीतर जाकर देख रहे हैं। कौतूहलवश हम भी बरामदे से होकर घर के अन्दर प्रवेश कर रहे हैं। सोलहवीं शताब्दी के किसी किसान का घर है यह। बाईं तरफ़ बैठक है, अन्दर लकड़ी का सोफ़ा और तीन कुर्सियाँ हैं। ज़मीन पर मोटे सूत की रंगीन दरी बिछी है। दीवार पर चित्र टँगा है और एक लकड़ी की अलमारी के ऊपर लैम्प रखा है। सोफ़े के पीछे बनी खिड़की पर ताज़े खिले फूलों का गमला सजा हुआ है। महसूस हो रहा है जैसे हम अतिथि हैं, टाइम-मशीन के ज़रिए सदियों पहले बसी किसी की गृहस्थी में बिन बुलाए घुस आए हैं। कुछ झिझकते हुए उनके सोफ़े पर बैठ गए हैं, बिना गृहस्वामी के इजाज़त लिए, …खिड़की से बाहर झाँक रहे हैं मानो किसी के आने का इंतज़ार हो.. 

दाईं ओर रसोई और एक अन्य कमरा, जिसमें पलंग और एक-दो कुर्सियाँ क़रीने से रखी हैं, दीवार की खूँटी पर कुछ कपड़े टँगे हैं। रसोई में सिरामिक के बर्तन, काँच की बोतलें, चूहेदान, कनस्तर, लकड़ी के बक्से, अलग-अलग आकारों के मर्तबान, चाय की केतली, लोहे की इस्त्री, काँच की लालटेन वगैरह रखे हैं। मुझे बरबस अपना गाँव का जीवन याद आ रहा है। इन वस्तुओं से जैसे पहले का कोई नाता है… कुछ ऐसी ही सरल-सहज जीवन-शैली कुछ साल पहले तक मेरे देश के अनेक गाँवों में रही है..अब भी होगी। जो जीवन स्वीडन में तीन शताब्दी पहले रहा, वह हमारे यहाँ तीन दशक पहले तक तो ज्यों का त्यों मौजूद रहा है। अब ज़रूर तेज़ी से बदलाव आ रहा है। पर अपनी पारंपरिक जीवन-शैली की स्मृतियों को सँजो कर रख लेने की उतनी बैचेनी हमारे भीतर नहीं है शायद… । 

इस किसानी घर के बाहर एक पुरानी साइकिल भी खड़ी है। आगे हैंडल पर बाँस की टोकरी टँगी हुई है। मैं और भारती बारी-बारी उस पर चढ़ने के पोज़ बनाते तस्वीरें ले रहे हैं। इसी तरह टहलते-टहलते हमने अनेक घरों के नमूने, उस ज़माने की पोशाकों में सजे कर्मचारी, बच्चों के विविध खेल आदि की झाँकियाँ ले डाली हैं।

अभी पार्क का बहुत सा हिस्सा बाक़ी है पर अब हिम्मत जबाब दे रही है। हम कमल के लाल-गुलाबी फूलों से भरे एक तालाब किनारे बैठ सुस्ता रहे हैं। अब यह भी याद आ रहा है कि वापस होटल जाकर अपने पिट्ठू बैग उठाने हैं और शाम छ: बजे की ट्रेन पकड़नी है गॉथन्बर्ग के लिए.. और बीच में समय रहा तो गैम-ला-स्तेन में उतर कर ‘बेन-एंड-जैरी’ से आइसक्रीम भी तो खानी है..। 

तो हम वापस गेम-ला-स्तेन पहुँच गए हैं। गलियाँ अब उतनी अपरिचित नहीं रहीं। उनसे अच्छी दोस्ती गाँठ ली है। अब वे बतियाने लगीं हैं। ख़ुद उँगली पकड़ लिए जा रही हैं। “देखो, कल यहीं पर ठिठक कर तुम आगे की राह ढूँढ़ रहे थे… यह जर्मन चर्च आज कितना पास लग रहा है न… और यह रहा वह रेस्तरां जहाँ थक कर बैठ गए थे और भूख मिटाई थी..।”

रेस्तरां का वह मनचला बातूनी वेटर आज भी सक्रियता से ग्राहकों की टोह में खड़ा है, पर आज हमें न वैसी भूख है न वाशरूम जाने की जल्दी, जिसके कारण कल इस रेस्तरां में पनाह ली थी। आज तो कुछ दुकानें छाननी हैं और फिर खानी है आइसक्रीम... ‘बेन एंड जेरी’ की बड़ी सी आइसक्रीम, जिसे कल खाने की हिम्मत नहीं जुटा पाए थे। एक तो इतनी बड़ी कि उसे खाने लायक़ भूख नहीं बची थी, दूसरे ख़ासी महँगी थी, तीसरे ग्राहकों की लम्बी क़तार…. तो यह हसरत पूरी करने आज फिर से आना पड़ा, नहीं आते तो स्टॉकहोम को बुरा लगता।

आज शनिवार है। पर्यटकों की चहल-पहल कल से कहीं ज़्यादा है। गलियों के दोनों ओर जो पतला-सा फ़ुटपाथ बना है, उसमें विभिन्न रेस्त्राँ के कुर्सी-मेज़ सजे हैं। सब भरे हुए हैं, खान-पान का दौर चल रहा है। बाक़ी बची हुई संकरी गली में लोगों का आवागमन चल रहा है। बेइन्तहा भीड़ के बावजूद भी घिच-पिच नहीं है, सब जैसे एक लय, एक प्रवाह में बहे जा रहे हैं। जिसमें गति है पर ठेलम-ठेल नहीं। दुकानों में सजी आकर्षक वस्तुएँ सबको अपनी ओर आकर्षित कर रही हैं। हम भी कुछ दुकानों में झाँक आए हैं। भारतीय और पाकिस्तानी दूकानदार बहुत हैं यहाँ। हमें सामान उलटता-पलटता देख झट से सहायता के लिए पहुँच जाते हैं। हिंदी में हाल-चाल पूछते हैं। परिचय लिया-दिया जा रहा है। परदेश में यह सब बहुत सुखद और आत्मीय लग रहा है। अचानक हमारे कानों में मृदंग, हारमोनियम और मंजीरे की धुन पड़ने लगी है। नहीं, कल्पना में नहीं, सचमुच… हम बाहर गली में आ गए हैं। 

अरे हाँ! ये तो सचमुच कोई जुलूस चला आ रहा है.. नाचता-गाता… “ हरे रामा…हरे रामा...” क़रीब दस-बारह लोगों का समूह…. झूमता ठुमकता, मधुर स्वर लहरियाँ बिखेरता। एक भारतीय महिला के अलावा बाक़ी सब गोरांग भक्त हैं। कुछ पुरुषों ने सफ़ेद धोती और गेरुए कुरते पहने हैं। महिलाएँ साड़ियों में हैं। माथे पर चन्दन टीका और गले में तुलसी की माला धारण किए। एक ने हारमोनियम थामा हुआ है, एक मृदंग पर थाप दे रहा है। एक के पास खनकता हुआ मंजीरा है। एक के हाथ में लकड़ी पर टँगा बड़ा सा रंगीन बैनर है, जिस पर हरे राम हरे कृष्ण लिखा है। अपनी ही धुन में थिरकते ये सब मस्त चले जा रहे हैं। हम दोनों भी उनके साथ गुनगुनाने लगे हैं। एक महिला हमारे पास आकर बता रही है कि यहाँ से पास ही ‘हरे कृष्णा टेम्पल’ है। हम वहाँ ज़रूर आयें। 

समय कम है। हमें शाम की ट्रेन भी पकड़नी है। अगर मिस हो गयी तो सचमुच हमें हरे कृष्ण मंदिर में शरण लेनी पड़ेगी। हम झटपट ‘बेन एंड जेरी’ पर पहुँच गए हैं। अपनी बारी की प्रतीक्षा करते हम देख रहे हैं, कितनी तरह की आइसक्रीम और कितने तरह के कोन हैं। भारती ने बड़े से कोन में डबल स्कूप ले डाला है। मुझे वहीं पर बन रहा गर्म-गर्म वोफ़ल ज़्यादा ललचा रहा है। उसी पर एक स्कूप डलवाकर हम दोनों बाहर आ गए हैं। भीतर बैठने का इंतज़ाम नहीं है। दूकान के बगल से गुज़र रही गली में एक लकड़ी का बेंच बिछा है। पर उसमें पहले से ही कुछ पर्यटक बैठे तस्वीरें ले रहे हैं। उन्हें देखकर लगता नहीं कि उन्हें उठने की जल्दी है। अब तक हमारे पैर थक कर चूर हो चुके हैं। ख़रीददारी की है तो कुछ थैले भी लाद रखे हैं। हम आराम से बैठकर अपनी आइसक्रीम का मज़ा लेना चाहते हैं। गली के दूसरे किनारे पर बित्ते भर का फुटपाथ है। गली की सतह से कुल दो इंच ऊँचा। डूबते को तिनके का सहारा.. तो हम धम से वहीं बैठ गए हैं। यह स्टॉकहोम की यात्रा का अंतिम पड़ाव है। हम ऐसे इत्मीनान से बैठे गली से गुज़रते पथिकों के प्रवाह को देख रहे हैं मानो अपनी गली के नुक्कड़ से परदेशियों को निहार रहे हों और गॉथनबर्ग के लिए छूटने वाली ट्रेन से हमारा कोई वास्ता ही न हो ….

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