दुनिया की छत – 2 : बादल से तकरार 

01-11-2019

दुनिया की छत – 2 : बादल से तकरार 

डॉ. रेखा उप्रेती

गॉथनबर्ग में स्थित बोटेनिकल पार्क, जिसका स्वीडिश नाम बोतेनिस्का त्रेदगौर्दन है, यूरोप के सबसे बड़े उद्यानों में से एक है। चार सौ तीस एकड़ में फैला यह विशाल उद्यान सोलह हज़ार से अधिक वनस्पतियों से समृद्ध है। फूल पत्तियों के प्रति मेरे प्रेम को मद्देनज़र रखते हुए भारती ने मुझे इस गार्डन की सैर कराने की ठानी। पर कुदरत ने ऐसा पैंतरा बदला कि सब पानी-पानी हो गया . . .। 

बारिश का अंदेशा तो हमें था, सुबह से ही आसमान बादलों से पटा दिखाई दे रहा था। पर रिमझिम फुहारों से डरकर घर पर कौन बैठे! 

हम दोनों ने मोटी-मोटी हुड वाली जैकेट्स पहन ली हैं, एक-एक वुलन स्टोल भी रख लिया है। पैरों में जूते कस कर हम वीर सैनालियों की तरह घर से निकल पड़े हैं। बूँदा-बाँदी शुरू हो गयी है। ट्राम-स्टेशन घर के एकदम पास है। हम पहले ट्राम से और फिर बस से वहाँ तक की दूरी तय कर रहे हैं। यहाँ का पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम क़ाबिले तारीफ़ है। गूगल पर हर मिनट की जानकारी अपडेटिड रहती हैं और तयशुदा समय पर बस या ट्राम आपके सामने द्वार खोले हाज़िर मिलती है। भीड़-भाड़ का तो सवाल ही नहीं। आराम से शाही अंदाज़ में सफ़र किया जा सकता है। खिड़की से बाहर खुली-खुली सड़कें, मनोरम प्राकृतिक दृश्य और आसमान में घिरे घने-घने  बादल परिवेश को मोहक और मन को मस्त-मगन बना रहे हैं। भारती बहुत उत्साहित है। पिछले दिनों जब पुष्पा बुआ के साथ वह बोटेनिकल गार्डन में गयी थी तो वह अनगिनत क़िस्म के रंग-बिरंगे फूलों से गुलज़ार था। 

बस से उतरते ही बादलों ने ज़ोर आज़माइश शुरू कर दी है। फुहारें तेज़ बौछारों में बदलने लगी हैं। पर हमारे जोश को डिगाने में ये भी नाकामयाब हैं। हम चुस्त क़दमों से उद्यान के प्रवेश द्वार से भीतर सरक गए हैं। भीतर के दृश्य मनभावन हैं। बेहद ख़ूबसूरत बड़े-बड़े लॉन मखमली घास की परतों में बिछे हुए हैं। जहाँ तक नज़र जाती है, हरी-हरी बेलें, पौधे, पेड़, तरह-तरह की झाड़ियाँ, फूलों से लदी क्यारियाँ, क़रीने से सजाए गए छोटे-छोटे बूटे छितरे पड़े हैं। भारती थोड़ी मायूस हो रही है क्योंकि जितने फूलों से लदे होने के ख़्याल से वह मुझे यहाँ लाई थी उतने क़िस्म के फूल अब उसे नहीं दिख रहे. . . एक तो ऋतु बदल गयी है, ऊपर से यह बारिश. .पर मेरा मन-मयूर रुआँसा नहीं है। बारिश से उद्यान की हरीतिमा धुल कर और निखर गयी है।

घने पेड़ों के झुरमुट के नीचे रखी एक बेंच में हम सुस्ताने के लिए बैठ गए हैं। पार्क में ज़्यादा लोग नज़र नहीं आ रहे। इतनी बारिश में किसका सर फिरा है जो यहाँ चला आयेगा हम सरफिरों तरह. . . । कुछ बुज़ुर्ग महिलाएँ, कुछ उत्साही युवा कहीं-कहीं दिखे ज़रूर थे पर अब ग़ायब हैं। बाक़ी तो हम हैं और मुक़ाबले में बारिश. . .  हम बैठे तो बारिश ने भी ब्रेक लिया है, शायद उसे भी सुस्ताने की ज़रूरत पड़ गयी है। मौक़ा देख हमने भी अपने लबादे उतार दिए हैं। ‘चलो कुछ तस्वीरें तो ली जाएँ’ हम तय करते हैं। हम खुले मैदान में उतर पड़े हैं। ऊपर बादलों घिरा आसमान और नीचे गीली गुदगुदी घास के हरे-भरे विस्तृत मैदान। धरती और बादलों के बीच हम दोनों के सिवाय कोई और भी अस्तित्व रखता होगा, इसका भान भी नहीं हो रहा. . . .!! बच्चों की तरह बेपरवाह हम तरह-तरह के पोज़ बनाकर फोटो ले रहे हैं। 

“हो गया तुम्हारा. . ?” बादलों ने ज़ोर से गरज कर पूछा है और हमारे उत्तर की परवाह किए बिना फिर धारा-धार बरसना शुरू कर दिया है। हमने झट से अपने लबादे फिर ओढ़ लिए हैं। पेड़ों का झुरमुट भी कह रहा है, “अब तुम्हें और आश्रय नहीं दे सकते भाई, चलते बनो. .” हमारे पास और रास्ता भी क्या है, सिवाय चलने के. . . भीगते-भागते किसी ऐसी जगह की तलाश कर रहे हैं जहाँ कुछ देर रुक कर बारिश कम होने का इंतज़ार किया जा सके। अभी तो पूरा दिन पड़ा है। बारिश का जी भर जाए बरस कर तो आगे के नज़ारे एक्सप्लोर करेंगे. . .  पर अभी तो दूर-दूर तक कोई बित्ते भर की छत भी नज़र नहीं आ रही कि उसके नीचे सर छुपा लें। हमने अपनी जैकेट के हुड नाक तक खींच लिए हैं। आँखों को अब सिर्फ़ नीचे का रास्ता भर दिख रहा है। अपने बैग और मोबाईल को पानी से बचाना मुश्किल हो रहा है। जैकेट के अन्दर किसी तरह उन्हें ठूँस लिया है। आड़ी-तिरछी बौछारें हमारे रोम-रोम को भिगो देने की क़सम खाए बैठी हैं। बरस-बरस कर कह रही हैं “बच सको तो बचो. . .” 

एक जगह पर छतरीनुमा आश्रय दिख तो रहा है, पर कुछ पुनर्निर्माण का कार्य होने के चलते वह भी निषिद्ध इलाक़ा हो गया है। घने वृक्षों के झुरमुट भी पानी के वेग को झेल पाने का साहस नहीं दिखा पा रहे। हाँ, अब दूर एक जलपान गृह नज़र आ रहा है। हमारी जद्दोजेहद को राहत मिल रही है। मानो तूफ़ानों से जूझते नाविकों को कोई द्वीप नज़र आ जाए। चलो, वहीं चलकर कुछ खाना-पीना भी हो जायेगा और बारिश से भी बचाव भी. . .  

किसी तरह अपनी नैया खेते हम वहाँ पहुँच तो गए हैं पर आज हमारा दिन है ही नहीं। जलपान गृह के भीतर जाकर देख रहे हैं कि वह तो खचाखच भरा है। बाक़ी सब हमसे ज़्यादा समझदार निकले, हमारी तरह जोश में आकर बादलों से उलझे नहीं. .  यहाँ बैठकर इत्मीनान से चाय-कॉफ़ी की चुस्कियाँ  ले रहे हैं। दरअसल यहाँ भी बाहर बैठने का इंतज़ाम ज्यादा है, जिसे आज बारिश ने अस्त-व्यस्त कर दिया है। किसी ख़ुशनुमा धूप वाले दिन बाहर ही यह जगह गुलज़ार रहती होगी, पर आज तो सब भीतर ही धँसे बैठे हैं।

कॉफ़ी की ख़ुशबू हमारे नथुनों में भरती हुई भीतर उद्वेलन पैदा कर रही है। तश्तरियों में परोसे हुए विविध व्यंजनों से उठता हुआ धुआँ आँखों के आगे नर्तन करके रिझा रहा है। हम आशा भरी नज़रों से एक-एक मेज़ पर झाँक रहे है, क्या जाने कोई अपना प्याला ख़त्म कर उठने की प्रक्रिया में हो. .  लेकिन इतनी मूसलाधार बारिश में कौन कुर्सी छोड़ेगा भला. . और ऐसे बेशर्मों की तरह सबको घूरते हुए हम भी भला कब तक अपने को बचा सकते हैं, लिहाज़ा अपना सा मुँह लेकर बाहर आ गए हैं. . . गालिब की तरह “बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले” वाला बेचारगी का भाव लेकर. . ।

“आओ-आओ. .  अभी मुक़ाबला पूरा कहाँ हुआ है,” हमें देखकर ढीठ बादल ख़ुशी से झूमकर और बरसने लगे हैं। हम फिर से अपने अस्तित्व को पानी-पानी होने से बचाने के लिए सिकुड़े-सिमटे चलने लगे हैं। आस-पास कुछ झुरमुट हैं जिनके नीचे बेंच लगी हैं। वहाँ बैठकर कुछ बचाव होने की संभावना है पर अब हम भी चिढ़े हुए से उनकी उपेक्षा कर आगे बढ़ते जा रहे हैं।

एक रास्ता ऊपर पहाड़ी की ओर जा रहा है। हम उसी राह लग गए हैं। यह संकरी पथरीली सी डगर है, दोनों तरफ़ घनी-घनी झाड़ियाँ, छोटे-बड़े पेड़ बारिश संग झूम रहे हैं। हवा चलती है तो इनमें अटकी बूँदें भी हम पर ही टपक रही हैं। कुछ टहनियाँ लटक कर हमारा रास्ता भी रोक रही हैं- ‘ऐ री! जाने न दूँगी” वाले अंदाज़ में। ऊपर से बह-बह कर आते पानी के रेले पैरों में लिपट रहे हैं- “जाइए आप कहाँ जाएँगे” कहकर. .   जल-थल एक हो रहा है।. . .  

भारती के अनुसार ऊपर पहाड़ी से दूर दूर तक फैली घाटी के मनोहारी दृश्य दिखेंगे। आगे बेहद ख़ूबसूरत जापानी उद्यान भी है और ‘रॉक गार्डन’ भी। झरनों, झीलों, वनों, बग़ीचों के भरा-पूरा प्राकृतिक परिवेश हमें आगे बढ़ते जाने का प्रलोभन दे रहा है। इस लोभ में हम काफ़ी चढ़ाई पार कर चुके हैं। पर बावरे बादल बरस-बरस कर हमें आगे जाने से बरज रहे हैं। अब हमारी हिम्मत जवाब दे रही है। कुछ देर असमंजस में खड़े रहते हैं। क्या किया जाए! वापस लौटना भी कोई आसान तो नहीं है पर उसी में अपनी भलाई जानकार हम लौट पड़े है। 

“बस कर भाई, हम हारे तुम जीते. . ” हमारी मनुहार का कोई असर होता नहीं दिख रहा। बादल झूम-झूम कर बरसे जा रहे हैं, हमें तर-बतर करके मानो अपनी विजय का जश्न मना रहे हैं। हमारे लिए आँख खोलकर चलना भी मुश्किल हो रहा है। बौछारों ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा। ज़मीन पर चलते हुए भी हम जल-मग्न हो चुके हैं।

दूर गेट के पास एक और आश्रय स्थली दिख रही है। वहाँ जाकर भाग्य आज़माने का ख़्याल हमें थोड़ी राहत दे रहा है, शिथिल पड़े कदम अपना पूरा दम लगा चल पड़े हैं। जूतों के अन्दर भरा पड़ा पानी कच-कच कर रहा है। कपड़े भारी हो चुके हैं। लगता है हम ख़ुद बादल बन बरस रहे हैं।. . .  

यह एक बड़ी दूकान जैसी है। दरवाज़े के पास छोटी-सी गैलरी है जिसमें हम दो बड़ी मुश्किल से समा पा रहे हैं। अन्दर जाने की सूरत नहीं है क्योंकि हम बुरी तरह टपक रहे हैं। भीग कर भारी हो गयी जैकिट हाथों में चिपक चुकी है, उसे उतारना भी काफ़ी मशक़्क़त का काम मालूम पड़ रहा है। दरवाज़े पर लगे हुक में भारती ने अपनी लाल जैकेट लटका दी है और मैंने पास ही पड़े एक प्लास्टिक के डब्बे के ऊपर टिका दी है। दोनों में से धार-धार पानी गिर रहा है। अभी कोई भीतर से बाहर आ गया तो हमारी ख़ैर नहीं, हम सोच रहे हैं। शुक्र है कि ऐसी बारिश में कोई बाहर निकलने की सोच भी नहीं रहा होगा।

ठण्ड से ठिठुरते हम, शीशे के दरवाज़े के पार दूकान के भीतर का सूखा-सूखा माहौल देखकर ललचा रहे हैं। मन कर रहा है कि जूते-मोज़े उतार कर किसी सूखे स्टूल पर बैठ जाएँ. . सूखा तौलिया, सूखे कपड़े और एक कप गरम चाय. . .  अभी कोई देवता वरदान माँगने को कहता तो इसके सिवाय कुछ और हमें नहीं सूझता. . . । हम अपनी जैकेट्स वहीं छोड़कर भीतर जाने का साहस जुटा  रहे हैं। किसी का घर थोड़े ही है कि इजाज़त लेनी पड़े। आपने दूकान खोल रखी है, कोई भी भीतर प्रवेश कर सकता है . . . । 

भीतर गर्माहट है, और है सूखी-सूखी ज़मीन, और शुष्क हवा. . .  यहाँ अलग-अलग सेक्शन बने हैं जिनमें बागवानी का सामान भरा हुआ है। विभिन्न प्रकार की पौध, बीज और बाग़वानी में काम आने वाले औज़ार, बग़ीचे को सजाने वाले आकर्षक उपकरण . .  हमें कुछ ख़रीदना नहीं है पर ऐसे ध्यान से सब चीज़ों मुआयना कर रहे हैं मानो कई एकड़ में फैले अपने फ़ार्महाउस के लिए सामान जुटाना हो. . । हमारी जटाएँ अब भी टपक रही है। हमारे पास एक सूखा रूमाल तक नहीं है।

दूसरी तरफ काउंटर सम्हालती एक महिला खड़ी है। हम उसकी नज़रों से ख़ुद को बचा रहे हैं। हमारे सिवाय इस तरफ़ कोई और ख़रीददार नहीं है। दूकान के ठीक बीचों-बीच लकड़ी से बनी सीढ़ियाँ ऊपर के तल्ले की ओर जा रही हैं। वहाँ एक बोर्ड सा टँगा है, जिस पर लिखा है ‘कॉफ़ी’. .  यक़ीन नहीं होता पर हम खट-खट करते ऊपर चढ़ रहे हैं। यह तल्ला लगभग ख़ाली है, दो बुज़ुर्ग महिलाएँ किसी कोने में पौधों का मुआयना करती व्यस्त हैं। दूसरे कोने में कॉफ़ी मशीन लगी है, साथ ही तीन बेंत की कुर्सियाँ और मेज़ भी. .  एकदम साफ़ और सूखी. . . 

मशीन से कॉफ़ी लेने के लिए टोकन की ज़रूरत है, हम नीचे उतर कर काउंटर से टोकन लेने आए हैं, अब झिझकने की ज़रूरत नहीं, हम शरणार्थी नहीं, ग्राहक है। भीगे हैं तो क्या!! कॉफ़ी पीने आए हैं. . . 

कॉफ़ी के भरे मग और शुगर क्यूब लेकर हम दोनों मेज़ पर बिराज गए हैं। केन की कुर्सियों में बैठ, गर्म और मीठी कॉफ़ी के घूँट गले से उतारते हम विजयी मुस्कान से एक दूसरे को देख रहे हैं। “उफ़!! क्या दिन है।” 

मुझे याद आ रही है एक और ऐसी ही बारिश-भीगी यात्रा। कुछ साल पहले मित्र-मंडली के पाँच घुमंतू ऋषिकेश यात्रा पर थे। लक्ष्मण-झूला से बहती गंगा का नज़ारा लेने के इरादे से ज्यों ही उसके पास पहुँचे, ऐसी ही तूफ़ानी बारिश ने ख़ूब छकाया था। झूले तक तो पहुँच नहीं पाए, बचते-बचाते किसी तरह एक चाय के ढाबे पर शरण ली। बहुत देर बाद भी जब बारिश थमी नहीं तो रेनकोट बेच रहे एक बुज़ुर्ग से मोमजामे से बने रेनकोट ख़रीद बचने की कोशिश की। सड़क की ढलान पर दौड़ते रेले कहने लगे ‘चलो सीधे गंगा मैय्या की गोद में ही पहुँचाए देते हैं।’ बड़ी मुश्किल से पानी के तेज़ बहाव को पार कर अपनी कार तक पहुँचें। भूख और बारिश के सताए तो थे ही, ऊपर से गर्म-गर्म मैगी खाने को दिल कर आया। रास्ते में कार रोक एक दूकान से मैगी ख़रीदी और होटल की रसोई में जाकर ख़ुद बनाई। उस दिन की मैगी में जो स्वाद और तृप्ति थी, वैसी फ़िर कभी नहीं मिली. . .  

यह कॉफ़ी भी आज उसी तृप्ति का अनुभव करा रही है।  

एक सेल्फ़ी हो जाए, बैग से फोन निकल रहा है, टिश्यु से उसके फ़्रेम को पोछ कर हम अपनी फोटो क्लिक कर रहे हैं। हमारे बैग से अब भी पानी रिस कर लकड़ी से बने फ़र्श पर लकीरें बना रहा है। उसे अनदेखा करना मुश्किल है पर और कोई विकल्प भी नहीं। हमने गीले मोज़े उतार कर बैग में रख लिए हैं। जूते गीले हैं और जींस भी इतनी जल्दी सूखने वाली नहीं। पर उस गीलेपन के हम आदी हो चुके हैं। पारदर्शी खिड़की बता रही है कि बाहर भी युद्ध-विराम हो चुका है, बादल बरसना भूल आसमान में टिके भर हैं। “बाहर आ जाओ, अब नहीं सताएँगे” उनका संधि-प्रस्ताव आ रहा है। 

बाहर आकर हम अपनी जैकेट्स उठा उन्हें झटक रहे हैं, पानी निथर चुका है पर उनका गीलापन बरक़रार है। मौसम भी निथरा-निथरा पर गीला है। अब वापस उद्यान की तरफ़ न जाकर हम गेट से बाहर निकल रहे हैं। “विदा बोटनिकल गार्डन! तुम्हें हमेशा याद रखेंगे।”       
  

2 Comments

  • 5 Nov, 2019 12:12 AM

    फ़ोन के ज़रिए स्वीडन की यात्रा मे मज़ा है आ गया... बारिश में भीगने का ऐसा एहसास तो सच में भीगने पर भी कभी नही हुआ...कॉफी की खुशबू मन मे ऐसे महकी कि कॉफ़ी पी कर ही मन माना.... लक्ष्मण झूले की यादों ने तो फिर भिगो दिया...मित्र मंडली के साथ जाने को मन मचल उठा..ऐसे ही यादों को शब्दों में संजोते रहना

  • 2 Nov, 2019 02:04 PM

    बेहद रोचक और सजीव चित्रण । ऐसा लगा कि बोटैनिकल गार्डन की बरसात में हम भी घर बैठे ही थोड़ा थोड़ा भीग गये हों ।

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