31-10-2008

ढीली पड़ती मुट्ठियाँ

सुशील कुमार

मेरी मुट्ठी में डाल थी माँ ने
कलेवा के संग करुणा के कुछ दाने
और संभालकर रखने की ताक़ीद की थी।

 

बाबूजी ने रख दिये थे उसमें
थोड़े रुपये और थोड़ी- सी समझ
जो वक़्त-बेवक़्त अपने काम आये।

 

दीदी को ख़ुशहाल घर ब्याहने का सपना,
छोटु को आदमी बनाने का ज़िम्मा
मेरी तंग मुट्ठी में अपनी-अपनी जगह काबिज़ थे।

 

पत्नी के उदास चेहरे से झाँकती उम्मीदें,
बच्चों की तुतलाती वर्तनी में फँसी इच्छाएँ
कहीं- न- कहीं मुट्ठी में पुलक रहे थे।

 

मित्रों के चंद सुझाव,
पड़ोसन की मीठी गालियाँ,
अपने-पराये के दर्द का एक क़तरा भी
मुट्ठी में दुबके पड़े थे किसी कोने
और सुगबुगा रहे थे।

 

पर हर दिन ढीली पड़ रही थी मेरी मुट्ठी।

 

उँगलियों के खुलते कसाव के बीच
फिसल रही थी जतन से रखी एक-एक चीज़।

 

कोई तोड़ रहा था चुपके-चुपके
मुट्ठी के अहाते में बने
मेरे सपनों के घरौंदे।

 

मैं कालचक्र में फँसा, घूमता हुआ
तोल रहा था फिर भी अपनी चीज़ें
और सहेजने का यत्न कर रहा था

 

मैं कोई कविता नहीं कर रहा भाई,
मैं तो लड़ रहा हूँ आज भी
इस सदी के हत्यारे विचार से
जो मेरी मुट्ठी में घुसपैठ कर रहे हैं
और बटोर रहा हूँ
समय की उल्टी बयार में छितराये--
माँ की करुणा
पिता का भरोसा और
रिश्तों-नातों की गर्माहटें।

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