भूख के स्वाद

01-05-2020

भूख के स्वाद

डॉ. रेखा उप्रेती

“ओ ईजा!! घर आ!!” पिरुली ने ज़ोर से आवाज़ लगाई। आस-पास की पहाड़ियों से टकराती उसकी आवाज़ लौटकर ख़ुद को दोहराने लगी।…घर आऽऽ…घर आ‌ऽऽ..

दोपहर होने को आई। धूप बीच आँगन में पहुँच गयी है। पिरुली को भूख लग आयी है पर माँ अभी तक खेत से नहीं लौटी। नदी के दोनों किनारों पर बिखरे खेतों के बीच अपने खेत के टुकड़े को पहचानती है पिरुली। हरे खेत के बीच दिख रहा गुलाबी धब्बा उसकी माँ की गुड़ाई के लिए झुकी हुई देह है, यह भी जानती है। पता नहीं उसकी आवाज़ माँ तक पहुँची या नहीं, पर पिरुली वापस आँगन में लौट आयी। छोटे भाई को डलिया में सुलाकर आई है, कहीं जाग गया तो गिर जाएगा…

चार भाई-बहनों में सबसे बड़ी है पिरुली यानि प्रेमा… प्रेमा जोशी…स्कूल में यही नाम था उसका। बहनजी जब हाज़िरी लेते हुए उसका नाम पुकारती तो लगता वह भी ‘कोई’ है। गाँव-घर में तो सब पिरुली ही पुकारते हैं उसे …पता नहीं नाम बिगाड़ने में क्या मिलता है इन लोगों को। जब से स्कूल छूटा है, अपना असली नाम सुनने को तरस गयी है वह...। पिछले साल गाँव के स्कूल से पाँचवीं पास कर ली थी उसने। इस साल चनौदा के बड़े स्कूल में जाने के लिए उसका नाम लिखा गए थे बाबूजी, पर इस बीच आमा का देहांत हो गया। छोटे भाई-बहनों को कौन सम्हालता पीछे… माँ को तो खेती-पाती से ही फ़ुर्सत नहीं। देखो, अब तक नहीं आई वापस… भात कौन पकाएगा? 

भात की सुध आते ही फिर भूख लग आयी पिरुली को…

भाई अभी सो ही रहा है। दोनों छोटी बहने आँगन में खड़िया की लकीरें खींचकर अड्डू खेलने में व्यस्त हैं। पिरुली गोठ जाकर चूल्हा जलाने लगी। पतीली को राख से पोतकर उसमें पानी रख देगी वह और पीतल के भारी से भड्डू में भी .. माँ के आने तक पानी खौला रहेगा तो झट से दाल-भात पका देगी माँ। आज पिरुली ने कुछ खाया नहीं है सुबह से। माँ खेत गोड़ने निकल गयी थी। रात की बची रोटियाँ बहनों को खिला दी पिरुली ने, नहीं तो भूख-भूख करके उसकी जान खा जातीं दोनों।

 ‘आज से रात को ज़्यादा रोटियाँ बनाऊँगी’। पिरुली ने सोचा। लहसुन और हरीमिर्च के पिसे हुए नमक के साथ बड़ी अच्छी लगती हैं बासी रोटियाँ भी … सोचते ही उसके मुँह में पानी भर आया। पिसे नमक से याद आया, मसाले तो पीसे ही नहीं आज.. सिलबट्टे पर हल्दी कुटकुटा कर लालमिर्च और धनिया पीसना माँ ने सिखाया है उसे…पर यह काम उसे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। माँ समय पर आ जाती तो ख़ुद ही पीस लेती, पर अब तो देर हो गयी है। मसाला पीस देने में ही भलाई है वरना दाल-भात बनने में और देर लगेगी। 

इतनी देर में भाई कुनमुना उठा। अरे उसे भूख लगी होगी। अपनी भूख को भूल पिरुली झट से दूध गरम करने को उठी। काठ के भारी बक्से में रखा दूध का लोटा निकाल उसे गरम किया। दूध की मीठी ख़ुशबू उसके नथुनों में भरने लगी। कितने दिन हो गए दूध चखे! गाय नहीं है पिरुली के घर में। सामने की पहाड़ी के एक घर से दूध लगा रखा है माँ ने… भाई के लिए… और चाय रँगने के लिए भी। खेतों जंगलों से थकी टूटी आई ‘ईजा’ को खाना मिले या न मिले, चाय का गिलास भरा हुआ चाहिए। सुबह-सुबह लोटा भर दूध लाने के लिए पिरुली को ही अपनी पहाड़ी उतरकर, दूसरी पहाड़ी पर चढ़ना पड़ता है। एकदम सन्नाटे से भरी पगडंडियों पर डरते-डरते तेज़ कदम धरती आती-जाती है पिरुली। 
किसका डर!! 
अजी भूत रहते हैं न पेड़ों पर। जाने कब कहाँ से कोई धर पकड़े। एक हाथ में दूध की लुटिया और एक हाथ में अपनी चप्पल पकड़ बचती बचती आती है वह… चप्पल से तेज़ नहीं चला जाता न, घर आकर ही साँस लेती है। इतनी मेहनत से लाए दूध में उसका हिस्सा नहीं है, रोटी भात खाने वाले बच्चों को दूध से क्या काम।…… 

काँच की शीशी में दूध भरकर वह आँगन में ले आई।

भाई को घुट-घुट दूध पीते देख बहनों का खेल भी रुक गया। डलिया को घेरकर बैठ गयी हैं दोनों… बचेगा तो उन्हें भी चखने को मिल सकता है.. “मैं पियूँगी, आज मेरी बारी है” कहकर झगड़ रही हैं दोनों। जब ये दोनों छोटी थीं तो इनका बचा हुआ दूध पीने को पिरुली भी यूँ ही आस लगाए बैठती थी। एक बार बाबूजी डिब्बे का दूध लाए थे। उसका पाउडर भी चुराकर खाया था कई बार… जल्दी से मुँह में फंकी मार भाग जाया करती थी वह, ताकि कोई देख न ले। मुँह के अन्दर, दाँतों में चिपक जाता था पाउडर और उँगली से निकाल-निकाल कर खाना पड़ता था। कितना स्वाद लगता था न। पिरुली के मुँह में फिर से पानी भर आया। शीशी में दूध का घेरा कम होता जा रहा है, दोनों बहनें उस पर एकटक नज़र टिकाए हैं। पर कुछ देर में ही निप्पल से हवा चूसने की आवाज़ ने दोनों को निराश किया और वे वापस अड्डू खेलने में व्यस्त हो गयीं। भाई के मुँह से खाली शीशी निकाल पिरुली ने डलिया हिलानी शुरू कर दी। 

“आजा री निन्नी आSजाS, भव्वा की निन्नी आSजाS…”

माँ भी अजीब है। सारा काम तो पिरुली ही करती है घर का, नौले से पानी भर लाती है, बर्तन माँजती है, चूल्हा लीपती है, ओखली में धान कूटती है, रात की रोटी-सब्ज़ी भी जैसे-तैसे बना लेती है, पर दाल-भात वह नहीं पका सकती। दाल-भात में भला ऐसी क्या छूत है कि सिवाय माँ के कोई चूल्हे में भी नहीं जाएगा। धुली धोती पहन के जाएगी माँ गोठ, तब बनेगा दाल-भात.. तब तक बैठे रहो भूखे…  

पिरुली को रुलाई-सी आने लगी। 

भव्वा सो गया तो भीतर जाकर परात में चावल निकाल लाई और आँगन में पैर फैला उन्हें साफ़ करने लगी है पिरुली। ठीक से फटकना नहीं आता उसे, भूसी के साथ दाने भी गिर जाते हैं चावल के … आज ग़ुस्से में है तो ज़्यादा ही गिर गए। अब उठाओ एक-एक कर। दो उँगलियों से दाना दाना उठाते उसे आमा की याद आ गयी। 

“अन्न बर्बाद नहीं करते बिटिया, श्राप लगता है,” आमा हमेशा कहती।

“अन्न कोई देवता है क्या, जो श्राप देगा?” पिरुली पूछती।

“अन्न का दाना दरवाज़े के कोने में भी पड़ा हो तो उसे आस रहती है कि कोई उठा लेगा। दरवाज़े से बाहर फेंक दो तब वह श्राप फेंकता है,” आमा समझाती।

इसी बीच दो-चार गौरेया भी आ गयीं पिरुली का हाथ बटाने, उन्हें दाना चुगते देख पिरुली को अपार संतोष हुआ। इनका पेट भरेगा तो आशीष देंगी न… आमा कहती थी। दाना लेकर उड़ती चिड़िया को देख फिर माँ को कोसने लगी। “चिड़िया को भी फिकिर है अपने बच्चों की… एक हमारी ही ईजा है जिसे बच्चों से ज़्यादा अपने खेतों के बंजर होने की फिकिर है।” उसने सोचा। बाबूजी चिट्ठी में लिखते रहते हैं, ‘पहले बच्चों को देखना, अपनी फिकर करना, खेत में वैसे भी उपजता कितना है?’ पर माँ नहीं मानती। ‘धरती का हिस्सा देना ही होता है.. नहीं तो भूमि के देवता रुष्ट हो जाएँगे।’ ठीक है, मनाओ अपने देवताओं को…रात को ही मिलेगा भात। 

मन ही मन पिरुली फिर माँ से रूठ गयी। इस बार बाबूजी आएँगे तो खूब शिकायत करेगी माँ की। क्या कहेगी उसने सोचना चाहा पर बीच में ही याद आ गयी बाबूजी की लाई बर्फी। उसे बहुत पसंद है बर्फी। बाबूजी डिब्बा भर के लाते हैं। थोड़ी-थोड़ी ही मिलती है उसे। माँ को बाँटने का शौक़ जो ठहरा। बाबूजी की लाई मिठाई हो या मामाजी की भेजी भिटौली… माँ पुड़िया बना बना कर गाँवभर में बँटवाती है। पिरुली ही तो जाती है सबको देने। यूँ उसे भी अच्छा लगता है मिठाई या बताशे बाँटना। सबको बताते हुए… बाबूजी आये हैं..। … मामा की भिटौली आयी है। पर अभी वह सोच रही है, इस बार हर पुड़िया खोलकर एक-एक बताशा ज़रूर खा लेगी … कल्पना करते ही पिरुली के मुँह में बताशे की मिठास घुलने लगी। थूक सटकते हुए उठ गयी वह। 

बाबा रे!! पतीली का पानी उबल-उबल कर सूख गया है। आग भी बुझी पड़ी है। सोचने बैठ जाती है तो सब भूल जाती है पिरुली…। 

“ससुराल में कैसे खाएगी?” उसकी इन्हीं हरकतों को देखकर डपटती है माँ। 

“नहीं जाऊँगी ससुराल… पढ़ाई करूँगी। गुड्डी बहनजी की तरह टीचर बनूँगी…।”

आमा इसलिए भी बहुत याद आती है पिरुली को… आमा होती तो स्कूल नहीं छोड़ना पड़ता।… आमा होती तो कब का भात पकाकर खिला चुकी होती अब तक… अच्छा होता आमा की जगह ईजा…

धत्त ये क्या सोच रही है वह.., पिरुली ने ख़ुद को डपटा। हमारे लिए ही तो खेतों में खटती है माँ ….  बाबूजी के मनीओडर से तो नून-तेल और चाय पत्ती ले आती है, उसके लिए भी दूर सोमेश्वर के बाज़ार तक पैदल जाना पड़ता है। कुछ संदूकची में छिपा कर रखती है। ‘अटक-बिटक में काम आएँगे’ कहकर। धान और आलू उसी की मिहनत से आता है घर में…… पर हाँ, आमा के होते उसे कभी यूँ भूख का अहसास नहीं होता था। सिर्फ़ बड़े बाबा के श्राद्ध के दिन ही ऐसी भूख सहनी पड़ती थी। दोपहर बीतने के बाद तक विधि-विधान चलता रहता और बाड़े में बड़ी-बड़ी देगचियों में पकते खाने की ख़ुशबू से भूख भड़कती रहती। “कब मिलेगा खाना …” सभी बच्चे चिढ़चिड़ा कर  पूछते। ऊपर से काका और चिढ़ाते , “जब तक खाना नहीं मिलता तब तक भूख का स्वाद लो” 

भूख का स्वाद! भूख में भी स्वाद होता है क्या? पिरुली झुँझलाकर पूछती, “और क्या, भूख में ही याद आता है न भोजन का असली स्वाद! अघाया आदमी क्या जाने भोजन की मिठास!!” 

ठीक ही कहते हैं काका। अब तो उसके साथ रोज़ होता है ऐसा..। भूख को बहलाने का गुर सीख गयी है पिरुली…  कितने खट्टे-मीठे पकवान याद आ जाते हैं उसे। किसी की शादी की पंगत, किसी की बरसी का भोज, किसी के अन्नप्राशन की भरी हुई थाली, जनम-बार के पुए-बड़े, फूलदेई पर बना साईं, हरेले पर बने सिंगल, आमा के बनाए डुबके, काकी के हाथ का झोई-भात, बुआ के आलू गुटुक और खीरे का रायता, काका की बनाई अमख्वैड़ की खटाई …सबका स्वाद चख लेती है बैठे-बैठे…। पिछले हफ़्ते मुन्नी चाची की गाय के बछड़े का नामकरण था तो उन्होंने खीर और पूड़ी भिजवाई थी, आहा! क्या स्वाद था.. पिरुली ने होंठों पर जीभ फेरते हुए सोचा। तभी उसे याद आया बाड़े में बँधा हुआ बछड़ा। बेचारे को पानी भी नहीं दिखाया आज…  माँ ने पाला है, कहती है, ‘बड़ा होकर बैल हो जाएगा तो जुताई में काम आएगा। अपना बैल न हो तो दूसरों के भरोसे रहना पड़ता है’ पिरुली सोचती है गाय होती तो ज्यादा अच्छा होता… दूध, दही, मठ्ठा और घी..  

और पिरुली ने लम्बी साँस ली… जैसे हवा में फैलती घी चुपड़ी रोटी की गंध महसूस कर रही हो। फिर बाल्टी में पानी लेकर बछड़े के पास जा पहुँची। ‘ले, मर..’ कहते हुए पानी उसके आगे रखा तो वह चबर-चबर पीने लगा। “हाँ, हाँ, पी ले सारा… मैं हूँ न नौले से पानी भरकर लाने के लिए।”  नौले से याद आया, उसके आसपास ख़ूब पुदीना फैला है। कल पानी लेने जाएगी तो फ्राक के घेर में बाँधकर ले आएगी। दाड़िम के दानों के साथ पीसकर खटाई बनाएगी। दाल-भात के साथ खटाई...  सोचते हुए घास का गट्ठर बछड़े के सामने डालकर पिरुली उसे निहारती रही, मानो घास नहीं दाल-भात परोस दिया हो उसके लिए…

शिथिल क़दम वापस आँगन में लौटते उसकी नज़र दूर खेतों की तरफ़ उठ गयी। अपने खेत का गुलाबी धब्बा नहीं दिख रहा अब। माँ वापस आ रही होगी, आती ही होगी। दौड़कर रसोई की तरफ़ बढ़ी पिरुली। ‘सुबह से भूखी प्यासी होगी ईजा, चाय का गिलास देखकर कितना खुश होगी’ सोचते हुए जल्दी से आग सुलगाई और पतीली उतार कर केतली में पानी चढ़ा दिया। 

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