(दोहा छंद)

क़समें वादे तोड़ कर, हुई बेवफ़ा यार।
चली गई अब दूर वह, करके आँखें चार॥


समझा था हमने तुझे, देगी पक्का साथ।
बीच राह में ही हमें, छुड़ा गई तू हाथ॥


झूठा था इज़हार भी, दिया तूने जो फूल।
चुभता हर क्षण बन वही, आज हृदय में शूल॥


याद करे दिन रात हम, तू क्या जाने दर्द।
आँसू बहते आँख में, गर्मी हो या सर्द॥

प्यार कभी करना नहीं, पकड़ो अब ये कान।
बर्बादी ही जान लो, ’माटी’ तू भी मान॥

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