"हैलो, हाऊ आर यू।"

अचानक कम्प्यूटर स्क्रीन पर ये चार शब्द उभरे, जिन्हें देख विनीता चौंक पड़ी। विनीता एक आई.ए.एस. अधिकारी थी और इस समय केन्द्र सरकार के एक सार्वजनिक उपक्रम में परियोजना निदेशक के पद पर कार्यरत थी।

प्रारम्भ से ही विनीता की भोजनावकाश में कार्य करने की आदत थी। उसने अपने कक्ष में एक कम्पयूटर टर्मिनल लगवा रखा था, जो कम्पयूटर विभाग में लगे मुख्य कम्पयूटर से जुड़ा हुआ था। दरअसल पूरा दिन लोगों से विचार-विमर्श करने, बैठकों में भाग लेने और फ़ाइलें निबटाने में बीत जाता था। इसलिये भोजनावकाश में जब दूसरे अधिकारी और कर्मचारी भोजन करने के बाद गप्प मार रहे होते, तब विनीता एकाग्रचित्त होकर कम्पयूटर पर कार्य करती और परियोजना से जुड़ी रिपोर्टों और आँकड़ों का अध्ययन कर अपनी कार्ययोजना तैयार कर लेती।

इस अल्पावधि में ही इतना कार्य हो जाता, जितना शायद पूरे कार्य-दिवस में नहीं हो पाता, पर आज पहली बार किसी ने विनीता की एकाग्रता में विघ्न डाला था। वो बहुत ही तेज़-तर्रार अधिकारी मानी जाती थी, उसके सामने तेज़ स्वर में बात करने की हिम्मत किसी में नहीं होती थी, फिर उसके कम्प्यूटर पर यह संदेश देने की गुस्ताख़ी किसने की?

अपने कक्ष से निकल कर विनीता तेज़ी से मुख्य कम्प्यूटर कक्ष तक आयी, पर वहाँ लगे सभी कम्प्यूटर टर्मिनल खाली थे। उसने इधर-उधर दृष्टि दौड़ायी, पर पूरा हाल खाली था। शायद कम्पयूटर पर संदेश देने वाला उसके आने से पहले ही डर के कारण कम्पयूटर कक्ष से भाग गया था या फिर यह संदेश उसके लिये नहीं, बल्कि किसी और के लिये होगा।

विनीता चुपचाप अपने कक्ष में आकर बैठ गयी। थोड़ी ही देर में यह घटना उसके ध्यान से उतर गयी और वह अपने कार्य में पूर्ववत व्यस्त हो गयी।

अगले दिन भोजनावकाश में विनीता ने कम्प्यूटर का स्विच खोल पहले ‘की-बोर्ड’ पर अपना पासवर्ड लिखा, फिर जैसे ही ‘की-बोर्ड’ पर उसने अपनी फ़ाईल का नाम लिखा, स्क्रीन पर फ़ाईल खुलने के साथ-साथ एक छोटा सा संदेश उभरा "विनी, कैसी हो तुम? भोजनावकाश में काम करने की तुम्हारी आदत अभी तक नहीं गयी?"

विनीता का चेहरा तमतमा उठा। कार्यालय में उससे आँख मिला कर बात करने का भी साहस किसी में नहीं था। फिर उसे ‘तुम’ और उसके घरेलू नाम ‘विनी’ से संबोधित करने का दुस्साहस कौन कर रहा था?

वह लगभग दौड़ती हुयी कम्पयूटर कक्ष तक आयी, लेकिन कम्प्यूटर कक्ष कल की ही तरह आज फिर खाली था। शायद संदेश देने वाले को मालूम था कि विनीता अगर कम्प्यूटर कक्ष में उसे रंगे हाथों पकड़ लेगी तो उसकी क्या दुर्गति करेगी।

विनीता का मन ख़राब हो गया था। वह चुपचाप अपने कक्ष में आकर बैठ गयी। उसके कक्ष और कम्प्यूटर में लगे सभी द्विभाषी कम्पयूटर टर्मिनल ‘वैक्स-बी’ प्रोग्राम से जुड़े थे, जिन पर एक-दूसरे को संदेश प्रेषित किये जा सकते थे। विनीता के अलावा केवल प्रबंध निदेशक/वित्त, आर.डी. कश्यप के कक्ष में एक और टर्मिनल लगा हुआ था। कश्यप साहब इसी सप्ताह स्थानांतरित होकर यहाँ आये थे, पर उनसे ऐसी हरकत की उम्मीद नहीं की जा सकती थी। निश्चय ही यह किसी अधीनस्थ कर्मचारी की शरारत थी। उस दिन विनीता का फिर किसी कार्य में मन नहीं लगा।

अगले दिन भोजानावकाश में कम्प्यूटर का स्विच खोलते समय विनीता मन ही मन आशंकित थी। उसे डर था कि कहीं आज फिर कोई संदेश उसका इन्तज़ार न कर रहा हो। धड़कते दिल से उसने ‘की-बोर्ड’ पर अपना ‘पासवर्ड’ लिख कर फ़ाईल का नाम लिखा तो उसकी आशंका निर्मूल साबित हुयी। स्क्रीन पर उसकी फ़ाईल खुल गयी थी। वह अपना काम करने लगी। परन्तु थोड़ी ही देर बाद स्क्रीन पर संदेश उभरा, "विनी, अगर तुम मेरा परिचय जानना चाहती हो तो आज मेरी तलाश में दौड़कर अपने कक्ष से बाहर मत आना। मुझे संतोष हो गया तो थोड़ी देर में मैं कम्प्यूटर पर ही अपना परिचय दे दूँगा।"

‘ठीक है बच्चू, इन्तज़ार कर लेती हूँ। एक बार तुम्हारा परिचय मिल जाये, फिर तुम्हें इस गुस्ताख़ी का सबक सिखाऊँगी’ विनीता ने दाँत पीसते हुये मन ही मन सोचा।

कुछ देर इन्तज़ार करने के पश्चात स्क्रीन पर पुनः संदेश उभरा- "विनी, सोचता हूँ कि अपना परिचय देने के स्थान पर पहले तुमसे तुम्हारा ही परिचय करा दूँ:

नाम: विनीता अग्रवाल उर्फ़ विनी, पर पुराने दोस्तों में विनर के नाम से मशहूर।

उम्र: 33 वर्ष।

लिंग: आई.ए.एस. (पर वर्षों पूर्व यह एक लड़की हुआ करती थी)।

शौक: 1.नया: पुरुष प्रधान समाज की अवहेलना करना, 2.पुराना- स्त्री-पुरुष-एक ही जीवन के दो पहलू तथा ‘सुखी गृहस्थ जीवन जैसे सामाजिक विषयों पर पत्रिकाओं में लेख लिखना।’

शिक्षा: लखीमपुर-खीरी के युवराज दत्त महाविद्यालय से स्नातक। फिर पी.सी.एस. व दो वर्षों बाद आई.ए.स. में चयन।"

इसके बाद स्क्रीन पर अक्षर उभरने बंद हो गये। विनीता सोच में पड़ गयी कि आख़िर यह कौन है जो उसके बारे में इतना कुछ जानता है। उसका बायोडाटा तो कार्यालय में उसकी फ़ाईल से कोई भी देख सकता था, पर उसके पुराने नाम ‘विनर’ और पत्रिकाओं में 1.-12 वर्ष पहले लिखे गये लेखों के बारे में यहाँ लखीमपुर से सैकड़ों किमी. दूर जानने वाला कौन था? कहीं उसका कोई पुराना सहपाठी तो नहीं?

"तुम्हारा सोचना ठीक है, विनी, मैं तुम्हारा एक पुराना सहपाठी हूँ, जिसे तुमने एक दिन कस कर डाँटा था। पर तुम्हारी वह डाँट मेरे लिये प्रेरणा बन गयी थी और आज मैं जो कुछ भी बना हूँ, वो तुम्हारी प्रेरणा से ही बना हूँ। इसके लिये मैं तुम्हारा शुक्रगुज़ार हूँ।

आज के लिये सिर्फ़ इतना काफ़ी है, क्योंकि भोजनावकाश समाप्त होने वाला है। वैसे अगर तुम आई.ए.एस. का अपना मुखौटा उतारकर देखोगी, तो शायद तुम्हें मेरा परिचय याद आ जायेगा।"

इसके साथ ही स्क्रीन पर संदेश उभरने बंद हो गये। उस दिन विनीता का फिर किसी काम में मन नहीं लगा।

घर आकर वह चुपचाप लेट गयी। माँ ने पूछा तो उसने कहा, "कुछ नहीं माँ, बस हल्की सी थकावट है।"

माँ ने क़रीब आ कर प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुये कहा, "क्यूँ इतना मेहनत करती रहती हो। थोड़ा आराम भी किया करो।"

विनीता के होंठों पर फीकी मुस्कान आकर रह गयी। कैसे बताती वह कि वर्षों से उसने अपने चारों तरफ़ जो एक अभेद्य कृत्रिम दीवार खड़ी कर रखी थी, किसी ने उस दीवार में छेद कर झाँकने की गुस्ताख़ी कर दी थी। उसे इस सत्य से परिचित कराने की कोशिश की थी कि वह भी कभी एक लड़की हुआ करती थी। आई.ए.एस. के पद की जिस गरिमा को वह आज तक अपने मान-सम्मान का प्रतीक मानती रही थी, उसे किसी ने आज मुखौटे की संज्ञा दी थी। कौन है वह?

वह गुस्ताख़ चाहे कोई भी हो, पर उसने आज विनीता को कुछ सोचने के लिये मजबूर कर दिया था। ख़्यालों में खोई परियोजना निदेशक के अन्तर्मन से निकल कर विनीता नाम की लड़की अपने छात्र जीवन में कब पहुँच गयी, उसे पता ही नहीं चला। अगर पता चल जाता तो क्या उसके अन्दर का आई.ए.एस. उस लड़की को 12 वर्ष पुराना सफ़र तय करने की इजाज़त देता?

विनीता ने उस वर्ष लखीमपुर के युवराज दत्त महाविद्यालय में बी.एस.सी. प्रथम वर्ष की कक्षा में प्रवेश लिया था। इंटर तक की शिक्षा उसने राजकीय कन्या विद्यालय में प्राप्त की थी। घर वाले अपनी लाड़ली को विनी कह कर पुकारते थे, पर परीक्षाओं, खेल-कूद व वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में हर जगह प्रथम आने के कारण वह अपनी सहेलियों के बीच ‘विनर’ के नाम से मशहूर थी।

विनीता के प्रथम आने का सिलसिला बी.एस.सी. में आकर ठहर सा गया था। कारण था धौरहरा तहसील के एक ग्रामीण स्कूल से पढ़ कर आया छात्र रामदुलारे। अर्द्ध-वार्षिक परीक्षा में उन दोनों के बराबर अंक आये थे। पहली बार किसी ने विनीता को चुनौती दी थी। इसलिये वार्षिक परीक्षाओं में विनीता ने बहुत मेहनत की, भोजनावकाश में भी वह अकेले ही पढ़ा करती थी, परन्तु इस बार फिर दोनों के अंक बराबर थे। संयोग की बात है कि दोनों ने वार्षिक खेल-समारोह में छात्र और छात्राओं की प्रतिस्पर्धाओं में अलग-अलग, प्रथम स्थान प्राप्त किया था।

रामदुलारे न सिर्फ़ ग्रामीण परिवेश से आया था बल्कि उसकी वेशभूषा भी वैसी ही थी। उसके बालों में हमेशा तेल चुपड़ा रहता और वस्त्रों के रंगों में कोई तारतम्य ही नहीं रहता था। किसी भी रंग की पैंट पर, किसी भी रंग की कमीज़ पहन लेता था। दूसरी तरफ़ विनीता की हमेशा से फ़ैशन के अनुरूप सजने-सँवरने की आदत थी। इसीलिये जब उसकी सहेलियाँ रामदुलारे को उसका समकक्ष प्रतिस्पर्धी घोषित कर मज़ाक करतीं, तो उसके तन-मन में आग लग जाती।

अगले वर्ष कानपुर में आयोजित अन्तर-विश्वविद्यालय वाद-विवाद प्रतियोगिता में अपने कालेज का प्रतिनिधित्व करते हुये दोनों ने जब संयुक्त रूप से प्रथम स्थान प्राप्त किया था तो रामदुलारे भावुक हो उठा था। एकान्त देख कर उसने कहा, " विनी, पिछले दो वर्षों से हम दोनों हर क्षेत्र में सफलता के पायदान पर संयुक्त रूप से खड़े हो रहे हैं। क्या हमारा यह साथ हमेशा-हमेशा के लिये नहीं हो सकता है?"

यह सुनते ही विनीता भड़क उठी थी, "तुमने शीशे में कभी अपनी शक्ल देखी है? कपड़े पहनने तक की तमीज़ नहीं है और चले हो मेरा हाथ थामने?"

विनीता की डाँट सुन रामदुलारे बुझ सा गया। उसकी आँखें छलछला आयीं, उसने आहिस्ता से कहा, "विनीता, तुम भी इन्सान के सिर्फ़ बाह्य रूप को देखती हो? आन्तरिक प्रतिभा और गुणों का तुम्हारी दृष्टि में कोई मूल्य नहीं है?"

उसकी बात सुन विनीता का मन पाश्चाताप से भर उठा। उसे स्वयं अपने ऊपर शर्म आ रही थी कि आख़िर वह इतनी निष्ठुर कैसे हो गयी? शायद इसके पीछे उस अपराजिता को हर क्षेत्र में रामदुलारे से मिल रही चुनौती की कड़वाहट और उसे किसी तरह पछाड़ने की अतृप्त अभिलाषा ही मुख्य कारण थी। विनीता ने अपने को संयमित करते हुये कहा, "मुझे ग़लत मत समझो। मेरा यह आशय नहीं था। लेकिन तुम्हारे घर वालों ने तुम्हें अपनी शिक्षा पूरी करने के लिये शहर भेजा है। शिक्षा पूरी करके पहले तुम कुछ बन जाओ, फिर दुनियादारी के बारे में सोचना।"

रामदुलारे ने उसकी बात का कोई उत्तर नहीं दिया। शायद उसे वास्तविकता का अहसास हो गया था। बी.एस.सी. अंतिम वर्ष की परीक्षा देने के बाद विनीता पी.सी.एस. की प्रतियोगिता में बैठी थी। इस बीच उसके पापा का स्थानान्तरण झाँसी हो गया था। अपने दोस्तों से बिछड़ने का ग़म पी.सी.एस. की परीक्षा उत्तीर्ण करने की ख़ुशी से कम हो गया था। दो वर्षों बाद ही उसका चयन आई.ए.एस. में हो गया था। उसके बाद बिल्कुल एक नयी ज़िन्दगी उसकी प्रतीक्षा कर रही थी। पुराने साथियों और दोस्तों से इस बीच उसका सम्पर्क बिल्कुल टूट सा गया था। सत्य तो यह था कि उसने इन सम्पर्क सूत्रों को जीवन्त रखने का प्रयास ही नहीं किया था। समय की लहरों पर सवार होकर वह इतनी तेज़ी से ऊँचाइयों पर चढ़ती चली गयी थी कि अब कोई पुराना सम्पर्क सूत्र उसकी गरिमा के अभेद्य क़िले को तोड़ कर उस तक पहुँचने का साहस भी नहीं कर सकता था। ....फिर कौन था वह दुस्साहसी...?

अगले दो दिन प्रतीक्षा में ही बीत गये। भोजनावकाश के बाद भी विनीता कम्पयूटर खोले बैठी रहती, परन्तु कोई संदेश नहीं आया। विनीता अपने अन्दर एक अजीब सी बेक़रारी का अनुभव कर रहीं थी। कौन जाने, यह उसका परिचय जान कर सबक़ सिखाने की व्याकुलता थी या फिर अपने गर्व के दुर्गम दुर्ग पर अज्ञात दिशा से दोबारा होने वाले आक्रमण की आशंका। कुछ भी हो, पर वह निर्मोही कठपुतली का खेल बड़ी कुशलता से खेल रहा था।

धीरे-धीरे इस बेक़रारी ने बेचैनी का रूप ले लिया और उस दिन वह एक बैठक में अपने अधीनस्थ अधिकारियों पर बुरी तरह बरस पड़ी। विनीता की ख्याति एक सख़्त मिज़ाज अधिकारी के रूप में थी, पर वह इतनी कटु भी हो सकती है, यह स्वयं विनीता के लिये भी एक अनुभव था। अपने परिर्वतित व्यवहार पर वह स्वयं आश्चर्यचकित थी।

शाम को घर आकर वह चुपचाप लेट गयी। एक घंटे बाद कूरियर सर्विस का कर्मचारी एक छोटा सा पैकेट दे गया। उस पर भेजने वाले का नाम अंकित नहीं था। विनीता ने पैकेट खोल कर देखा तो उसमें एक कम्प्यूटर फ़्लॉपी और एक छोटी सी पर्ची रखी हुई थी, जिस पर टाईप किया हुआ था- "विनी, इस फ़्लॉपी को अपने पी.सी. पर लगा कर देखो।"

एक अज्ञात आशंका से विनीता का दिल धड़क उठा। उसने आहिस्ता से फ़्लॉपी को अपने पी.सी. (पर्सनल कम्प्यूटर) पर लगाया तो स्क्रीन पर कुछ ही क्षणों बाद संदेश उभरने लगा:

"विनी, क्या हो गया है तुम्हें? ज़रा सी उथल-पुथल से ही व्यथित हो गयी? अपनी व्यक्तिगत परेशानियों का रोश अधीनस्थों पर क्यों?

तुम भारतीय प्रशासनिक सेवा की सदस्या हो, पर अपने जीवन के प्रशासन को कुशासन में मत परिवर्तित करो। अपने अन्तर्मन की गहराइयों में उतर कर आत्म-मंथन करो तो तुम्हें आई.ए.एस. की गरिमा के नीचे दबी एक असहाय नारी नज़र आयेगी। क्या दोष है उसका? सिर्फ़ इतना, कि कभी उसने कमरतोड़ मेहनत करके तुम्हें आई.ए.एस. बनाया था। पर उसके प्रतिकार में तुमने उसे क्या दिया? अपूर्णता का अभिशाप?

एक मंत्र देता हूँ तुम्हें। प्रशासन-तंत्र के तारों को अपनी नन्ही सी मुट्ठी में कसकर तुम जितना अधिक शक्तिशाली होती जाओगी, तुम्हारे अन्दर की यह नारी उतना ही शक्तिहीन होती जायेगी। फिर ऐसी शक्ति का उर्पाजन क्यों? किसके लिये? क्या कुछ समा लेना चाहती हो अपनी इस नन्हीं सी मुट्ठी में? क्या आसमान का एक नन्हा सा क़तरा भी समा पायेगा तुम्हारी इस तथाकथित शक्तिशाली मुट्ठी में? शायद नहीं, फिर इस सत्य को स्वीकार क्यों नहीं कर लेती कि प्रकृति ने तुम्हें जो जीवन दिया है, वह बहुमूल्य है।

हो सकता है, कि तुम अपने को अपूर्ण न मानती हो, पर इस बात से इन्कार नहीं कर सकती कि प्रकृति ने नर और नारी को एक-दूसरे का पूरक बनाया है। हो सकता है कि तुम्हें किसी की ज़रूरत न हो, पर यह भी तो हो सकता है किसी और को तुम्हारी ज़रूरत हो।

आत्म-मंथन करो विनीता। जब तक मेरे प्रश्नों का उत्तर नहीं खोज लोगी, तुम्हें शांति नहीं मिलेगी और शांति ही मेरे प्रश्नों का समाधान हैं। पर शांति प्रकृति के नियमों को अस्वीकार कर, उनका तिरस्कार कर कभी नहीं मिल सकती।

प्रकृति के नियमों को स्वीकार करना ही पूर्णता की परिभाषा है और जीवन की अंतिम परिणति।

तुम्हारा
शुभ चिन्तक

स्क्रीन पर संदेश आना समाप्त हो गया था, पर इन चन्द पंक्तियों ने विनीता की अंतरात्मा तक को झकझोर दिया था। जाने कैसा जादू था, जिसने विनीता को आत्म-मंथन के लिये विवश कर दिया।

सत्य तो यह था कि उसके अन्दर की नारी को उसके अंतर्मन ने अनजाने में नहीं, बल्कि सप्रयास इस स्थिति तक पहुँचाया था। पी.सी.एस. में चयन होते ही विनीता अपने आपको आम इन्सानों से हट कर विशिष्ट मानने लगी थी और आई.ए.एस. बनते ही उसे अपने सामने पूरी दुनिया बौनी प्रतीत होने लगी थी।

उसके पिता अपनी इकलौती मेघावी पुत्री के हाथ पीले करने की अभिलाषा लिये हुये परलोक सिधार गये थे और माँ के लिये सुयोग्य दामाद की तलाश आज भी एक मृग-मरीचिका थी। रिश्तों की कोई कमी न थी। एक से बढ़ कर एक रिश्ते आये थे, पर अपने से कनिष्ठ पद वाला कोई पुरुष उसके शरीर का स्पर्श करे, इस विचार मात्र से ही विनीता को वितृष्णा होने लगती थी और अपने से वरिष्ठ पद वाले के आगे झुकने और उसकी सेवा करने की इजाज़त विनीता को उसका अंह कभी नहीं देता था।

उहापोह के इसी भँवरजाल में फँसी विनीता ने अपने जीवन की आवष्यकताओं की सूची से ‘वैवाहिक जीवन’ नामक शब्द को परे धकेल दिया था। ऐसा नहीं था कि उसने कभी शारीरिक क्षुधा का अनुभव न किया हो, पर सत्ता और शक्ति अर्जित करने की हवस के आगे अन्य प्राकृतिक क्षुधायें गौण हो जाती हैं। यह एक ऐसी भूख है, जो संपूर्ण ब्रह्माण्ड को उदरस्थ करने के पश्चात भी अतृप्त ही रहती है।

विनीता आज तक अपने को धन, वैभव, शक्ति और सामाजिक प्रतिष्ठा से परिपूर्ण व्यक्तित्व की स्वामिनी समझती रही थी, परन्तु आज पहली बार किसी ने उसे अपूर्ण होने का उलाहना दिया था। ‘अपूर्ण’ शब्द किसी गंदी गाली की तरह उसकी मर्मस्थली को बेध रहा था। उसे ऐसा अनुभव हो रहा था जैसे असंख्य बिच्छू लिजलिजाते हुये उसके शरीर पर रेंग रहे हों।

नहीं, वह अपूर्ण नहीं है। वह आज भी एक सुदर्शन शरीर की साम्राज्ञी है। विनीता उठ कर आदमक़द आईने के सामने खड़ी हो गयी। अपने प्रतिबिम्ब को निहार वह दर्प से मुस्करा उठी। उसकी झील सी गहरी आँखें, उमड़ते मेघों सी लहराती विपुल केशराशि, मोती सी दंत-पंक्तियाँ, उन्नत ललाट और सुदर्शन ग्रीवा आज भी उसे कालिदास की नायिका के समकक्ष सिद्ध कर रहे थे। हर दृष्टि और प्रत्येक कोण से वह संपूर्ण है। अपूर्णता का कहीं कोई नामोनिशान न था।

तभी अचानक बिजली चली गयी। अंधकार ने संपूर्ण वातावरण को अपनी स्याह चादर में समेट लिया। कहीं ऐसा ही अंधकार उसके जीवन में तो नहीं आ रहा? विनीता ने सोचा, एक पल के लिये उसके हृदय में कम्पन हुआ, पर अगले ही क्षण उसके अन्दर से किसी ने फन उठा कर कहा, ‘अंधकार क़रीब आया तो क्या? अँधेरे को उजाले में परिर्वतित करने की शक्ति है मुझमें।’

तभी बिजली फिर आ गयी, पूरा कमरा रोशनी से नहा उठा। विनीता अब अपने को हल्का अनुभव करने लगी थी। अपने अंदर स्फूर्ति लाने के लिये उसने अपने केशों पर हाथ फेरा तो चौंक पड़ी। काले मेघों के बीच छुप कर कौन उसे मुँह चिढ़ा रहा था? विनीता ने ध्यान से देखा तो चाँदी के तार सा चमकता हुआ सफ़ेद बाल स्वयं अपना परिचय देने का दुस्साहस कर रहा था। इस घुसपैठिये को वर्जित क्षेत्र में अनधिकृत प्रवेश करने के अपपराध का तो दंड भोगना ही था। विनीता ने दायाँ हाथ बढ़ाकर उसे जड़ से उखाड़ लिया। अपनी उँगलियों मे दबे असहाय अपराधी पर एक घृणा भरी दृष्टि डाल उसने उसे उपेक्षापूर्वक कूड़ेदान में फेंक दिया। उसे चुनौती देने वालों को वह ऐसे ही जड़ से उखाड़ कर नष्ट कर देगी। विनीता ने सोचा और अनायास ही उसके होठों पर एक मुस्कान थिरक उठी।

‘विनीता, अपनी इस क्षणिक सफलता पर मुस्कराओ मत’ तभी एक आवाज़ सुनायी पड़ी।

"कौन है? " विनीता चौंक पड़ी।

"तुम मुझे रक्तबीज का वंशज कह सकती हो। तुम मुझे जितना नष्ट करने की कोशिश करोगी, मेरे उतने ही प्रतिबिम्ब तुम्हें और नज़र आयेंगे ।’

विनीता को लगा कि यह आवाज़ कूड़ेदान से आ रही है। उसने ध्यान से देखा लेकिन कूड़ेदान में उसके द्वारा फेंके गये सफ़ेद बाल के अतिरिक्त और कुछ न था। लेकिन निर्जीव वस्तु से तो आवाज़ नहीं आ सकती? फिर कौन था, जो अपने को रक्तबीज का वंशज बता रहा था? उसने चारों ओर दृष्टिपात किया, किन्तु कक्ष में उसके अतिरिक्त कोई और नहीं था। शायद उसका वहम रहा होगा, विनीता ने ठंडी साँस भरते हुये सोचा।

अनायास ही विनीता का हाथ एक बार फिर अपने सिर पर चला गया। बिखरे हुये बालों को सँवारने के लिये उसने उन्हें अपनी उँगलियों से पकड़ा ही था कि बुरी तरह चौंक पड़ी। चाँदी के तार से चमकते हुये कई सफ़ेद बाल इधर-उधर छिपे हुये उसका उपहास उड़ा रहे थे। जड़ हो गयी विनीता। क्या रक्तबीज की तरह उनके इतने प्रतिरूप इसी क्षण तैयार हो गये या उनका अस्तित्व पहले से ही था या फिर उमय ने उस अपराजिता को पराजित करने की ठान ली थी?

काफ़ी देर तक विनीता सुन्न सी खड़ी रही, फिर अ

"यह क्या कर रही हो विनीता?" आईने में दिखायी पड़ रहे विनीता के प्रतिबिम्ब ने उसे टोका।

"ये....मेरे साथ नहीं रह सकते। मैं इन्हें नष्ट कर डालूँगी," विनीता ने क्रोध से अपने जबड़े भींचे।

"तो क्या तुम राजा ययाति की भाँति चिरयौवना रहना चाहती हो?"

"हाँ-हाँ मैं चिरयौवना रहना चाहती हूँ," विनीता चीख सी पड़ी।

"लेकिन ययाति को तो यौवन उसके पुत्र ने उपहार में दिया था। तुम्हें कौन देगा? तुम तो वंशहीन हो। एक दिन तुम्हारे साथ ही तुम्हारा वंश समाप्त हो जायेगा," प्रतिबिम्ब ने गंभीर स्वर में कहा।

"नहीं, मैं वंशहीन नहीं हो सकती," विनीता ने तीव्र स्वर में प्रतिवाद किया।

"क्यों? तुम तो अपनी माता-पिता की इकलौती संतान हो और अपने में एक संपूर्ण मनुष्य, फिर भला......"

"हाँ...हाँ, मैं एक संपूर्ण व्यक्तित्व की स्वामिनी हूँ। क्या कमी है मुझमें?" विनीता ने लगभग चिल्लाते हुये कहा।

"किसे धोखा दे रही हो तुम? मैं प्रतिबिम्ब हूँ तुम्हारा, ध्यान से देखो मुझे। क्या तुम्हें मेरी माँग का सूनापन नहीं दिखायी पड़ रहा? क्या तुम्हें मेरी आँखों में एक अतृप्त प्यास नज़र नहीं आती? क्या मेरे कान प्यार के दो बोल और किसी की किलकारी सुनने के लिये नहीं तरसते? क्या मेरा हृदय किसी और के लिये नहीं धड़कना चाहता? क्या मेरी बाँहें किसी और की बाँहें थाम सुकून नहीं ढूँढ़ना चाहतीं? कया मेरी कोख किसी का इन्तज़ार नहीं कर रही? कहाँ से पूर्ण हूँ मैं? क्या मेरा एक-एक अंग अपनी अपूर्णता की दास्तान नहीं सुना रहा.....?

"चुप हो जाओ, भगवान के वास्ते चुप हो जाओ," विनीता अपने कानों पर हाथ रख चीत्कार कर उठी।

"भगवान, कौन सा भगवान? जिसका अस्त्तिव ही नहीं है या अगर है भी तो जिसके बनाये सृष्टि के नियमों को तुम तोड़ देना चाहती हो?"

"तो फिर मैं क्या करूँ?" विनीता की बेबसी उसके स्वर से झलक उठी।

"अपने बहुमूल्य जीवन को अभिशप्त होने से बचा लो," इसके साथ ही आईने से उसका प्रतिबिम्ब अंर्तध्यान हो गया। विनीता को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जो कुछ भी उसने अभी देखा-सुना था, वह सत्य था या मात्र उसका वहम? जो भी हो पर वास्तविकता तो यही थी कि आज आईने ने ही उसे आईना दिखा दिया था।

पूरी रात विनीता करवटें बदलती रही, नींद उसकी आँखो से ग़ायब हो चुकी थी। अगले दिन कार्यालय पहुँचने के थोड़ी ही देर बाद चेयरमैन ने उसे अपने कक्ष में बुलवा लिया था। प्रबंध निदेशक/ वित्त कश्यप साहब वहाँ पहले से ही उपस्थित थे।

विनीता को कुर्सी पर बैठने का इशारा करते हुये चेयरमैन साहब ने पूछा, "मैडम, कैसी हैं आप?"

"ठीक हूँ सर," विनीता ने संक्षिप्त उत्तर दिया।

"मैडम, उत्तर प्रदेश के लखीमपुर-खीरी ज़िले के तराई क्षेत्र में एक जंगल है जिसे ‘दुधवा नेशनल फ़ॉरेस्ट’ के नाम से जाना जाता है। इन जंगलों में सभ्यता से दूर थारू नाम की जनजाति रहती है। विकास की किरणें अभी तक इस जनजाति तक नहीं पहुँच सकी हैं। थारुओं के सर्वांगीण विकास के लिये विश्व बैंक से 5. करोड़ रुपये की सहायता मिलने वाली है। मैं चाहता हूँ कि आप और कश्यप साहब वहाँ जाकर वहाँ की परिस्थितियों का आकलन कर एक कार्य-योजना तैयार करें," इतना कह कर चेयरमैन साहब एक क्षण के लिये रुके फिर बोले, "आप कब तक वहाँ जाने की तैयारी कर सकती हैं?"

"मुझे कोई विशेष तैयारी नहीं करनी है। कश्यप साहब जब भी चलना चाहें, मैं तैयार हूँ," विनीता ने कहा।

"ठीक है मैडम, फिर कल प्रातः 5 बजे कार्यालय की गाड़ी से मैं आपको लेने आपके घर आ जाऊँगा। आप तैयार रहियेगा," कश्यप साहब ने संभ्रात स्वर में कहा।

मृदुभाषी कश्यप साहब विनीता से एक वर्ष वरिष्ठ आइ.ए.एस. थे, विनीता की उनसे यह दूसरी मुलाक़ात थी। कुछ दिनों पूर्व जब उन्होंने इस कार्यालय में कार्य-भार ग्रहण किया था, तब विनीता से उनका औपचारिक परिचय हुआ था। विनीता ने उन्हें ध्यान से देखा। उनके घुंघराले बाल, फ़्रेंच कट दाढ़ी और आँखों पर सुनहरा चश्मा उनके गंभीर व सौम्य व्यक्तित्व में एक अजीब सा आर्कषण उत्पन्न कर रहे थे।

विनीता ने कभी सोचा भी न था कि इतने वर्षों बाद पुनः लखीमपुर जाने का अवसर मिलेगा। विद्यार्थी जीवन में वह अपने कॉलेज की तरफ़ से एक बार दुधवा में बने राष्ट्रीय उद्यान में घूमने आयी थी। तब उसने अपनी सहेलियों के साथ वहाँ बहुत धमा-चैकड़ी मचायी थी। पर तब और अब में काफ़ी अन्तर था। फिर भी पुरानी स्मृतियाँ ताज़ी हो जाने के कारण वह काफ़ी पुलकित थी। 

दिल्ली से दुधवा तक का सफ़र लगभग 400 किमी. का था। दोपहर बाद वे लोग वहाँ पहुँच पाये थे। उस दिन देर रात तक विश्व बैंक की टीम और थारू समुदाय के प्रतिनिधियों से विचार-विमर्श चलता रहा। अगला दिन भी थारूओं की बस्तियों का दौरा करने और उनके सामाजिक जीवन और रहन-सहन की परिस्थितियों का अध्ययन करने में बीत गया। शाम होते ही विश्व बैंक की टीम आवश्यक दिशा-निर्देश देकर लौट गयी। विनीता और कश्यप साहब को एक दिन और रुकना था।

वे लोग राज्य सरकार के अतिथि गृह में ठहरे हुये थे। दो दिनों की भाग-दौड़ में विनीता बुरी तरह थक गयी थी। दिल्ली की अपेक्षा यहाँ ठंड कुछ ज़्यादा थी। अतिथि गृह के केयरटेकर ने अलाव जलवा दिया था। अलाव के पास आराम-कुर्सी पर बैठ कर विनीता और कश्यप साहब काफ़ी की चुस्की ले रहे थे। केयरटेकर भी साथ बैठा हुआ था। वह स्थानीय निवासी था। अतिथि गृह से 2 किमी. दूर जंगलों के बीच ही उसका गाँव था। शहर जाकर उसने हाई स्कूल तक की शिक्षा ग्रहण की थी। स्थानीय परिवेश के हिसाब से उसे प्रगतिशील कहा जा सकता था। उससे बातचीत करते हुये उन्हें थारुओं के जन-जीवन और रीति रिवाजों के बारे में ऐसी अनेक बातें ज्ञात हुईं जिन्हें बाहर से आये व्यक्ति के लिये जान पाना दुष्कर था।

तभी केयरटेकर ने पूछा, "मेमसाब, जानती हैं, इन थारुओं के पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण क्या है?" 

"नहीं," काफ़ी का घूँट भरते हुये विनीता बोली।

"इनके समाज में पुरुषों को हमेशा हेय दृष्टि से देखा और तिरस्कृत किया जाता रहा है। बहुत से घरों में आज भी पुरुषों का रसोई में प्रवेश वर्जित है। स्त्रियाँ थाली रख कर पैर की ठोकर से रसोई से बाहर निकालती हैं, तभी पुरुष भोजन ग्रहण कर पाता है। जिस समाज में आधी आबादी को दोयम दर्जे का नागरिक माना जाता हो, वहाँ के लोग अपनी अपमानित ज़िन्दगी को ढो तो सकते हैं, पर विकास के पथ पर अग्रसर नहीं हो सकते। क्योंकि विकास की ललक पैदा करने के लिये जिस आत्मविश्वास की आवश्यकता होती है, उसका ऐसे समाज में अभाव होता है," केयरटेकर ने बताया।

विनीता के कश्यप साहब की तरफ़ देखा। वे काफ़ी की चुस्कियाँ लेते हुये बहुत ध्यान से चौकीदार की बातें सुन रहे थे। विनीता ने पास रखी सूखी लकड़ी से अलाव को कुरेदते हुये केयरटेकर से पूछा, "लेकिन ऐसा क्यों है?"

अलाव की आँच काफ़ी तेज़ हो गयी थी। केयरटेकर ने पीछे खिसकते हुये कहा, "किवदंती है कि मुस्लिम शासकों ने जब राजपुताने पर आधिपत्य कर वहाँ की धन-संपदा को हस्तगत करना आरंभ कर दिया था, तब राजपूत रानियाँ अपने सतीत्व और सम्पत्ति को उनकी कुदृष्टि से बचाने हेतु अपने नौकरों के साथ जंगलों में छिप गयी थीं। बाद में राजपूत तो युद्व में शहीद हो गये और उनकी रानियाँ फिर कभी अपने घर न लौट सकीं। उनमें से कुछ ने तो ख़ामोशी के साथ मृत्यु को स्वीकार कर लिया था, पर कुछ प्रकृति से लड़ न सकीं और समय बीतने के साथ-साथ उन्हीं नौकरों से उन्हें सन्तानोपत्ति हुई, पर अपने को श्रेष्ठ समझने की मानसिकतावश पूर्णता के समीप पहुँच कर भी वे अपूर्ण ही रहीं। उसका अभिशाप उनके वंशज आज तक भोग रहे हैं। प्रकृति ने तो स्त्री और पुरुष को एक-दूसरे का पूरक बनाया है। इस सत्य की आवश्यकता को अनुभव करके भी अपने को श्रेष्ठ समझने का जो पाप उन्होने किया था, उसका दंड तो उनके समाज को भोगना ही था," इतना कह कर केयरटेकर खाने का प्रबंध करने चला गया।

विनीता आवाक बैठी रही। जंगलों में रहने वाला यह अल्पशिक्षित केयरटेकर पूर्णता और अपूर्णता की कितनी सहज व्याख्या कर गया था। तो क्या अपनी श्रेष्ठता के अभिमानवश वह भी....? इसके आगे उसकी सोचने समझने की शक्ति ही समाप्त हो गयी।

"क्या सोच रही हो विनीता?" उसे चुप देख कर कश्यप साहब ने पूछा।

"मैं...मैं...सोच रही थी...कि," विनीता चाहकर भी अपनी अभिव्यक्ति को शब्दों का रूप नहीं दे सकी।

"तुम ठीक सोच रही हो विनी, पूर्णता और अपूर्णता की जो व्याख्या जंगलों में रहने वाले इस अल्पशिक्षित व्यक्ति ने की है, वह बिल्कुल सत्य है। इस सत्य को स्वीकार कर तुम आज भी ‘विनर’ बन सकती हो," कश्यप साहब ने गंभीर स्वर में कहा।

‘विनी और विनर’ यह तो उसके पुराने नाम हैं। विनीता चिहुँक सी उठी। उसने कश्यप साहब को घूरते हुये पूछा, "कौन हैं आप और मेरे बारे में क्या जानते हैं?"

"मुझे नहीं पहचाना तुमने? मैं हूँ आर.डी.कश्यप। आर.डी. फ़ॉर......?" कश्यप साहब ने अपनी आँखों से चश्मा उतारते हुये कहा। उन्होंने जान बूझ कर वाक्य अधूरा छोड़ दिया था।

"आर... डी...," विनीता मन ही मनबुदबुदायी। उसे कश्यप साहब की आँखें कुछ पहचानी-पहचानी सी लगीं। अचानक जैसे कुहासा छँट गया और तस्वीर साफ़ हो गयी। वह आहिस्ता से बोली, "आर.डी... आप कहीं मेरे बी.एससी. के सहपाठी राम....?"

"तुम्हारा अंदाज़ा सही है। मैं तुम्हारा सहपाठी रामदुलारे कश्यप ही हूँ," कश्यप साहब ने अपने बालों में हाथ फेरते हुये कहा।

"ओह, मैं तो आपको पहचान ही नहीं पायी थी," विनीता ने साँस भरते हुये कहा।

"पहचानती भी कैसे? तुमने जिस रामदुलारे को देखा था, वह बालों में तेल चुपड़े रहता था। उसे तो कपड़े पहनने तक की तमीज़ नहीं थी।"

"उस बात के लिये मैं शर्मिन्दा हूँ।"

"इसकी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि तुम्हारी वह डाँट ही मेरे लिये प्रेरणा स्रोत बन गयी थी और मैंने कुछ बनने की ठान ली थी। तुम्हारे पी.सी.एस. में चयन होने के अगले वर्ष ही मेरा चयन आई.ए.एस. में हो गया था। उसके अगले वर्ष तुम भी आई.ए.एस. बन गयी थी। पर संकोचवश मैं चाह कर भी कभी तुम्हारे पास दोबारा नहीं आ सका। क़िस्मत से जब मेरा स्थानान्तरण तुम्हारे कार्यालय में ही हो गया, तो उस दिन तुम्हें देखते ही पुरानी यादें ताज़ा हो गयीं।"

"तो....कम्प्यूटर पर संदेश देने वाले आप ही थे?"

"हाँ, तुम्हारी शांति भंग करने वाला अपराधी मैं ही हूँ। पर विश्वास करो, मुझे तुम्हारा इन्तज़ार आज भी है। तुम्हारे बिना मैं आज भी अपूर्ण हूँ।"

"अपूर्ण आप नहीं बल्कि अपनी अज्ञानतावश अपूर्णता का अभिशाप आज तक मैं भोग रही हूँ," विनीता ने दर्द भरे स्वर में कहा।

"यह तुम कह रही हो?"

"हाँ, इस सत्य को स्वीकार करने का साहस मुझमें आपने ही ने उत्पन्न किया है। मैं बहुत थक चुकी हूँ, असत्य से लड़ते-लड़ते। अपनी अपूर्णता को पूर्णता में परिवर्तित करने के लिये मुझे आपकी सहायता की आवश्यकता है ...क्या मेरी सहायता करेगें?" विनीता ने अपना हाथ कश्यप साहब की तरफ़ बढ़ाते हुये कहा।
    
कश्यप साहब ने एक पल विनीता के बढ़े हुये हाथ को निहारा, फिर आगे बढ़ कर उसे थाम लिया।

एक सुखद अहसास और तृप्ति की भावना विनीता के चेहरे पर चमक उठी। 

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