आटा और जिस्म

सतीश राठी

दोनों हाथ मशीन में आने से सुजान विकलांग हो गया। नौकरी हाथ से गयी। जो कुछ मुआवज़ा मिला वह कुछ ही दिनों में पेट की आग को होम हो गया। रमिया बेचारी लोगों के बर्तन माँजकर दोनों का पेट पाल रही थी।

पर ... आज! आज स्थिति विकट थी। दो दिनों से आटा नहीं था और भूख से बीमार सुजान ने चारपाई पकड़ ली थी। सुजान की वीरान आँखों में उगे प्रश्न एवं भूखे पेट से निकली कराहटें रमिया सहन नहीं कर पा रही थी।

मन में कुछ सोचकर वह झोपड़ी से बाहर जाने लगी तो सुजान पूछ बैठा – “कहाँ जा रही है रमिया?”

“देखूँ! शायद बनिया तरस खाकर कुछ उधार दे दे।” ठंडे स्वर में रमिया बोली थी।

कुछ समय बाद अस्त–व्यस्त रमिया कुछ आटा लाई और पुरानी परात में उसे गूँधने लगी। कराहते हुए सुजान को उस गूँधे हुए आटे में और पत्नी के जिस्म में कोई फ़र्क नहीं लग रहा था।

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