सिये तुमने मृगतृष्णा क्यों जगाई

15-05-2026

सिये तुमने मृगतृष्णा क्यों जगाई

आराधना श्रीवास्तव  (अंक: 297, मई द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

सिये तुमने मृगतृष्णा क्यों जगाई। 
कह कह बिलखे बहुत रघुराई॥
 
होता नहीं मृग सोने का, 
क्यों समझा न पाया। 
अपनी सुनहरी काया से, 
भटका मुझे लखन लखन चिल्लाया। 
 
मारीच तो खेल रहा था 
पर तुमने सौगंध क्यों चढ़ाई। 
कह कह बिलखे बहुत रघुराई। 
सिये तुमने मृगतृष्णा क्यों जगाई। 
 
कहाँ हो सिया मेरी
बिन समझे क़दम क्यों बढ़ाया। 
हरण हुआ है तुम्हारा, 
गिद्धराज जटायू ने है बताया। 
 
प्राण त्यागने से पहले तात ने
सारी कथा व्यथा है सुनाई। 
कह कह बिलखे बहुत रघुराई। 
सिये तुमने मृगतृष्णा क्यों जगाई॥
 
भटक रहा मैं वन वन
सिये तुम्हारी खोज में। 
नहीं है भूख प्यास और
नींद तुम्हारी सोच में। 
 
नयनों से नित आँसू बहते 
अब न दें कुछ दिखाई। 
कह कह बिलखे बहुत रघुराई। 
सिये तुमने मृगतृष्णा क्यों जगाई॥

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