क़ैद की सुंदरता
अकांक्षा पाण्डेय
उड़ती चिड़िया किसे भाती,
पिंजरे वाली ही सुहाती।
खुली फिरती गाय न भाए,
खूँटे से बँधी लुभाती।
ये कैसी सोच समाज की—
आज़ादी भी खटक जाती।
जो चुप रहे, जो झुककर जीए,
वही यहाँ सुंदर कहलाती।
बिटिया हो, बहू हो या पंछी,
सब पर एक ही ताला है—
क़ैद में ही क्यों ढूँढ़ते हम
सुंदरता का उजाला हैं?
सच बस इतना समझ लो—
यहाँ उड़ान नहीं, बंधन बिकता है,
जो जितना क़ाबू में रहता,
वो उतना ही अच्छा दिखता है।
4 टिप्पणियाँ
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4 Jun, 2026 11:48 AM
आपकी कविता अच्छी लगी। ठीक इसी तरह की रचना अर्थात एक तरह की थीम पर,कुछ महीने पहले साहित्य कुंज पर प्रकाशित हुई है। 'सखी' टाइटल के साथ जिसे लिखा है अवनीश कश्यप ने। आपको जरूर उनकी कुछ कविताएं देखनी चाहिए- स्त्री,माया, अब तुम्हारी बारी है।
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4 Jun, 2026 12:35 AM
प्रिय आकांक्षा जी मैं आपकी कविता अलग अलग मंच पर निरन्तर पढ़ती हूं आपकी लेखनी बहुत अच्छी है सच कहे तो मेरे जीवन के संघर्षों में मेरे लिए सहायक रही है आपकी सोच आपके चीज़ों को देखने का तरीका बहुत अद्भुत है हमे आपकी कविता का इंतजार रहता है अनुरोध यह है आपसे की निरंतर कविताएं आपकी आती रहे बहुत बहुत धन्यवाद
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3 Jun, 2026 06:59 PM
Bahut sundar kavita hai . शीर्षक को बहुत अच्छी तरह प्रस्तुत किया है।
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2 Jun, 2026 11:22 AM
बहुत हे सुंदर कविता भाव बहुत अच्छे है