प्रेम-तपिश
अनिल कुमार यादव
कहीं दूर, किलिमंजारो के शिखर पर—
जमी उस शाश्वत बर्फ़ की शिला से हो तुम,
जाने कब पिघलोगे?
तुम्हारी प्रतीक्षा में जमी हुई आस भी,
अब मुट्ठी से रेत सी फिसलती जा रही है।
तुम्हारे मन की यह जटिलता,
कांगो के आदिम, गहरे-घने जंगलों सी है,
जहाँ उम्मीद की कोई किरण,
मन की ज़मीन तक पहुँच ही नहीं पाती।
ऐसे में, मैं नील नदी सा बहकर—
तुम तक पहुँचना चाहता हूँ।
माना यह सफ़र लंबा है,
मगर बिना थके, बिना हारे चलना चाहता हूँ।
जहाँ नील का उद्गम है,
ठीक वहीं मिलूँगा तुमसे;
तब तक यह अनवरत साधना जारी रहेगी।
देखना है, मेरे प्रेम की तपिश—
तुम्हारे मन के शिखर पर जमी बर्फ़ को पिघला पाती है या नहीं . . .