मेरी ठकुरानी 

15-05-2026

मेरी ठकुरानी 

आशीष सिंह ‘अद्वैत’ (अंक: 297, मई द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)


छंद: मनहरण कवित्त 

 
चलत महारानी सी झूम ठकुरानी सी वो, ठुमक ठुमक कर आती इसी ओर है। 
गर्व तो ऐसा है कि जान लेले प्रेमी की भी, क्षण नहीं देखेगी पर मन में हिलोर है॥ 
 
बालिकाओं की सभा का हंस है वो देखने में, हम दूर दूर बैठे काग मन चोर हैं। 
वो जो हसें एक बार करके बिना शृंगार, तब पता चले मोह माया काहे ज़ोर है॥1॥ 
 
नैनों से तीरंदाज़ी ऐसे करे कोई जैसे, सौंदर्य निहारन को आया कोई चोर हैं। 
रूप देखे काम भी तो रति को भी छोड़ आवे, उसे देख देख मन होता ही विभोर है॥
 
मन में उमंग भर प्रेम भरे नयनों से, देखले किसी को गिर जाता एक ओर है। 
प्रेम करे प्रेम से तो प्रेमी के भी भाग्य खुले, छूने से ही द्रव ऐसा चाहना कठोर है॥2॥ 

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