लकीरें हाथ की फ़ुरसत में देखता हूँ मैं
डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’
मुज्तस मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़ मस्कन
मुफ़ाइलुन फ़इलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
1212 1122 1212 22
लकीरें हाथ की फ़ुरसत में देखता हूँ मैं,
पता नहीं चला तुझको भी चाहता हूँ मैं।
मिरे नसीब ने देखा है ज़िन्दगी को भी,
क़रीब तल्ख़ हक़ीक़त भी जानता हूँ मैं।
उसी का है दिया चाहे तो सब ले जाए वो,
मुझे नहीं कोई इंकार मानता हूँ मैं।
तू देख ले कभी सूरत भी ग़ौर से मुझमें,
हरेक वक़्त का बीता सा आईना हूँ मैं।
बुढ़ापे सब्र ही कोई तो साथ दे जाए,
वो मुश्किलों ही निभा दे न पूछता हूँ मैं।