ख़ाक में क्या मिला क्या अगन कर दिया
डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
212 212 212 212
ख़ाक में क्या मिला क्या अगन कर दिया,
हाथ आया तो सोजे - वतन कर दिया।
आतंकी वो यहीं घूमता था मिला,
हर रिदा बारहा वो कफ़न कर दिया।
छोड़ना बस नहीं गर मिले अब कहीं,
ख़ून में खौलता सा वजन कर दिया।
सब उसे जानते हैं मसीहा के तौर,
फिर वही ग़ल'तियाँ आदतन कर दिया।
रौंद के जो गया पाँच सालों में जो,
पाँच माहों में मौसम चमन कर दिया।
नफ़रतों में सुलग जो गई बस्तियाँ,
सब्र ने हाथ से आचमन कर दिया।