गंगा में तैरते मिट्टी के दीये: भारतीय संस्कृति और जापानी काव्य का अद्भुत कलात्मक सेतु
रामकिशोर उपाध्यायसमीक्षित पुस्तक: पुस्तक: गंगा में तैरते मिट्टी के दीये
काव्य संग्रह हाइकु, ताँका, सेदोका संकलन
लेखक: डॉ. रमा द्विवेदी
प्रकाशक: शब्दांकुर प्रकाशन
पृष्ठ संख्या: १३८
मूल्य ₹300
उपलब्धता: गंगा में तैरते मिट्टी के दीये (amazon.in)
‘गंगा में तैरते मिट्टी के दीये’ काव्य-संग्रह पिछले दिनों युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच के वार्षिक कार्यक्रम में डॉ. रमा द्विवेदी ने मुझे भेंट किया था और तभी से मैं इस पर लिखने की सोच रहा था। ‘गंगा में तैरते मिट्टी के दीये’ का प्रकाशन दिल्ली के शब्दांकुर प्रकाशन ने किया है। पेपरबेक संस्करण का मूल्य मात्र तीन सौ रुपये है। मैं डॉ. रमा द्विवेदी की साहित्य सृजन यात्रा से पिछले कई वर्षों से परिचित हूँ। कविता कहानी या लघुकथा हो, सभी पर उनकी क़लम बड़े सशक्त ढंग से चली है और वे अपने महत्त्वपूर्ण लेखन के लिए समय-समय पर सम्मानित भी होती रही हैं। ‘गंगा में तैरते मिट्टी के दीये’ उनकी सृजन यात्रा की यह छठी पुस्तक है। इससे पहले ‘दे दो आकाश’, ‘रेत का समंदर’ काव्य संग्रह, हाइकु संग्रह ‘साँसों की सरगम’, गद्य विधा में लघुकथा संग्रह ‘मैं द्रौपदी नहीं हूँ’ एवं कहानी संग्रह ‘खंडित यक्षिणी’ प्रकाशित हो चुके हैं और मैंने पढ़े भी हैं। ‘मन की बात’ में अपने विषय में कवयित्री लिखती हैं कि उनके लेखन का यह सफ़र अब छठी सीढ़ी पर आ गया है। इस अवधि में उन्होंने ग्यारह वर्ष की लम्बी अवधि में समय-समय पर हाइकु, ताँका और सेदोका लिखे और इस संग्रह के रूप में ‘गंगा में तैरते मिट्टी के दीये’ शीर्षक से पाठकों के समक्ष रखने का प्रयास किया है। हम सभी भारतीय संस्कृति में गंगा का आध्यात्मिक और दार्शनिक महत्त्व से परिचित हैं। गंगा हमारे जीवन के हर संस्कार से जुड़ी है और हिंदू धर्म का पालन करने वाले लोग गंगा में स्नान के पश्चात दीप दान, अर्पण-तर्पण और समर्पण के रूप में करते हैं। तैरते दीये/अर्पण व तर्पण/समर्पण भी का प्रतीक है और तदनुसार पंच महाभूतों से निर्मित यह काया अंत में पंचभूतों को ही समर्पित हो जाती है। इस दृष्टि से ‘गंगा में तैरते मिट्टी के दीये’ शीर्षक आकर्षक ही नहीं संग्रह को सार्थकता भी प्रदान करता है।
‘गंगा में तैरते मिट्टी के दीये’ संग्रह को कवयित्री ने चार खण्डों में विभाजित किया है। प्रथम खंड: प्रकृति-पर्यावरण-बसंत बहार, अध्यात्म-दर्शन-भक्ति, कोविड त्रासदी-प्रकृति का कहर-आतंकी संत्रास, विज्ञान के अन्वेषणः हाइकु, मानवीय जीवन के विविध अनुभव हाइकु, विजयोत्सव-दीपोत्सव, हाइकु हूँ मैं एवं अन्य हाइकु नाम से सात भागों में वर्गीकृत किए गए हैं। इस खंड में कुल 422 रचनाएँ संकलित हैं। हाइकु तीन पंक्तियों में 5-7-5 अक्षरों के क्रम में लिखा जाने वाला छंद है। प्रकृति पर उनके हाइकु की बानगी देखिये:
तैरते दीये / अर्पण व तर्पण / समर्पण भी।
मोक्षदायिनी / पापनाशिनी गंगा / भव तारिण।
द्वितीय खंड में ‘साँसों की सरगम’ से प्रतिनिधि हाइकु संकलित हैं जिनकी कुल संख्या 157 है। आइये इसके दो उदाहरणों के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं:
स्वर्ग है कहीं / माँ के ही चरणों में / ढूँढ़ो तो सही।
बसंत पुत्र / जीवन भर तपा / गाया बसंत।
इसके तृतीय खंड में जापानी विधा ‘ताँका’ में उनकी कुल 92 कविताएँ संकलित हैं। इस वर्णिक छंद की मापनी–5-7-5-7-7 (कुल 31 वर्ण) जिसे अलग-अलग पंक्तियों में लिखने का विधान है। 7+7 वर्ण जोड़ते हुए यह संख्या सौ वर्णों तक भी जा सकती है। ताँका कई सौ साल पुरानी जापानी काव्य विधा है जिसका आजकल भारत में विशेषकर हिंदी में लिखने का चलन बढ़ा है। आइये दो सुन्दर ताँका रचना को देखें:
ताँका नं 2 : खो गया सब / सभ्यता की दौड़ में / सुख-सुकून / दौड़ रहे फिर भी / आँखों से।
ताँका नं 45: प्रिय-वियोग / जीवन पूँजी ख़त्म / रिश्ते हैं मौन / भँवर फँसी नाव / उबारे अब कौन?
इस संग्रह के अंतिम और चतुर्थ खंड में जापानी विधा ‘सेदोका’ 72 रचनाएँ संकलित हैं। इस वर्णिक छंद की मापनी–5-7-7, 5-7-7 (कुल 38 वर्ण) जिसे अलग-अलग पंक्तियों में लिखने का विधान है। आइये उनके सेदोका छंद देखें:
सेदोका 27: कर्मों का खेल / पास तो कोई फ़ेल / विचित्र है ये रेल / कभी रेंगती / कभी बनती मेल / यही ठेलमठेल।
सेदोका 65: रास्ते कठिन/नदी बहती रहे/प्रेम की चाहत में/समर्पित हो/सागर में समाती/जल बरसाती है।
हालाँकि मुझे इस संग्रह की सभी रचनाएँ बहुत प्रिय लगीं, लेकिन कुछेक रचनाओं ने मेरा ध्यान आकर्षित किया कि मैं उन पर अपनी विशेष टिप्पणी करूँ।
हाइकु 13: अहं का ब्रांड / जिसमें डूबा हुआ / सारा ब्रह्माण्ड। यह हाइकु अद्वैत वेदांत की अवधारणा को व्यक्त करता है। यह रचना “अहम् ब्रह्मास्मि” महावाक्य से प्रेरित लगती है, जो बृहदारण्यक उपनिषद में वर्णित है। अहंकार की सीमा को पार कर आत्मा को ब्रह्म के साथ एकरूप मानना इसका मूल है—व्यक्ति स्वयं ही सारा ब्रह्मांड है, जिसमें सब कुछ डूबा रहता है। जैन आध्यात्मिक संदर्भों में भी शून्यता के माध्यम से ब्रह्मांड की उत्पत्ति का उल्लेख मिलता है, जहाँ अंदरूनी शून्य से ब्रह्मांड प्रकट होता है। यह विचार व्यक्ति को माया या बाहरी संसार से ऊपर उठाकर आंतरिक ब्रह्म की ओर ले जाता है। भगवान का हिस्सा होने पर ज़ोर देते हुए, यह बताता है कि हम ब्रह्म के अंश हैं, जैसे लहरें समुद्र में विलीन। साधना से इस अहं को शुद्ध कर ब्रह्मांड के ज्ञाता बनने का संदेश देता है।
हाइकु 289: विषैली गैस / लील गई पीढ़ियाँ / हुईं अपंग। इस हाइकु में कवयित्री पर्यावरण के प्रति अपनी चिंता व्यक्त करती हुई कहती हैं कि विषैली गैसों के उत्सर्जन से वर्तमान ही नहीं हमारा भविष्य का जीवन भी संकट में पड़ता दिखाई दे रहा है।
हाइकु 290: वक़्त की पीड़ा / फूट पड़ी छिद्रों में / प्रस्तर रोया। हाइकु 291: पाषाण सहे / वक़्त-वक़्त की मार / छिद्रों से कहे। और हाइकु 293: रहे अमिट / सदियों की दास्तान / पत्थर कहें। में वह कहती हैं कि बदलते सामाजिक और पारिवारिक संबंधों में आ रहे ठंडेपन से मनुष्य का कोमल हृदय ही नहीं बल्कि घरों की दीवारें भी क्रंदन करने लगी हैं। यह उनकी चिंता ही नहीं बल्कि समाज को समय रहते सुधरने का संकेत भी देती हैं कि हम अपने उन मूल्यों की ओर लौट चलें जिनसे कभी मानव एक सहृदय मानव की भाँति व्यवहार करता था ।
हाइकु 294: टूटते पुल / जारी रहीं यात्राएँ / आस्था की नाव। इस हाइकु के माध्यम से कवयित्री यह कहना चाहती हैं कि यदि सार्वजनिक जीवन में बढ़ते भ्रष्टाचार और नैतिक परम्पराओं का पतन उपयुक्त गुणवत्ता न होने के कारण नदियों पर बने पुलों की भाँति हो रहा है। यदि यह स्थिति यूँ ही जारी रही तो एक दिन सत्ता और सामाजिक व्यवस्था से लोगों का विश्वास टूट ही जाएगा। यहाँ कवयित्री ने एक अच्छे रूपक का प्रयोग कर हाइकु के सौन्दर्य में वृद्धि की है।
ताँका 65: जीवन पूँजी / जोड़ना व घटाना / सब भूल के / रिश्तों को है निभाना / ख़ुशहाल बनाना। में कवयित्री जीवन में रिश्तों के महत्त्व को रेखांकित करती हुई कहतीं है कि यदि हम पूँजी निर्माण में लीन रहें तो हमारे रिश्तों को कौन सँभालेगा? आज के समय में जिस चीज़ का सबसे अधिक क्षरण हो रहा है—वह हमारे आत्मीय, सामाजिक, पारिवारिक और प्रकृति से सहजीवी—सम्बन्ध है। पैसे की अंधी दौड़ में मनुष्य सभी कुछ खोता जा रहा है या नष्ट करता जा रहा है। कवयित्री का यह आर्त्तनाद भी है और सोये और भटके हुए समाज की जागृति हेतु शंखनाद भी है।
ताँका 66: कौन समझा? / ज़िन्दगी की कहानी / किसने जानी / बातें सब बेमानी / सच रब ने जानी। इस रचना से कवयित्री का दार्शनिक स्वरूप पाठक के समक्ष उद्घाटित होता है। जीवन एक पहेली है और कब क्या होना है किसे पता है? लेकिन यह सूत्र वाक्य हमें निरंतर सद्कर्म करने और सतत क्रियाशील बने रहने का आवाहन करता है।
ताँका 67: कोहरा छँटा / सूरज जाग गया / धूप से मिला / मंद-मंद मुस्कान / बुझी मन की प्यास। में कवयित्री बढ़ते असंतोष, आतंक, अन्याय रूपी निराशा कोहरे के छँटने और आशा की सुखद धूप का फैलाव देखना चाहती है।
सेदोका 5: जानते सब / अर्थ का चमत्कार / न करते इंकार / अर्थ ही प्राण / अर्थ ही भगवान / मान चाहे न मान। में बढ़ते भौतिकवाद और अर्थ के प्रभाव के प्रति चिंता व्यक्त करती हुई कवयित्री कहती हैं कि इस प्रवृत्ति की समाप्ति अथवा कमी निकट भविष्य में उन्हें दिखाई नहीं देती तो वहीं सेदोका संख्या 6: रौंद ही डाली / भारतीय संस्कृति / पाश्चात्य सभ्यता ने / कैसे बचेगी / स्नेहिल सद्भावना / भ्रमित युवा पीढ़ी। में वे युवा पीढ़ी में बढ़ते पाश्चात्य प्रभाव के प्रति पीड़ा व्यक्त करती हैं।
सेदोका 7: मन में वास / ढूँढ़ता क्यों बाहर / अंतर्मन में झाँक / मिलेगा वहीं / पहचान पाओगे / बुद्ध बन जाओगे। में कवयित्री कहना चाहती है कि कामनाओं और वासनाओं से उत्पन्न अशांति के शमन और विश्रांति की खोज के लिए बाहर भटकने की आवश्यकता नहीं, अपितु इसे स्थिर चित्त और अंतर्मुखी होकर ही प्राप्त किया जा सकता है। यही बुद्ध का मार्ग है जो उन्होंने पीड़ित मानवता के कल्याण के लिये दिखाया ।
इस संग्रह में 422+157+92+72 = 743 बहुत ही सुंदर हाइकु, “ताँका’ और ‘सेदोका’ जापानी विधाओं के वर्णिक छंद उनके द्वारा सृजित हुए। इनके निर्धारित छंद-विधान का डॉ. रमा द्विवेदी ने बड़ी तन्मयता और कुशलता से निर्वाह किया है। ये सभी छंद छोटे होने के कारण बहुत प्रभावी और सहज रूप से ग्राह्य भी हैं। इस संग्रह में उन्होंने जीवन के विभिन्न रंगों को उकेरा है, सामाजिक सरोकारों को रेखांकित किया है और सांस्कृतिक और धार्मिकता को उद्घाटित किया है। पाठक इस संग्रह के माध्यम से उनकी दार्शनिक-दृष्टि से भी परिचित हो जाता है। संग्रह की भाषा सरल होने के कारण सभी रचनाएँ पूर्णतया संप्रेषित हो रहीं हैं। काव्य विधान की दृष्टि से भी ‘गंगा में तैरते मिट्टी के दीये’ संग्रह गंगा की भाँति निर्मल और दोषमुक्त हैं। इस दृष्टि से ‘गंगा में तैरते मिट्टी के दीये’ संग्रह मुझे बहुत भाया और मैं इसे पढ़ने की सिफ़ारिश करता हूँ। आशा है हिंदी साहित्य जगत डॉ. रमा द्विवेदी की कृति ‘गंगा में तैरते मिट्टी के दीये’ संग्रह का खुले मन से स्वागत करेगा। अंत में इस संग्रह के प्रकाशन के अवसर पर कवयित्री डॉ. रमा द्विवेदी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।
रामकिशोर उपाध्याय
द्वारका, नई दिल्ली-78