देह का व्याकरण
डॉ. नेहा गौड़
हल्दी की गंध, मेहँदी का वो सुर्ख़ गाढ़ा रंग,
ढोलक की थाप और शहनाई की
उस चीखती तान के बीच—
वह विदा हुई, मानो किसी ‘बलि’ का उत्सव हो।
घर की चौखट लाँघी, तो पाँव तले की ज़मीन बदल गई,
बाप की ‘दुलारी‘—
ससुराल की दहलीज़ पर महज़ एक ‘अमानत’ बन गई।
वहाँ स्वागत में खुली बाँहें नहीं थीं,
बल्कि ‘संस्कारों’ का नक़ाब ओढ़े
सैकड़ों नज़रें उसे ऐसे नोंच रही थीं,
जैसे किसी मुर्दाघर के बाहर गिद्धों का पहरा हो।
सास, ननद और तजुर्बे की चाशनी में डूबी—
‘महारानी’ बुआ-मामियों ने मिलकर
उसके वुजूद का बड़ी नफ़ासत से ‘पोस्टमार्टम’ किया।
किसी ने घूँघट की लंबाई से
उसकी मर्यादा का ‘नक्शा’ खींचा,
तो किसी ने रोटियों के गोल आकार में
उसके ख़ानदान की ‘कुलीनता’ तलाशी।
जब उसकी ज़ुबान पत्थर हो गई,
तो सबने मुस्कुराकर दस्तख़त कर दिए—
“देखो! ख़ामोश आत्मसमर्पण ही तो स्त्री की असली सहमति है।”
बीतते वक़्त के साथ,
वह घर का वो सीलन भरा कोना बन गई,
जहाँ उजाला भी दाख़िल होते हुए
शर्मिंदगी महसूस करता था।
वह बन गई उस घर की वो ‘पुरानी दराज़‘,
जिसमें ख़ानदान भर का
अतिरिक्त अवसाद और क्रोध ठूँस दिया जाता था।
तन कुचला गया, पसलियाँ चटकीं,
देह की मख़मली त्वचा पर
नीले निशानों के नए ‘भूगोल’ उभर आए।
वह हर शाम बाज़ार की धूल और
दफ़्तर की कुंठा समेटकर घर लौटता,
और अपनी नाकामियों की ‘मरम्मत’
उसकी अधमरी देह पर चोट करके करता।
वह न नशा करता था, न कोई व्यसन,
चरित्र उसका ‘दूध सा धुला’ था,
तभी तो महल्ला रश्क से कहता—
“ऐसा भागवान पति तो नसीब से मिलता है!”
झुकती रीढ़, वक़्त से पहले ढलती देह
और आँखों के गड्ढों में जमती मौत—
सब उस ‘मर्दानगी’ के गवाह थे,
जो थप्पड़ों से अपनी सत्ता लिखती थी।
राह चलते लोग उसे ‘बूढ़ी’ कहने लगे थे,
पर देख न सका कोई
उस झुर्रियों वाली खाल के नीचे—
अपनी ही अर्थी का बोझ ढोती एक रूह को।
उस ‘अनपढ़’ कही जाने वाली स्त्री ने,
जीवन की सबसे क्रूर पाठशाला में,
‘क, र, ब, स’ का वह ख़ौफ़नाक व्याकरण कंठस्थ कर लिया था:
‘क’ से कुलटा, ‘र’ से रं . . . ड, ‘ब’ से बहू नहीं—‘बाँझ‘,
और ‘स’ से उन साज़िशों का साम्राज्य,
जो उसे हर पल निगल रहा था।
वह समझ गई थी कि यहाँ ‘प’ से प्रेम नहीं,‘पाप’ होता है,
और उसने वह ‘पाप’ किया है—
इस समाज में स्त्री होकर पैदा होने का।