अंबेडकरवादी ग़ज़लों के स्वरूप निर्धारण की आख़िरी ग़ज़लशाला ‘बग़ैर मक़्ता’ पर संपन्न

01-02-2026

अंबेडकरवादी ग़ज़लों के स्वरूप निर्धारण की आख़िरी ग़ज़लशाला ‘बग़ैर मक़्ता’ पर संपन्न

लोकेश कुमार (अंक: 293, फरवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

नव दलित लेखक संघ, दिल्ली ने 28 दिसंबर 2025 को डॉ. अमित धर्मसिंह के ग़ज़ल संग्रह ‘बग़ैर मक़्ता’ पर ऑनलाइन परिचर्चा गोष्ठी आयोजित की। यह नदलेस की बारहवीं और अंतिम ग़ज़लशाला थी। इसकी अध्यक्षता आर.पी. सोनकर ने की एवं संचालन लोकेश कुमार ने किया। गोष्ठी में इंद्रजीत सुकुमार, अरुण कुमार पासवान और मामचंद सागर बतौर मुख्य वक्ता रहे। विशेष टिप्पणीकार के रूप में बग़ैर मक़्ता की भूमिका लिखने वाले तेजपाल सिंह ‘तेज’, के अलावा राजपाल सिंह ‘राजा’ और पुष्पा विवेक रहीं। लेखकीय अभिमत एवं ग़ज़लपाठ हेतु डॉ. अमित धर्मसिंह उपस्थित रहे। साथ ही, बग़ैर मक़्ता के प्रकाशन में अहम भूमिका अदा करने वाली डॉ. गीता कृष्णांगी उपस्थित रहीं। इनके अलावा गोष्ठी में पवन धीमान, ममता अंबेडकर, डी.एल. धांधव, बी.एल. तोंदवाल, जीवंत नीलकंठ, बंशीधर नाहरवाल, अंगद कुमार, भूरी सिंह, मदनलाल राज़, ओमप्रकाश गौतम, ज्ञानेंद्र सिद्धार्थ, राधेश्याम कांसोटिया, बिजेंद्र पाल सिंह, डॉ. कुसुम वियोगी, ज़ालिम प्रसाद, डी.बी. सिंह, एदल सिंह, खगेन्द्रमोहन पाण्डल, डॉ. हरकेश कुमार, जोगेंद्र सिंह, अर्का समानता, श्याम लाल राही, पदम प्रतीक, एस.ऐन. प्रसाद, डॉ. रवि प्रकाश, गौतम रावत, हरपाल सिंह, भजन सिंह, बृजपाल सहज, चितरंजन गोप लुकाठी, गौतम प्रकाश, नीरज कुमार नेचुरल, आज़ाद सिंह शहरावत, अनित कुमार, कुँवर नाज़ुक और रूप सिंह ‘रूप’ आदि सहित देश-भर से सैकड़ों गणमान्य साहित्यकार उपस्थित रहे। गोष्ठी में सर्वप्रथम संचालक लोकेश कुमार ने डॉ. अमित धर्मसिंह का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया और उनकी दर्जनों साहित्यिक पुस्तकों का उल्लेख किया। उसके बाद, क्रमशः मामचंद सागर, इंद्रजीत सुकुमार और अरुण कुमार पासवान ने बग़ैर मक़्ता पर अपने-अपने वक्तव्य दिए। राजपाल सिंह ‘राजा’, पुष्पा विवेक और तेजपाल सिंह ‘तेज’ ने अपनी-अपनी सारगर्भित टिप्पणियाँ प्रस्तुत की। डॉ. अमित धर्मसिंह ने लेखकीय अभिमत रखते हुए तहत और तरन्नुम से एक-एक ग़ज़ल प्रस्तुत की। तत्पश्चात् आर.पी. सोनकर का अध्यक्षीय उद्बोधन हुआ। सभी उपस्थित वक्ताओं, टिप्पणीकारों और साहित्यकारों का धन्यवाद ज्ञापन मदनलाल राज़ ने किया। 

ज्ञात हो कि अक्टूबर 2024 में अंबेडकरवादी ग़ज़लों के स्वरूप निर्धारण के लिए डॉ. अमित धर्मसिंह के प्रस्ताव पर, नदलेस की चौथी कार्यकारिणी जिसके अध्यक्ष बंशीधर नाहरवाल रहे, उनकी अध्यक्षता और डॉ. अमित धर्मसिंह के पूर्ण निर्देशन में यह ग़ज़लशाला शुरू की गई थी। चौथी कार्यकारिणी के एक वर्षीय कार्यकाल में सात ग़ज़लशाला और पाँचवीं कार्यकारिणी जिसके वर्तमान अध्यक्ष डॉ. अमित धर्मसिंह हैं, के अभी तक के अध्यक्षीय काल में पाँच ग़ज़लशालाएँ आयोजित हुईं। इस तरह कुल बारह ग़ज़लशालाएँ आयोजित हुईं। ये ग़ज़लशालाएँ तेजपाल सिंह ‘तेज’ कृत ‘कौन दिशा में उड़े चिरै’या, रूप सिंह ‘रूप’ कृत ‘हालात ए हाजिरा’, राजेंद्र कुमार राज़ कृत ‘उम्मीदों की किरण तुम्हारे लिए’, डॉ. रामगोपाल भारतीय की ‘प्रतिनिधि ग़ज़लें’, रामश्रेष्ठ दीवाना कृत ‘आदमी के वेष में आदमखोर को देखा है’, डॉ. रामावतार मेघवाल की ‘प्रतिनिधि ग़ज़लें’, कुँवर नाज़ुक कृत ‘कंवारे सजदे’, डी.एल. धांधव कृत ‘जाएँ तो जाएँ कहां’, श्यामलाल राही कृत ‘धनक’, राम सनेही विनय कृत ‘ठहरे हुए पानी में’, मराठी ग़ज़लकार प्रमोद कुमार वालके कृत मराठी ग़ज़ल संग्रह ‘प्रश्नांची गझल’ और डॉ. अमित धर्मसिंह कृत ‘बग़ैर मक़्ता’ ग़ज़ल संग्रहों पर परिचर्चा गोष्ठियों के रूप में आयोजित हुईं। परिचर्चाओं के माध्यम से तमाम ग़ज़ल संग्रहों पर भाव, भाषा, कथ्य, विचार, शिल्प आदि के दृष्टिकोण से विस्तृत विचार-विमर्श किया गया और ग़ज़लों में अंबेडकरवादी विचारधारा के तत्त्वों की तलाश की गई। ग़ज़ल के शिल्प में बहुत अधिक छेड़छाड़ न करते हुए भाव, कथ्य, उद्देश्य, संदेश और विचार आदि को आधार मानकर अंबेडकरवादी ग़ज़लों की पहचान की गई। पूरी ग़ज़लशाला में पूर्णरूप से तो कोई ग़ज़ल संग्रह पूर्णतः अंबेडकरवादी नहीं पाया गया लेकिन ग़ज़लों के कहन में अंबेडकरवादी विचार काफ़ी मात्रा में परिलक्षित हुए। इन्हीं में अंबेडकरवादी ग़ज़लों के पर्याप्त तत्त्व भी मौजूद मिले। इन्हीं के माध्यम से डॉ. अमित धर्मसिंह के संपादन में शीघ्र ही अंबेडकरवादी ग़ज़लों का एक साझा संकलन तैयार किया जाएगा जो निश्चित ही दलित समाज के अंबेडकरवादी ग़ज़लकारों का मार्ग प्रशस्त करेगा। 

‘बग़ैर मक़्ता’ ग़ज़ल संग्रह भी इसका अपवाद नहीं। इसमें संकलित कुल एक सौ पचपन ग़ज़लों में, जहाँ 70 ग़ज़लें प्रेम के उदात्त स्वरूप पर हैं, वहीं क़रीब 85 ग़ज़लें दलित जीवन के अभाव, वेदना, त्रासदी, संघर्ष, समाजार्थिक स्थिति, सरोकार और अंबेडकरवादी समतामूलक विचार में पली-पगी हैं। संग्रह में सभी ग़ज़लें कालक्रमानुसार रखी गईं हैं, इस कारण संग्रह में अमित धर्मसिंह की रचनाधर्मिता और ग़ज़ल दोनों का विकास-क्रम स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। इस ग़ज़ल संग्रह की एक बड़ी विशेषता इसके शीर्षक में दिखाई पड़ती है। यद्यपि बहुत से शायरों ने बग़ैर मक़्ता भी ग़ज़लें कही हैं लेकिन इससे पूर्व इस शीर्षक से किसी भी शायर का क़लाम देखने में नहीं आता है। यह सर्वथा पहला घोषित और प्रकाशित नवीन प्रयोग है। इस संग्रह ने एक तरफ़ ग़ज़लों में मक़्ता की अनिवार्यता को दस्तावेज़ी तौर से नगण्य बना दिया है। दूसरी तरफ़ इसने ग़ज़लों को पाठकों से जोड़ने का बेजोड़ कार्य किया है। यानी, मक़्ता न लिखकर ग़ज़लकार अपने नाम का आग्रह छोड़ते हुए, ग़ज़ल और पाठक के बीच से निकल गया है। बग़ैर मक़्ता के अर्थ को इस तरह भी समझा जा सकता है कि जिस तरह जीवन, विचार और साहित्य-सृजन का कोई अंत नहीं होता, उसी तरह ग़ज़ल की रवायत का भी कोई अंत नहीं होता और न ही ग़ज़ल की परंपरा, सृजन, ज़मीन, मज़मून, बहर, वज़्न, नवीन प्रयोग यहाँ तक कि अशआर की संख्या तक का भी कोई अंत नहीं होता। इसके और भी कई सार्थक अर्थ निकाले जा सकते हैं जो इस शीर्षक के औचित्य और महत्त्व को दर्शाते हैं। बहरहाल, बग़ैर मक़्ता का उक्त अर्थ, बग़ैर मक़्ता ग़ज़ल संग्रह को और अधिक व्यापक और सार्वभौमिक बना देते हैं, जिस कारण बग़ैर मक़्ता की ग़ज़लें न सिर्फ़ डॉ अमित धर्मसिंह की अपितु अलग-अलग संदर्भों में संबंधित पाठक और समाज की अपनी थाती बन जाती हैं। 

लगभग यही बात तमाम वक्ताओं और टिप्पणीकारों के विचारों में उभरकर सामने आयी। मामचंद सागर ने ग़ज़ल में अपनी कोई पकड़ न होने को स्वीकारते हुए कहा कि “मेरी ग़ज़लों में कुछ पकड़ नहीं बावजूद इसके मुझे बग़ैर मक़्ता की ग़ज़लें बहुत पसंद आई हैं। इन ग़ज़लों में एक युवा मन की बेचैनी, संघर्ष, उदात्त प्रेम और ज़िन्दगी के विविध अनुभव उभरकर सामने आए हैं। सभी ग़ज़लें बहुत क़रीने और ग़ज़ल की शैली में बड़े असरकारक तरीक़े से लिखी गई हैं। ग़ज़लों को पढ़कर लगता है लेखक इन ग़ज़लों में दर्ज अनुभव से सीधे तौर से जुड़ा है और यह बात इन ग़ज़लों को और भी बड़ा बनाती है। इनमें शृंगार का उदात्त स्वरूप विद्यमान है। इसे आप एक ग़ज़ल के इस एक शेर से परख सकते हैं कि ‘आंखों को उसके ख़्वाब दिखाते चले गए। इकतरफ़ा उससे प्यार निभाते चले गए।” इसके अलावा भी मामचंद सागर ने बहुत सी ग़ज़लों के उदाहरण देकर अपनी बातें स्पष्ट की। 

इंद्रजीत सुकुमार ने कहा कि “बग़ैर मक़्ता में एक से बढ़कर एक, कुल एक सौ पचपन ग़ज़लें हैं। सभी ग़ज़लें अलग-अलग ढंग से प्रभावित करती हैं। लगभग सारी ग़ज़लें ऐसी हैं, जिन्हें आप गुनगुना सकते हैं। कुछ ही ग़ज़लों के पद क्रम में कुछ बदलाव करने की ज़रूरत महसूस होती है। बावजूद इसके इसकी कोई भी ग़ज़ल, ग़ज़ल के मयार का अतिक्रमण नहीं करती है। इनमें ज़िंदगी के इतने गहरे अहसास दर्ज हुए हैं कि जो सहज ही हमारी प्रेरणा और मार्गदर्शक बनकर उभरते हैं। ‘ज़िन्दगी मुझसे जवाब माँगे है। बीते पल-पल का हिसाब माँगे है’, ‘दर्द को भूलकर मुस्कुरा लीजिए। ज़ख्म जितने हैं दिल के छुपा लीजिए।’ आदि सभी ग़ज़लें इसी प्रकार की ग़ज़लें हैं।” उन्होंने इसके अलावा भी कई ग़ज़लें गुनगुनाकर ग़ज़लों की तह में पहुँचने और उपस्थित श्रोताओं को पहुँचाने की सार्थक कोशिश की। 

अरुण कुमार पासवान ने अपनी बात रखते हुए कहा कि “एक बात जो मैं अमित जी के विषय में पहले भी कहता रहा हूँ, वो ही बात मुझे बग़ैर मक़्ता की ग़ज़लें पढ़ने के बाद महसूस हुई। और वो बात ये है कि अमित जी को जब हम सामने से देखते हैं तब ऐसा नहीं लगता कि वे इतने परिपक्व चेतना और विचार के कवि हैं लेकिन जब हम इन्हें सुनते हैं और इनकी कविताएँ, ग़ज़लें आदि पढ़ते हैं तो ये हमें अपनी उम्र से बहुत आगे दिखाई देते हैं। और यही बात इस ग़ज़ल संग्रह की ग़ज़लों को पढ़कर भी निःसंकोच कही जा सकती है। वे इन ग़ज़लों में जिस मनोदशा, लोक और समाज का उद्घाटन करते हैं, वह हैरत में डाल देने वाला है। इनकी ग़ज़लें न सिर्फ़ ग़ज़ल की विधा के रूप बल्कि अपने कथ्य, अनुभव और अन्य सभी स्तर से प्रभावित करती हैं। ऐसी अनेक ग़ज़लें हैं जिनमें अमित जी बड़े ही साधारण तरीक़े से बहुत बड़ी-बड़ी बात कह जाते हैं। जैसे इस संग्रह में एक ग़ज़ल का एक शेर है कि ‘काफ़ी हो चुके बसर हम मात-पिता के सहारे। अब कांधे वज़न उनका ढोने को जी चाहता है।” ये ख़्यालात एक युवा के गहरे दायित्वबोध से भर जाने की कहानी कहते हैं। ऐसे और भी बहुत से शेर हैं जो आपको गहरे तक सोचने पर विवश कर देते हैं।” उन्होंने विविध ग़ज़लों के विविध शेरों के माध्यम से इसके यथोचित उदाहरण भी प्रस्तुत किए। 

इनके अलावा, राजपाल सिंह ‘राजा’, पुष्पा विवेक, लोकेश कुमार, तेजपाल सिंह ‘तेज’ ने भी बग़ैर मक़्ता और ग़ज़लकार अमित धर्मसिंह से संबंधित सारगर्भित टिप्पणियाँ प्रस्तुत की। 

लेखकीय अभिमत रखते हुए डॉ. अमित धर्मसिंह ने कहा कि “बग़ैर मक़्ता में मेरी अर्ली एज की ग़ज़लें संकलित की गई हैं। इसे संकलित करने में डॉ. गीता कृष्णांगी की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। उसी के कारण ये ग़ज़लें संग्रह के रूप में आप तक पहुँच सकी हैं। बहरहाल, मेरी लिखने की शुरूआत फ़िल्मी गीतों और तुक्कड़ कविताओं से हुई। इन्हीं के बीच में दो हज़ार एक और दो के दौरान, न जाने कैसे दो तीन रचनाएँ ग़ज़ल जैसी भी आ फँसी। बाद में एक विज्ञापन, जिसमें ग़ज़ल लेखक, म्यूजिशियन, मॉडल आदि को आमंत्रित किया गया था, ने तो मुझे प्रतिबद्धता के साथ ग़ज़ल लेखन से जोड़ दिया। अपने शहर मुजफ्फरनगर की साहित्यिक संस्थाओं और शायरों की संगत तथा निदा फाजली, दुष्यंत कुमार जैसे शायरों को अध्ययन से तो जैसे ग़ज़ल निखर और दमक उठी। उसी का परिणाम आज इस ग़ज़ल संग्रह बग़ैर मक़्ता के रूप में आपके हाथों में हैं।” ग़ज़ल की विधा की बेसिकी पर बोलते हुए उन्होंने कहा “ग़ज़ल ही नहीं हमें दूसरी विधाओं पर भी पर्याप्त ध्यान देने की ज़रूरत है ताकि हमारे लिखे को ख़ारिज करने का मुख्य धारा के लेखकों के पास, कोई कारण न रह सके।” उन्होंने दो ग़ज़लें क्रमशः ‘गिर जाने के बाद से फिर चलने की तैयारी है। क्या हुआ जो ज़िन्दगी में क़दम-क़दम दुश्वारी है।’ को तहत से और ‘एक साथ हम कितने जीवन जीते हैं। वक़्त से पहले इसीलिए तो रीते हैं।’ को तरन्नुम से सुनाकर उपस्थित श्रोताओं को अक्षुण्ण रूप से प्रभावित किया। अध्यक्षीय उद्बोधन में आर.पी. सोनकर ने ‘आगे कोई राह नहीं है। फिर भी कुछ परवाह नहीं है।’, ’बेवफ़ा महलों में रहकर कुछ दिनों/याद उसको मेरा छप्पर आ गया।’ आदि ग़ज़लों की ग़ज़लों की विविध बहरों के माध्यम से तकती प्रस्तुत करते हुए अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि अमित धर्मसिंह एक मंजे हुए शायर हैं। शायर के बारे में जैसा कि कहा जाता है कि यदि उसने इश्क़ नहीं किया तो वो अच्छा शायर हो ही नहीं सकता है। इन ग़ज़लों को पढ़ने से ज्ञात होता है कि जनाब अमित धर्मसिंह भी एक अच्छे इश्क़ करने वाले और ग़ज़ल को बख़ूबी समझने वाले हैं। तभी तो वे इन ग़ज़लों में दोनों ही भूमिका में खरे उतरते हैं। इन ग़ज़लों में मक़्ता न अपनाकर अमित धर्मसिंह ने इन ग़ज़लों को और भी बड़ा बना दिया है इसीलिए इस महत्त्वपूर्ण ग़ज़ल संग्रह 'बग़ैर मक़्ता' के लिए अमित जी को मैं हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ देता हूँ। निश्चित ही, यह ग़ज़ल संग्रह, दूसरे ग़ज़ल लिखने वालों के लिए एक बड़ी प्रेरणा साबित होगा।” 

अंत में मदनलाल राज़ ने अपनी सारगर्भित टिप्पणी रखते हुए सभी उपस्थित वक्ताओं, टिप्पणीकारों और साहित्यकारों का धन्यवाद ज्ञापन किया और कहा कि “अमित धर्मसिंह नदलेस में एक अभिभावक की तरह हैं। वे सभी को समान रूप से साथ लेकर चल रहे हैं। उनके प्रस्ताव और निर्देशन में लगभग डेढ़ वर्ष पूर्व आरम्भ हुई ग़ज़लशाला, जो कि अंबेडकरवादी ग़ज़लों के लिए एक प्रयोगशाला की तरह रही, आज बेहद सफलतापूर्वक तरीक़े से संपन्न हो गई है। जल्दी ही इसके और अधिक सार्थक व रचनात्मक परिणाम देखने को मिलेंगे।” 

लोकेश कुमार
सचिव नदलेस, दिल्ली। 
29/12/2025

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