यादों के दरीचों से

05-09-2017

यादों के दरीचों से

अर्जित पाण्डेय

एक हसीन ख़्वाब
काग़ज़ की तरह मोड़कर
दिल के कमरे में बने
यादों के दरीचे पर मैंने
रख दिया है
धूमिल न हो जाए वो पन्ना
इसलिए अक्सर उसे अपने
आँसुओं से धोता हूँ
उस ख़्वाब को सजाने में
वक़्त की कितनी सीमाएँ लाँघी हमने,
ये सोचता हूँ
उस पन्ने पर अपने ख़्वाब मैं
और लिखना चाहता था
पर ज़माने की पैदा की हुई ठण्ड ने
मेरी लेखनी की स्याही को जमा डाला
मैं बेबस लाचार अब उस ख़्वाब को
लिख नहीं सकता
पर जब वक़्त के झोंकों से
वो पन्ना
यादों के दरीचे से हिलता है
तो मैं उस लिखे हुए ख़्वाब को पढ़ लेता हूँ

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