विश्व हिंदी शिक्षण - 1 (ब्रिटेन व डेनमार्क) हिंदी पाठ्यक्रम की चुनौतियाँ

12-07-2020

विश्व हिंदी शिक्षण - 1 (ब्रिटेन व डेनमार्क) हिंदी पाठ्यक्रम की चुनौतियाँ

अमिषा अनेजा

वैश्विक हिन्दी परिवार
विश्व हिंदी शिक्षण -१  

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हिंदी पाठ्यक्रम और चुनौतियाँ

 

वैश्विक हिंदी परिवार द्वारा २६ जून, २०२० को उपरोक्त विषय पर एक वेबिनार (गोष्ठी)का आयोजन किया गया जिसमें श्रीमती अरुणा अजितसरिया -एमबीई, डॉ. पद्मेश गुप्ता -ऑक्स्फ़ोर्ड बिज़नेस स्कूल, सुश्री सुरेखा चोपला - अध्यक्ष यूके हिंदी समिति, सुश्री अर्चना पेन्यूली- प्रवासी साहित्यकार व शिक्षक(डेनमार्क) ने भागीदारी की। इसका संचालन डॉ. संध्या सिंह (सिंगापुर) एवं विषय प्रस्तावना डॉ. शैलजा सक्सेना (कनाडा) ने किया। 

कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए डॉ. संध्या सिंह ने सभी वक्ताओं का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया। ‘वैश्विक हिंदी परिवार ‘ के आयोजनो का लक्ष्य स्पष्ट करते हुए कहा कि ये मंच हिंदी साहित्य, तकनीकी, भाषा विमर्श और शिक्षण की दिशा में कार्यरत है। और उसी कड़ी में यह पहला आयोजन है । भारत और विदेशों में जहां जहां हिंदी शिक्षण का कार्य हो रहा है इस मंच के द्वारा उन अध्यापकों को जोड़ने का प्रयास है। । पाठ्यक्रम, संसाधन, विचार, तकनीकी में जो कार्य हो चुका है, उसका समन्वयन करते हुए आगे के लिए कार्य योजना बनाई जाए। 

डॉ. शैलजा सक्सेना ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि वैश्विक हिंदी परिवार के सामने जो पहला प्रश्न है वह है, कि हिंदी अगली पीढ़ी तक कैसे पहुँचे? यूनिवर्सिटी में पढ़ाई जाने वाली हिंदी का तो निर्धारित पाठ्यक्रम है परंतु बड़ी समस्या community teaching या सामुदायिक शिक्षण की है। १९९४ में अपने एक शोध (study) का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि स्वर्गीय सुषम बेदी के साथ उनके इस विषय पर संवाद हुए। व्यक्तिगत रूप से ब्रिटेन, हयुस्टन, और फिर कनाडा में मंदिर और आर्य समाज के माध्यम से हिंदी पठन पाठन में जो दिक़्क़तें आयी उनमें निश्चित पाठ्यक्रम व सामग्री की कमी मुख्य थी। 

बच्चों में हिंदी के प्रति रुचि जगाना और जगा कर रखना दूसरी कठिनाई थी और बोलने की हिंदी उनको सिखाना, जो नयी पीढ़ी के हैं या अहिंदी भाषी हैं, भी एक चुनौती है। 

एक-स्तरीय पाठ्यक्रम इसका एक आयाम है -एक ‘go to portal ‘की ज़रूरत है जिससे हिंदी पढ़ाने वाले को सामग्री और पाठ्यक्रम एक जगह मिले और रुचि को बढ़ाया जा सके। 

शैलजा जी ने कहा कि सामग्री संकलन व सामग्री निर्माण इस परियोजना का मुख्य लक्ष्य है। इसी संदर्भ में विजय कुमार मल्होत्रा जी ने केंद्रीय हिंदी संस्थान में प्रो. जगन्नाथन की अध्यक्षता में बनायी गयी एक पुस्तक का भी ज़िक्र किया। 

डॉ.पद्मेश गुप्ता जी ने कहा कि सुरेखा जी के प्रेज़ेण्टेशन (presentation) में उनके भी विचार शामिल हैं। कुछ बुनियादी बातों का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि ब्रिटेन में सांस्कृतिक केंद्रों (cultural centres) में, मंदिरों में, और विश्वविद्यालयओं में जो हिंदी है वो अलग-अलग हैं। ब्रिटेन में विश्विद्यालय में हिंदी का काम शोधपरक है और इनमें विद्यार्थी कम रहते हैं। सामुदायिक शिक्षण (community teaching) में संख्या ज़्यादा है। यूके हिंदी समिति के तत्तवावधान में कई संस्थाएँ एकत्रित हुई हैं। सामान्य पाठ्यक्रम वैश्विक स्तर पर लगभग नामुमकिन है क्यूँकि ब्रिटेन या अन्य देशों के विद्यार्थी द्वितीय भाषा के रूप में हिंदी पढ़ते हैं और उनका पाठ्यक्रम अलग होता है। (ब्रिटेन में मोहला जी ने एक कार्यक्रम बनाया जो सभी केन्द्रों ने अपनाया) सामान्य पाठ्यक्रम सब के लिए अनुकूल नहीं है। आवश्यकताएँ अलग हो जाती हैं, लक्षित प्रतिभागी (target audience) अलग हो जाते है। रूस में सिनेमा का आकर्षण था तो सिनेमा के माध्यम से पढ़ाया जाता रहा है। 

ऑक्स्फ़र्ड(Oxford) आदि विश्विद्यालय आम तौर पर पाठ्यक्रम सम्बन्धी सिर्फ़ कुछ दिशा निर्देश (guidelines) देते हैं। ऐसे ही दिशा निर्देश की आवश्यकता हिंदी को भी है। ऑनलाइन टीचिंग को ले कर भी हिंदी में दिक़्क़त आयी है। उन्होंने कहा कि वैश्विक हिंदी के बारे में सोचते हुए राष्ट्र और धर्म से ऊपर उठ कर सोचना ज़रूरी है। 

डॉ. पद्मेश जी के कथन के बाद सुरेखा चोपला जी ने पाठ्यक्रम की चुनौतियों की बात करते हुए ब्रिटेन में अपनी शिक्षा पाठन यात्रा का ज़िक्र किया। १९९४ से अपने बच्चों को सिखाने के प्रयास से उन्होंने इसकी शुरुआत की। पाठ्यक्रम के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि यहाँ IB,और केम्ब्रिज की IGCSE लेवल की परीक्षा होती है लेकिन सिंगापुर, मौरिशस, फ़िजी या दक्षिण भारत के विद्यार्थी ही ज़्यादातर ये परीक्षा दे पाते है। ब्रिटेन के विद्यार्थी ये परीक्षा कम ही देते हैं, लगभग न के बराबर। यहाँ योरोपीय भाषाओं के लिए जो स्तर है, ये उससे कुछ ज़्यादा है। उन्होंने बताया कि GCSE का स्तर देख कर पाठ्यक्रम निर्धारित करने की बात महत्वपूर्ण लगी । उन्होंने कहा कि ब्रिटेन में GCSE की हिंदी परीक्षा नहीं है क्यूँकि यहाँ विद्यार्थी काफ़ी कम हैं। इस स्थिति में सुधार लाने की कोशिश हो रही है। उन्होंने बताया कि अब परीक्षाओं को GCSE लेवल के अनुरूप बनाने और प्रमाणित करने की कोशिश की जा रही है। विद्यार्थी शामिल हो रहे है और अब सर्टिफ़िकट्स लेकर जा रहे हैं। अनौपचारिक रूप से उन प्रमाण पत्रों को यूनिवर्सिटी से मान्यता भी मिल रही है। 

उन्होंने इस बात पर ज़ोर देते हूँ कहा कि केवल स्वर-व्यंजन ही नहीं शब्दावली भी सिखानी चाहिए। वहाँ की रिसेप्शन क्लास (reception क्लास) के लिए जूनियर लेवल रखा गया है । इस में स्वर व्यंजन के साथ सामान्य शब्द जैसे नाम-फलों के, वस्तुओं के, घर के अंदर-बाहर के सौ, दो-सौ शब्द सिखाए जाते हैं। 

ब्रिटेन की बात करते हुए उन्होंने बताया की यूके में ६ लेवल या स्तर हैं -

लेवल१- मात्राओं का ज्ञान और रीडिंग का प्रयास। विद्यार्थियों को चित्रों से समझाना ताकि उनका शब्दावली ज्ञान बढ़े और उसका अर्थ वह समझ सकें। IB, GSCE के भाषाओं के पठन पाठन में अनुवाद के आधार को प्रोत्साहित नहीं किया जाता। परीक्षा भी इसी आधार पर ली जाती है। 

लेवल२- ये GCSE का लेवल है। इसके अंतर्गत अच्छे से बात करनी सिखायी जाती है । कुछ थीम्ज़ कवर की जाती हैं जैसे, इन्वायरोन्मेंट , लाइफ़स्टाइल, एंटर्टेन्मेंट आदि। परीक्षा श्रवण, मौखिक और लिखित ३ प्रकार से ली जाती है। 

लेवल ३- तक प्रश्न पत्र में निर्देश अंग्रेज़ी में रहते हैं। 

लेवल ४- निर्देश हिंदी में में दिए जाते हैं। 

इसके बाद उन्होंने सीधे ५-६ लेवल की बात की। उन्होंने बताया कि लेवल ५-६ यहाँ के A लेवल्ज़ तक ले जाते हैं। मुहावरे,संधि, संस्मरण, कविता कहानी पढ़ने की क्षमता उत्पन्न हो सके और छात्र टिप्पणी भी कर सकें। 

देवनागरी लिपि की समस्या का उल्लेख करते हुए कि देवनागरी में अडल्ट विद्यार्थी पढ़ना नहीं चाहते। इसलिए उच्चारण दोष भी रहते हैं। लेकिन उन्हें सुधारने का प्रयास भी निरंतर किया जा रहा है। उन्होंने ये भी बताया कि ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड का भी पाठ्यक्रम लगभग हमारे जैसा ही है। पाठ्यक्रम बनाया जा सकता है लेकिन विद्यार्थियों को ६-७ वर्ष तक हिंदी से जोड़े रखना एक चुनौती है। यूके, स्विट्ज़रलैंड और आयरलैंड में यही पाठ्यक्रम चलता है। 

उन्होंने अपनी बात एक प्रेज़ेनटेशन के साथ समाप्त की जिसमें अनेक प्रकार की रोचक गतिविधियों, चित्रों, प्रतियोगिताओं, संभाषण, स्टडी ट्रिप, ट्रेज़र हंट, आदि गतिविधियों द्वारा हिंदी शिक्षण के कार्य को सम्पन्न किया जा रहा है। 

डेनमार्क से अर्चना पेन्यूली ने अपने वक्तृत्व का आरम्भ करते हुए कहा कि उन्हें आज का ये मंच सार्थक मंच लग रहा है। डेनमार्क बहुत छोटा सा देश है। इतनी बड़ी जनसंख्या द्वारा बोली जाने के कारण हिंदी की महत्ता को यहाँ स्वीकार किया जाता है। हिंदी भारत का चेहरा है। सामाजिक आर्थिक, डिजिटल,सांस्कृतिक कई परिदृश्य हैं किंतु उन्होंने कहा कि आज के विषय को देखते हुए वे केवल शैक्षिक परिदृश्य की बात ही करेंगी।उन्होंने एक ए.वी. के माध्यम से अपने विचार साझा किए। 

उन्होंने बताया कि पहला स्तर अनौपचारिक हिंदी पाठन का है जो टूरिस्ट प्रोग्राम, व्यापार आदि के लिए हिंदी पढ़ने वालों हैं। यह कोर्स ६ सप्ताह का होता है। तीस कक्षाओं का ‘Fine language learner‘ कोर्स काफ़ी महँगा है जिसकी क़ीमत लगभग डेढ़ लाख रुपये है और अध्ययन सामग्री के लिए अलग से धन राशि ली जाती है। विदेशी स्टूडेंट्स बहुत बड़ी संख्या में इसके बारे में अपनी जिज्ञासाएँ भेजते हैं और वे हिंदी सीखना चाहते हैं। अपनी सहयोगी स्मिता का भी उन्होंने ज़िक्र किया जो उनके साथ स्कूल में हिंदी पढ़ा रही हैं। 

उन्होंने बताया कि NCERT की पुस्तकें पोस्टर और पॉवर पोईंट, बाल डॉक्युमेंटरीज़ को पढ़ने का आधार बनाया जाता है। विद्यार्थियों को अपने बारे में, परिवार, मित्रों के बारे में बताने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। भारतीय संस्कृति की जानकारी के लिए मंदिर, संग्रहालय आदि ले कर जाते हैं। 

यहाँ सभी विद्यार्थी दक्षिण भारतीय हैं। यह एक चुनौती भी है। सप्ताह में ४५ मिनट का एक लेक्चर होता है। उन्होंने यहाँ कहा कि वह एक संदर्भ में शैलजा जी की बात से असहमत भी हैं । हिंदी बोलना ही काफ़ी नहीं उसमें साक्षर भी होना ज़रूरी है। नॉर्थ इंडियन बच्चों को भी इस कार्यक्र्म में शामिल करना उनका लक्ष्य है - यह बच्चे भी हिंदी क्लब जोईन करें तब और अधिक इंटरैक्टिव सेशन होगा। इसके लिए वो बहुत से प्रयास कर रही हैं। 

उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय स्तर पर विवेक शुक्ला एवं एलमार रेनर हिंदी पढ़ाते हैं । यह गौरव की बात है है कि यहाँ के दो प्रमुख विश्वविद्यालयों - कोपेनहेगेन व आरहूस में हिंदी के ऐक्टिव/ सक्रिय विभाग हैं। 

डॉ. विवेक शुक्ला की ओर से उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय स्तर पर हिंदी पाठ्यक्रम व गतिविधियाँ इस प्रकार हैं। वे हिंदी इन ३ आधारों पर पढ़ाते हैं -

१-मौखिक प्रवीणता
२-पाठ विश्लेषण व 
३-हिंदी अनुवाद। 

हिंदी शिक्षण प्रविधि के अंतर्गत उन्होंने बताया कि प्रत्येक सेमेस्टर में १३ कोर्स होते हैं और तीन वर्ष के बी. ए. प्रोग्राम में ६ सेमेस्टर होते हैं।

आरम्भिक व्याकरण के साथ भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक,आर्थिक, राजनीतिक परिप्रेक्ष्य के बारे में चर्चा एवं प्रेज़ेटेशन। थीम आधारित, कहानियाँ, डिबेट, वर्कशॉप, नाटक आदि तथा हिंदी लेखकों और प्रोफ़ेसरों से बातचीत की जाती है। फिर साहित्य के क्षेत्र में प्रवेश करते जैन और नए तथा पुराने लेखकों को पढ़ते है। हर वर्ष ६-७ चीज़ें बदल दी जाती है। 

हिंदी पाठ्यक्रम के संसाधनों के रूप में ऑडिओ, विडिओ,संगीत, फ़िल्में, साहित्य, डुओलिंगो (duolingo), प्रमुख नेताओं के भाषण का उपयोग किया जाता है।

थीम आधारित टेक्स्ट रीडिंग जैसे भारत में जाति व्यवस्था, भारत माता की संकल्पना, गे और लेस्बीयन वर्ग की भारत में स्थिति, भारत में स्त्री की स्थिति, हिंदी सिनेमा का रूप आदि। 
अर्चना जी ने एक और हवाला देते हुए कहा कि - डेनिश से हिंदी में व्याकरण की पुस्तक रेनेर ने बनायी है। 

डेनमार्क के साउथ एशीयन स्टडीज़ विभाग में एलिमेंटरी लेवल से ले कर हायर लेवल तक हिंदी पढ़ने का उद्देश्य संस्कृति को जानना है। 

हिंदी प्रचार प्रसार और शिक्षण की समस्याओं को लेकर विवेक शुक्ला जी के हवाले से उन्होंने कहा कि कई सामाजिक समस्यायें भी है जैसे हिंदी के प्रति उदासीनता का भाव, हिंदी पठन पाठन में प्रोत्साहन का अभाव तथा हिंदी का कोई बड़ा बाज़ार ना होना आदि। 

अकादमिक समस्याओं में व्याकरण और उच्चारण सम्बन्धी कठिनाइयाँ हैं, यूरोपीय भाषाओं के व्याकरणों और संरचनाओं से नितांत भिन्नता व पाठ्यक्रम और बुनियादी सुविधाओं का अभाव भी है। मशहूर लेखकों की सरल पुस्तकों का सर्वथा अभाव है।

कुछ सुझाव देते हुए अर्चना जी ने कहा श्रवण कौशल, वाचन कौशल, वार्तालाप कौशल एवं रचना कौशल के शिक्षण की दृष्टि से सामग्री का निर्माण करना होगा। व्यावहारिक ध्वनि संरचना, पदबंध संरचना, शब्द संरचना के अनुप्रयोगात्मक पाठों का निर्माण करना होगा।

कंप्यूटर पर हिंदी प्रयोग को सरल बनना होगा और ऑनलाइन शब्दकोश का निर्माण करना होगा तथा प्रसिद्ध लेखकों की पुस्तकों का यूरोपीय भाषाओं में सरल अनुवाद करना होगा। उन्होंने ये भी कहा कि IB लेवल पर हिंदी है, IGSCE लेवल पर नहीं है। भारतीय दूतावास को इसमें पहल करनी होगी। 

अर्चना जी ने अपनी बात समाप्त करते हुए २०१८ के विश्व हिंदी सम्मेलन में सुषमा स्वराज जी ने ‘निकष‘ नाम की मापदंड परीक्षा का भी उल्लेख किया। साथ ही अर्चना जी ने श्री विवेक शुक्ला और रेमेर को भी इस समुदाय से जोड़ने का अनुरोध किया। 

संध्या जी ने अर्चना जी का धन्यवाद करते हुए अन्य विदेशी शिक्षकों को इस शिक्षण मंच से जोड़ने की बात का स्वागत करते हुए अरुणा जी को अध्यक्षीय भाषण के लिए आमंत्रित किया। 

अरुणा जी ने सभी प्रतिभागियों को बधाई देते हुए उनके काम की सराहना की। उन्होंने कहा कि एक साझा पाठ्यक्रम बनाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि केम्ब्रिज में N लेवल से A लेवल तक, परीक्षा ली जाती है। यह कार्य केम्ब्रिज विश्विद्यालय की अंतर्राष्ट्रीय परीक्षा शाखा द्वारा किया जाता है। आज के सत्र में चुनौतियों और समस्याओं की बात हुई है। अन्य सम्मेलनों में भी यही बात होती है किंतु सक्रियता नहीं होती। उन्होंने अनिल जी के एक महत्वपूर्ण सुझाव का स्वागत करते हुए कहा कि एक छोटी उपसमिति बना कर यह काम संगठित रूप से होना चाहिए। उन्होंने कहा कि ब्रिटेन में IGSCE का पाठ्यक्रम मौजूद है। ये भी कहा कि विश्व के हर देश में लर्निंग अब्जेक्टिव्ज़ (learning objective) तो एक से होते हैं, सिर्फ़ संदर्भ अनुसार वो अलग होते है। 

लर्निंग अब्जेक्टिव के साथ असेस्मेंट अब्जेक्टिव (assessment objective) भी ध्यान में रहने चाहियें, यानि किस स्तर पर मूल्यांकन किया जाए ये भी महत्वपूर्ण है। 

अरुणा जी ने कहा कि हिंदी शिक्षण अच्छी बात है परंतु नयी पीढ़ी को साहित्य से जोड़ना ज़्यादा ज़रूरी है। 

एक उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि उन के सुझाव से ‘आधे -अधूरे‘ को पाठ्यक्रम में रखा गया और परीक्षार्थियों ने उस वर्ष अच्छा लिखा क्यूँकि वे उसकी विषय वस्तु से जुड़ पाए। वर्णमाला सीखने से पहले बोलना आना चाहिए। उसके बाद लिखना पढ़ना आना चाहिए। ३० से ज़्यादा देशों में केम्ब्रिज की यही परीक्षा ली जाती है। उन्होंने कहा कि परीक्षा जाँच में सिंगापुर जैसे शिक्षण केंद्रों में हिंदी का स्तर बहुत अच्छा है  

इस हिंदी शिक्षण का भविष्य क्या हो - इस प्रश्न को उठाते हुए उन्होंने सबके बहुमूल्य विचार आमंत्रित किए। 

श्री अनूप भार्गव जी ने टिप्पणी करते हुए कुछ बातों की ओर ध्यान दिलाया -

१- सामग्री और जानकारी को साझा करने की ज़रूरत है। तुरंत अविलम्ब एक वेबसाइट तैय्यार की जा सकती है और उसको फ़ाइन ट्यून बाद में किया जा सकता है
२-एक टास्क फ़ोर्स की ज़रूरत है तो ऐक्शन को आगे ले जा सके 
३-करिकयुलम(curriculum )की अगर बात कर रहे हैं तो ये भी ज़रूरी कि हम स्टैंडर्डआइज़ेशन ऑफ टीचर्ज़ (standardisation of teachers) की भी बात करें। और टीचर्ज़ के स्टैंडर्डआइज़्ड (standardised) प्रशिक्षण की भी बात ज़रूरी है। 
४- साक्षरता ज़रूरी है लेकिन आत्मविश्वास के लिए बोलना भी ज़रूरी है। हमें विद्यार्थी और अभिभावक की सोच को भी प्राथमिकता देनी चाहिए। 

श्री विजय कुमार मल्होत्रा जी ने कहा कि ई-लर्निंग, ऐडुटेनमेंट ( edutainment) और निकष की चर्चा भी ज़रूरी है। कई देशों में फ़िल्मों के माध्यम से पूर्णतः शिक्षण को जोड़ा गया है। जापान में मिजोकामी ने बहुत काम किया है। रूस में अंत्याक्षरी जैसे खेलों ने भी बहुत काम किया। उन्होंने कहा कि मैं साझा मंच पर ये सभी चीज़ें शेएर करना चाहूँगा। 
श्री नवीन लोहनी जी ने चीन के विश्वविद्यालय के अपने अनुभव रखते हुए कहा कि चीन में विश्वविद्यालय में अंतर-सांस्कृतिक अध्ययन का विषय रखा गया।
इसके अंतर्गत फ़िल्मी संवादों की डबिंग, सीरीयल्ज़ की डबिंग, अनुवाद आदि किया गया। उन्होंने बताया की चीन में १५ विश्वविद्यालयों हिंदी पढ़ाई जा रही है और इन में एक समान पाठ्यक्रम बनाया गया है। शब्दकोश भी बनाए गए हैं। चीनी बच्चों से उन्हीं के खान-पान, परिवेश उनकी रुचियों, उनके पर्व आदि के बारे में हिंदी में कहने और फिर पढ़ने और लिखवाने की कोशिश की जाती है। 

श्री राम भट्टजी ने कुछ बिंदु रखते हुए कहा कि -

१- इंडोलोजी (indology )और साउथ एशियन स्टडीज़ अलग नहीं एक ही हैं। फ़र्क़ इतना भर है की साउथ एशियन स्टडीज़ में वे आधुनिक भाषाएँ पढ़ते हैं और इंडोलोगिकल स्टडीज़ में कलास्सिकी पढ़ाया जाता है। 

२- बहुत से पाठ्यक्रम उपलब्ध हैं। पहली बैठक में यही विचार था की उपलब्ध सामग्री को पहले देखा जाए विचार किया जाए। 

३- तीसरा टेक्नॉलजी एक महत्वपूर्ण विषय के रूप में उभर कर आया है। ऑनलाइन जो सामग्री है उसे देखने की ज़रूरत है। 

४- उन्होंने कहा कि मेरा भी मानना है कि पाठ्यक्रम भूगोल और संस्कृति विशिष्ट होना चाहिए। ये एक बड़ी चुनौती है अध्यापक के सामने। 

श्री अनिल शर्मा जी ने डॉ.पद्मेश जी और दिव्या जी का धन्यवाद करते हुए कहा कि मैंने विदेशों में काम किया है और विदेशों में हिंदी शिक्षण एक महत्वपूर्ण विषय है। आप सब प्रतिभागियों के विचार और सहयोग से हम केंद्रीय हिंदी संस्थान से जुड़ेंगे। ऑनलाइन हिंदी पढ़ने की व्यवस्था ज़रूरी है। ये भी ज़रूरी है कि फ़्रेंच, जर्मन अंग्रेज़ी सभी भाषाओं से जुड़ कर हिंदी शिक्षण की व्यवस्था की जाए। उन्होंने संध्या जी का विशेष आभार व्यक्त किया इस कार्यक्रम संचालन के लिए और उनके उत्साह और ऊर्जा की सराहना की । उन्होंने कहा कि आज का कार्यक्रम एक पहली कड़ी है। साहित्य के अतिरिक्त अन्य विषयों में भी हिंदी शिक्षण होना चाहिए। बाक़ी देश विदेश के शिक्षकों को भी इस मंच से जोड़ना होगा। इन शब्दों के साथ उन्होंने सभी का पुन: धन्यवाद किया। 

चर्चा को आगे बढ़ते हुए शिव जी ने कहा कि हिंदी शिक्षण का एक वैश्विक स्तर नहीं हो सकता। कहीं वह मातृभाषा है, कहीं वह पितृ भाषा है, कहीं वह द्वितीय भाषा है, या विदेशी उसको पढ़ते हैं और इन सब वर्गों के लिए इसे ग्रहण करने का रूप सामान नहीं हो सकता। 

हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए हमें दूसरी भाषा जैसे अंग्रेज़ी की आवश्यकता नहीं है। 

जहाँ जिस देश में हिंदी पढ़ाई जाती है उस देश का संदर्भ लेना अनिवार्य है चाहे यूके हो, पुर्तगाल या जर्मनी या सिंगापुर।

उन्होंने कहा कि एक और चिंता इस मंच पर हिंदी के कम होते ही विद्यार्थियों को लेकर भी व्यक्त की गयी है। संख्या को बढ़ाने या बरकरार रखने का एक तरीक़ा है कि जो संसाधन उपलब्ध किए जाएँ वो उन विदेशी छात्रों की भाषा में ही हों। उन्होंने कहा कि छात्र + शिक्षक+ संदर्भ के हिसाब से संसाधनो में अंतर और विकास की ज़रूरत है। एक समस्या की बात करते हुए उन्होंने कहा कि भारत आकर विदेशी बच्चे हिंदी पढ़ना नहीं चाहते क्यूँकि, क्रेडिट ट्रान्स्फ़र (credit transfer) नहीं मिलते।

यहाँ श्री राम भट्ट जी ने सूचना दी कि हिंदी इंटेन्सिव कोर्स के छात्रों को यूरोप में क्रेडिट मान्यता प्राप्त हैं। 

संध्या जी मौरिशस से श्री गुलशन जी को टिप्पणी और धन्यवाद ज्ञापन के लिए आमंत्रित किया।

श्री गुलशन जी ने कहा कि ये बहुत ही अच्छा प्रयास आरम्भ हुआ है और अनिल जी के नेत्तृत्व में और आगे जाएगा। हिंदी को आज सबसे ज़्यादा ऐसी मेहनत की ही ज़रूरत है।

२०१४ में विश्व हिंदी सचिवालय में कार्यरत होने का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उस अवसर पर प्रवासी देशों में हिंदी शिक्षण पर एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन किया गया और १६-१७ देशों से प्रतिभागियों को बुलाया गया। विडीओ कोनफ़्रेंस से तब भी लोग जुड़े। एक स्मारिका भी तैय्यार की गयी जो आज भी संदर्भ के लिए इस्तेमाल की जा सकती है। उन्होंने कहा कि सवाल ये है कि क्या हिंदी का एक वैश्विक पाठ्यक्रम हो सकता है? इस बारे में मतभेद है किंतु उन्होंने ने कहा कि इस बात का अरुणा जी ने बहुत अच्छा उत्तर दिया है। गुलशन जी ने कहा कि इस क्षेत्र में इतने वेरीयब्ल्स (variables) हैं और उनका कोई एक फ़ॉर्म्युला नहीं हो सकता। हाँ अगर हम ये ध्यान में रख कर चलें कि हम कितने वेरीयब्ल्स को ले कर चलेंगे तो शायद एक फ़ॉर्म्युला बन सकता है। आगे बात करते हूँ उन्होंने कहा कि अगर हम लर्निंग आउटकमज़ अप्रोच (learning outcomes approach) के स्तर पर बात करें तो हम वैश्विक स्तर पर एक पाठ्यक्रम तो नहीं, लेकिन एक एडापटेबल कर्रीकुलम (adaptable curriculum) अवश्य बना सकते हैं जहाँ कथ्य, विधि, शोध परिवर्धनीय और स्थानीय हों। उन्होंने एक महत्वपूर्ण बिंदु रखते हुए कहा कि केम्ब्रिज वाली स्थिति सिंगापुर, यूके जैसे देशों में फ़िट बैठ जाती है लेकिन दक्षिण अफ़्रीका, सूरीनाम आदि में सरकारी सहायता उपलब्ध नहीं। स्वैच्छिक संस्थाएँ सरकारी शिक्षण व्यवस्था में प्रवेश नहीं कर पाती हैं। उन देशों के लिए अलग से पाठ्यक्रम अगर चला सकें तो इन देशों में बहुत सहायता होगी। इसके लिए प्रामाणिक क्रेडिट व्यवस्था (credible modular credit) पर काम करने की आवश्यकता है। और कुछ संस्थाएँ मिल कर उसे मान्यता (recognition) भी दें। उन्होंने कहा कि अभी सूचना प्राप्त हुई की वैश्विक हिंदी परिवार को विश्व हिंदी सचिवालय का भी औपचारिक रूप से समर्थन प्राप्त होगा। महात्मा गांधी जैसे संस्थान (मौरिशस) और अन्य संस्थान अगर मिलकर ऐसा कर्रीकुलम बनायें और उसे मान्यता दें कि हमारे छात्र अगर दूसरे देश में जाएँ तो उनके क्रेडिट स्वीकार हो सकें। सूरीनाम गुयाना, दक्षिण अफ़्रीका आदि में होने वाली बैठिकाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि, उस मेहनत को भी मान्यता मिलनी चाहिए। अपनी बात को समाप्त करते हुए उन्होंने कहा इन नयी जानकारियों के साथ जब इस मंच से इन सभी देशों के लोग जुड़ेंगे तो ये मुहिम आगे बढ़ेगी और हमारा मार्ग और गंतव्य निश्चित होगा। 

डॉ. संध्या ने इस परिचर्चा का समापन करते हुए सभी प्रतिभागियों को धन्यवाद दिया और अनिल शर्मा जी को केंद्रीय हिंदी संस्थान का उपाध्यक्ष नियुक्त होने पर सबकी ओर से बधाई दी। संध्या जी ने कहा कि अलग अलग देशों से आगे के कार्यक्रमों में और जानकारी ली जाएगी और सरकारी संरक्षण की उम्मीद भी अब की जा सकती है। 

अमिषा अनेजा।
प्रवक्ता, लेडी श्रीराम कॉलेज। 

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