विदेश में होली

उमेश ताम्बी

खरबूजा काट मृदंग 
बनाया नींबू काट मंजीरा 
मत्तीरा काट रंग बनाया 
जैसे ऊँट के मुँह जीरा 

ना गुजिया है, ना कचोरी, ना 
मठरी, ना खट्ठी-मिट्ठी गोली है 
डोनट-केक, रिवोली 
बनते व्यंजन हुए पहेली हैं 

वृन्दावन की कुञ्ज गली
 में धुलेंडी और होली है 
सात समंदर पार न 
गोपी और न कोई सहेली है 

ना रंग, नहीं है रोली, 
ना मस्तानों की टोली है 
ना ठंडाई मिले और न 
हरे रंग की गोली है 

वैलेंटाइन हेलोवीन ही 
यहाँ बने हमजोली है 
फागुन के आते आते 
आपने हमारी आँखे खोली है

दे दिया दिलासा दिल को...
कि आज यहाँ होली है..
बुरा ना मानो होली है!!

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