तुम्हारी हँसी 
जैसे खेतों की मेड़ों पर पानी की छुल-छुल 
तुम्हारी बोली 
नदियों की धरा जो बहती है कल-कल 
तुम्हारा चेहरा 
जैसे ओस की बूँदे हों घास पर चक-मक 
तुम्हारा ग़ुस्सा 
बारिश की बूँदों का छत से हो टप-टप 
तुम्हारा व्यवहार 
पानी की छिड़कन से कलियों का खिल-खिल 
तुम्हारा प्यार 
जैसे संगम में नदियों की धारा की हिल-मिल 
तुम्हारी तक़रार 
नाविक के चप्पू का जल में छपाक 
तुम हो 
बालू पर बहती हुई लहरों सी साफ़।

0 Comments

Leave a Comment