कोरोना काल की इस संकट घड़ी में यदि भूख से कोई अधीर हो रहा है तो वो है मज़दूर। पहाड़ों को तोड़कर, ज़मीन की काटकर रास्ता बनाने वाला, कल-कारखानों में पसीना बहा पैसा कमाने वाला।

सोशल मीडिया के इस दौर में कुछ एक लोगों ने इन मज़दूरों की भूख पर चिंता व्यक्त  की।

फिर क्या था समाज के कुछ एक धनिक वर्ग, सामाजिक कार्यकर्ताओं व विभिन्न दलों से जुड़े नेताओं में इनकी बेबसी का तमाशा बनाने की होड़-सी मच गई। तब शुरू हुआ इनकी मदद करने का दिखावटी सिलसिला।

इसी क्रम में ईटानगर के प्रतिष्ठित साहूकार गुरन बसर की कोठी में समाज के कुछ प्रतिष्ठित लोगों की बैठक रखी गई जिसमें ग़रीब, बेघर मज़दूरों की सहायता कैसे की जाए पर चर्चा की जा रही थी। पास ही एक टेबल पर मज़दूरों को बाँटने के लिए राशन का समान रखा हुआ था।

कोठी के बाहर ही चौखट के किनारे पालथी मार गुरन बसर के यहाँ काम करने वाला एक माली, जिसे इस संकट की घड़ी में  काम में आने से मना कर दिया गया था, बैठे हुए ईश्वर तुल्य मालिक से मिलने के लिए अधीर था। शायद कुछ मदद की आस से आया हो। उसके पिचके गाल, करुणा से भरी आँखें ही उसका सारा हाल कह रही थीं।

बैठक समाप्त हुई , मालिक की नज़र  माली पर पड़ी तो डाँटते हुए  तीख़े लहज़े में कहा कि क्या तुम मुझे मरवाओगे, घर पर आराम करो, मालूम है न कोरोना वायरस फैला है, मुझे बहुत काम है। मालिक की डाँट सुन कर वह मूक हो कहीं और काम की तलाश में निकल गया। 

अगली सुबह शहर में चर्चा थी... गुरन बसर ने एक हज़ार गरीब मज़दूरों को अन्न, राशन बाँटा। संकट की घड़ी में भगवान बन असहायों की सहायता की।
लेकिन माली को इन ख़बरों से क्या?

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