सुनहरी धूप

08-11-2016

सुनहरी धूप

अतुल चंद्रा

अब तुम नहीं हो
कहीं चली गयी हो
जैसे सर्दियों में
वक़्त रहते ही 
कहीं चली जाती है 
सुनहरी धूप।
और जम गया है
तुम्हारी यादों का कुहरा घना
की दूर तक कुछ दिखाई नहीं देता
तुम्हारे सिवा।

 

ज़रूरत है तुम्हारी
धूप जैसी ही
पर अब आगे तो स्याह रात है
सर्द
तुम्हारे मिज़ाज़ जैसी
और मैं इस ख़याल में हूँ
की फिर सुबह होगी
गुनगुनी धूप वाली
गरमाहट आएगी
हवाओं में
रिश्तों में
कि तुम आ जाओगी
यूँ ही कहीं से।

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