सुनहरा बचपन

01-10-2020

सुनहरा बचपन

मोनिका सिंह

लौटा दो मुझे वो बचपन
जहाँ ख़ुशियों के मायने
बन्द गुलक में खनकती चिल्लर हुआ करती थी।
बचपन,
जहाँ 
मैं सिर्फ़ मैं थी,
ना कोई तहज़ीब, न बंदिशों की जकड़न हुआ करती थी।
बचपन 
जहाँ
बस्ते में पड़ी किताबों के बोझ से 
काँधे झुकें लेकिन,
चेहरे पर मुस्कान टिका करती थी।
बचपन
जहाँ, अमीरी के पैमाने, 
जेब मे पड़े कंचों की आवाज़ हुआ करती थी।
बचपन 
जहाँ, खुल कर हँसने और रोने पर 
औरों की सोच की नुमाईश ना हुआ करती थी।
बस, 
वही कूदता, फाँदता, उछलता बचपन 
लौटा दो, लौट दो।

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में