सिक्किम की यात्रा - 2

01-02-2020

सिक्किम की यात्रा - 2

डॉ. मनीष गोहिल

ऊँचे पहाड़ पर,
पेड़ नहीं लगते,
पौधे नहीं उगते,
न घास ही जमती है।
जमती है सिर्फ बर्फ़,
जो, कफ़न की तरह सफ़ेद और,
मौत की तरह ठंडी होती है।
खेलती, खिलखिलाती नदी,
जिसका रूप धारण कर,
अपने भाग्य पर बूँद–बूँद रोती है।
ऐसी ऊँचाई,
जिसका परस
पानी को पत्थर कर दे,
ऐसी ऊँचाई
जिसका दरस हीन भाव भर दे,
अभिनंदन की अधिकारी है,
आरोहियों के लिये आमंत्रण है,
किन्तु कोई गौरैया,
वहाँ नीड़ नहीं बना सकती,
ना कोई थका–माँदा बटोही,
उसकी छाँव में पलभर पलक ही झपका सकता है।
सच्चाई यह है कि
केवल ऊँचाई ही काफ़ी नहीं होती,
सबसे अलग-थलग,
परिवेश से पृथक,
अपनों से कटा–बँटा,
शून्य में अकेला खड़ा होना,
पहाड़ की महानता नहीं,
मजबूरी है।

- अटल बिहारी बाजपेयी

जब भी पहाड़ों पर घूमने को मिला तब से यही महसूस हो रहा था कि पहाड़ एक मौन स्तम्भ के रूप में एक टक निहारते पूरे लोक को दृश्यमान हो रहे हैं, पर स्वयम् की पीड़ा का कभी बयान नहीं करते। कवि अटलजी की पंक्तियाँ पहाड़ की ऊँचाईयों को उनकी भाग्यहीनता के साथ जोड़कर मनुष्य को अपनी औक़ात में रहने की बात करती हैं।

बात में जो वास्तव दर्शन है, उतना ही वास्तव दर्शन यह भी है कि पहाड़ अपने नैसर्गिक सौंदर्य के कारण सबको अपनी ओर सहज आकर्षित करते हैं। मुझे पहाड़ का सौंदर्य हरपल आकर्षित करता रहा हैं। शायद यही एक वज़ह है कि मैं अभी तक ज़्यादातर पहाड़ों पर ही भ्रमण करता रहा हूँ। मैं ने सिक्किम की यात्रा के प्रथम भाग में गेंगटोक और नाथुला पास का वर्णन किया है। इस भाग में सिक्किम के अन्य देखने लायक़ भाग की बात करने जा रहा हूँ।

दूसरे दिन हम जा रहे थे लाचुंग और वहाँ से आगे का सफ़र था वेली ऑफ़ फ़्लावर्स - यूमथांग वेली। उसी रास्ते में ऊँचाई पर ज़ीरो प्वाइण्ट भी आता है। मैनेजर के याद करवा देने पर मैं सुबह जल्दी तैयार होकर होटल के रिसेप्शन काउण्टर पर आ गया था। अब मैं एक दिन पश्चात् वापिस आने वाला था। सो हमारे सामान को होटल के क्लॉक रूम में रखने का इंतज़ाम कर दिया गया था। गेंगटोक में सबसे बड़ी समस्या गाड़ियों के पार्किंग की है। सो हम लोगों को सूचना दी गयी थी कि आप समय पर होटल की लाउन्ज में आ जाएँ, गर समय पर नहीं आएँगे तो आपकी कार निकल जाएगी। बाद में कुछ भी नहीं हो पाएगा। मैं तो वैसे भी समय का पक्का पाबन्द हूँ। मेरे पंक्च्युऐलिटी स्वभाव की वज़ह से मुझे कई बार कई स्थान पर दु:खी भी होना पड़ा है। पर मैं मेरी इस अच्छी आदत को कभी नहीं छोड़ सकता। अत: मैं निश्चित समय से पहले होटल के पोर्च में आ गया था। मैनेजर से पूछने पर पता चला कि लाचुंग जाने के लिए परमिट बनवाना पड़ता है और इस समय टूरिस्ट सीज़न चल रहा था, सो परमिट निकलवाने में देर लग जाती है। अभी हम गेंगटोक में ही थे। सुबह के क़रीबन दस बज गए थे। कार के लिए हमें गेंगटोक में बने प्राइवेट गाड़ियों के लिए बनाये गए पार्किंग तक जाना था। जो हमारी होटल से काफ़ी दूरी पर था। हम लोकल टैक्सी में वहाँ तक गए। यहाँ से हमें एक कार दी गयी। अब हम लाचुंग जाने के लिए तैयार थे। जब हम गेंगटोक से निकले तब घड़ी में बारह बज चुके थे। लाचुंग गेंगटोक से 125 किमी की दूरी पर है।

मुझे फ़िल्मी गीत कि पंक्तियाँ याद आ रही थी। 'परबतों से आज मैं टकरा गया, तुमने दी आवाज़ लो मैं आ गया।' पुन: परबतों की यात्रा शुरू हो गयी। यहाँ का रास्ता चौड़ा नहीं था तथा कई जगह टूटा हुआ आ रहा था। मेरी कार का ड्राइवर एक उत्साही युवा था। बहुत ही भला, बातूनी और निर्दोष। मैं उसके पास ही बैठा था, सो रास्ते भर सारी जानकारियाँ लेता रहता था। इस रास्ते में मज़ा इस बात का था कि यहाँ रास्ते-भर अनेकों झरने आनेवाले थे। चोरों ओर तथा पहाड़ियों पर दूर सुदूर हरियाली छाई हुई विद्यमान हो रही थी। इस इलाक़े में बारिश का बार-बार गिरना स्वाभाविक था। जैसे-जैसे हमारी कार ऊँचाई पर चढ़ रही थी, हवा तेज़ और ठंडी हो रही थी। मैं इतने सुंदर तथा आह्लादक वातावरण के आग़ोश में बँधता जा रहा था कि लगता था, जैसे बस समय को बाँधकर वहीं ठहर जाऊँ। चारों ओर पहाड़ियाँ ही पहाड़ियाँ और बीच में सर्पाकार रास्तों पर छोटी–छोटी टूरिस्ट गाड़ियाँ खिलौनों की तरह दौड़ रहीं थीं। एक अद्भूत नज़ारा था। कितने सारे पैड़–पौधे, कितने प्रकार की वनस्पतियाँ, कितने सारे इलायची के खेत। दूर–दूर तक नज़र आ रहे थे। एक जगह कार को रुकवा कर इलायची के खेत को नज़दीक से देखा। ड्राइवर इतना अच्छा था कि अलभ्य वस्तुओं की जानकारी भी देता रहता था। वह मात्र ड्राइवर नहीं था, हमारा गाइड भी था। हर झरने पर हमारी कार रुक जाती थी। ड्राइवर आराम से फोटो लेने तथा झरनों के पानी का आनंद लेने के लिए कहकर कार को आराम भी दे देता था।

इस रास्ते क़रीबन नौ–दस छोटे–बड़े झरने आये। उसमें एक झरने का नाम अमिताभ बच्चन भी था। कार के ड्राइवर से पूछा कि इस झरने का नाम बच्चन क्यों? उसने बताया कि यह झरना सबसे लंबा है, काफ़ी ऊँचाई से गिरता है। इसलिए हम लोग टूरिस्ट को इस फ़ॉल को बच्चन वाटर फ़ॉल कहकर परिचय करवाते हैं। वाक़ई में जब हम वहाँ पहुँचे तो देखा तो वह वाटर फ़ॉल काफ़ी ऊँचाई से नीचे गिर रहा था, भरपूर पानी के साथ। मैंने बच्चन वाटर फ़ॉल के काफ़ी फोटो लीं। इस रास्ते का मज़ा ही यह है कि आपको थोड़ी–थाड़ी देर में रुकना है कोई न कोई झरने को देखने के लिए और हर झरना अपनी ख़ास विशेषता तथा इतिहास लिए हुए है। सही है सिक्किम को क़ुदरत ने बहुत सारी नैसर्गिक सुंदरता दी है। मेरा मन तो, जब से कार पहाड़ियाँ चढ़ रही थी तब से नाच ही रहा था। आज मौसम भी ख़ुशनुमा था, बीच-बीच में बारिश भी हो जाती थी। रास्ते में आनेवाले छोट–छोटे गाँव भी पहाड़ी सुंदरता में चार चाँद लगा रहे थे। कई स्थान पर लहराती हुई ढेरों सारी सफ़ेद पताकाएँ बाँस के लम्बे खंभों पर फरफराती दीखती रहतीं थीं इन लहराती हुई ध्वजाओं की भी अपनी विशेषता थी। इसका कारण मुझे ड्राइवर से पता चला कि (हमारे) यहाँ जब किसी बौद्ध घर के किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, तब उसकी याद में सफ़ेद पताकाएँ लगायी जातीं हैं। जिससे और लोगों को पता चलता है कि उस घर, परिवार में किसी का देहांत हुआ है। इसी प्रकार कई जगह रंग-बिरंगी ध्वजाएँ भी लहराती नज़र आ रही थीं। उसकी जानकारी में ज्ञात हुआ कि किसी के घर शुभ प्रसंग या कोई मन्नत पूरी हुई हो तो उसकी ख़ुशी में रंग-बिरंगी ध्वजाएँ फहरायी जाती हैं। सफ़ेद और रंगीन ध्वजाएँ पूरे पहाड़ी सौंदर्य को ओर अधिक सुंदर कर रही थी। सिक्किम में ज़्यादातर लोग बौद्ध है। दूसरी महत्व की बात यह भी देखने को मिली कि रास्ते में जब भी कोई गाँव आता तो, वहाँ पर रास्ते में पेड़ या खम्भों पर लकड़ी या पतले बाँस की छोटी–छोटी टोकरियाँ टँगी नज़र आतीं। ज्ञात हुआ कि ये टोकरियाँ डस्टबिन के रूप में लगायी गयी थीं। क्या बात... स्वच्छता का इतना सुंदर आयोजन। दिल बाग़-बाग़ हो गया। ड्राइवर ने ही बताया कि देश में जो स्वच्छता अभियान चलाया गया है, उसका श्रेय सिक्किम सरकार को जाता है। जब प्रधानमंत्री गुजरात के सीएम थे, तब गेंगटोक आए थे। उस समय उन्होंने इस प्रदेश की स्वच्छता को लेकर चलायी जानेवाली मुहिम को देखा था, प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने इस मुहिम को पूरे देश के साथ जोड़ दिया। सच्चाई जो भी हो पर बात में दम तो था। इतनी अच्छी मुहिम का श्रेय सिक्किम को जाता है, इसमें कोई दो राय नहीं। बाद में मेरा ध्यान गया कि वहाँ का कोई नागरिक कूड़ा–कचरा सड़क–रास्ते पर नहीं डालता था। निश्चित स्थान पर लगाए गए कूड़ेदान में ही डालता था।

शाम क़रीबन सात बजे हम लाचुंग पहुँच गए। अँधेरा हो चुका था। वैसे भी पूरब में जल्दी ही सूरज ढल जाता है। कार से बाहर निकलने पर एहसास हुआ कि ठण्ड ज़्यादा थी। ड्राइवर ने पहले से बता दिया था कि लाचुंग में ठण्ड लगेगी। अँधेरे में चारों ओर के माहौल का पता नहीं चल रहा था। पर जिस तरह से साँय साँय करती हवा चल रही थी, लग रहा था कि नज़दीक में ही बर्फ़ के पहाड़ हो सकते हैं। जानकारी तो थी ही कि लाचुंग काफ़ी ऊँचाई पर है। समुद्र तल से 8600 फ़ीट (लगभग 3200 मीटर की ऊँचाई) पर बसा एक माउण्टेन विलेज है। यह तिब्बती सीमा के पास है। जो लाचुंग और लाचेन नामक नदी के संगम पर बसा है। रास्ते में एक स्थान पर हमारे ड्राइवर ने कार को रोक कर लाचेन नदी के अलभ्य सौंदर्य को दिखाया था। पहाड़ियों के बीच रास्ता बनाती ऊँची खाइयों में से निकलती नदी के ऊपर हम खड़े हों ऐसा लग रहा था। दूर–सुदूर नदी सर्पाकार में पतली रेखा में इधर–उधर दौड़ती दिख रही थी। उस नदी पर बाँध भी बनाया गया है। लाचुंग में उन्नीसवीं शताब्दी की बुद्धिस्ट मोनस्टरी भी है। लाचुंग उत्तरी सिक्किम में स्थित है। लाचुंग सिक्किम के सुंदरतम गाँवों में गिना जाता है। ऊँचाई पर ठण्ड तो बारहमासी होती है। लेकिन बर्फ़ गिरी हो तो यहाँ कि सुन्दरता को नया ही आयाम मिल जाता है। इसीलिए लोग यहाँ सर्दी के मौसम में भी ख़ूब आते हैं। प्राकृतिक सुन्दरता के अतिरिक्त सिक्किम की विशेष बात यह भी है कि बर्फ़ गिरने पर भी उत्तर का यह क्षेत्र सुगम रहता है। बर्फ़ से ढकी चोटियाँ, झरने और चाँदी सी झिलमिलाती नदियाँ यहाँ आने वाले पर्यटकों को स्तब्ध कर देती हैं।

लाचुंग आने से पहले हमें सूचित कर दिया गया था कि यहाँ पर प्लास्टिक पर प्रतिबंध है, पीने के पानी की बोतल भी पास में नहीं रखनी है। अगर पानी की प्लास्टिक की बोतल यात्री के पास से मिलेगी तो 5000 रुपये का ज़ुर्माना होगा। सिक्किम सरकार ने लाचुंग को सम्पूर्ण 'ओर्गेनिक वीलेज' के रूप में प्रस्तुत किया था। यहाँ पर बाहर की कोई भी खाने–पीने की चीज़ लाना मना है। पानी, हवा शतप्रतिशत शुद्ध है। क़ुदरती वातावरण का अलभ्य नज़ारा इस इलाक़े को आशीर्वाद के रूप में प्राप्त है। कार के ड्राइवर ने भी लाचुंग आने से पूर्व ही हमें फिर से सूचित कर दिया कि अगर आपके पास पीने के पानी की बोतलें हैं, तो कृपया उसे फेंक देवें। अन्यथा आप को ज़ुर्माना हो सकता है। मुझे तो यह बात बहुत ही अच्छी लगी। लाचुंग में चारों ओर मिनरल पानी ही है। पहाड़ियों में से झरने के रूप में आता ही रहता है। ढेर सारी जड़ी-बुटियों के साथ, फिर कृत्रिम मिनरल वाटर की क्या ज़रूरत? अहमदाबाद में तो ज़्यादातर घरों में आर.ओ. मिनरल पानी के प्लांट लगे हैं। ये प्लांट पानी को इतना शुद्ध कर देता है कि जो मिनरल्स शरीर के लिए उपयोगी होते हैं, वो भी प्यूरीफ़ाइ होकर निकल जाते हैं। परिणाम स्वरूप शरीर में बी12 की कमी हो जाती है। व्यक्ति को एक नई बीमारी लग जाती है और यह सही है कि आजकल शहरों में लोगों को बी12 नामक बीमारी काफ़ी मात्रा में होने लगी है। मैं तो जब से सिक्किम आया था मिनरल बोतल के पानी को छूआ तक नहीं था। बिन्दास नल के पानी को ही पी रहा था। मुझे बी12 की पूर्ती करनी जो थी। होटल में भी कोई पानी की बोतल नहीं दिख रही थी।

रात को पीने का पानी भी गर्म करके दिया गया था। इससे अंदाज़ा लगा तो लिया था कि रात अतिशय ठंडी होने वाली है और सही भी था। यहाँ पर रात में तापमान माइनस डिग्री में चला जाता है। पूरी रात कमरे के बाहर कोई नहीं निकला। पर मैं तो एसे वातावरण का क़ायल हूँ, सो जल्दी ही उठकर तैयार होकर उजाला होने से पहले ही कमरे से निकलकर बाहर आ गया था। बाहर सन्नाटा–सा था। दूर-दूर तक अँधेरा ही अँधेरा था, दूर होटलों में लगे छोटे-छोटे बिजली के बल्ब की मद्धम रोशनी अपने आसपास के माहौल को जबरन प्रकाशित कर रही थी। सड़क साफ़ नज़र नहीं आ रही थी। स्ट्रीट लाइट का भी यही हाल था। खम्भों पर लगे बिजली के बल्ब भी ठंड में जैसे सिकुड़-से गए हों ऐसा लग रहा था। मैं वापिस अपने कमरे में चला गया, इस प्रतीक्षा में कि जल्द से जल्द खानसामा रसोई में चाय-नाश्ता बनाने लग जाए ताकि मैं इस ठंड में गरमा-गरम चाय की चुस्कियाँ ले सकूँ। आज मुझे चाय की तलब लगी थी। नहीं तो कभी भी मैंने चाय को अपने पर हावी नहीं होने दिया था। पर वातावरण ही कुछ ऐसा था कि चाय का मज़ा लेने के लिए मैं बड़ा बेताब था, क्योंकि ऐसे वातावरण में चाय-चाय न रहकर अमृत बन जाती है।

मेरा अनुमान सही निकला, जब मैं सूर्योदय होने के बाद होटल के कमरे से बाहर आया तो मेरे सामने ही बर्फ़ से लदे पहाड़ दृश्यमान हो रहे थे, दूर से कलकल झरनों की आवाज़ें आ रही थीं। मेरी तो यात्रा की सारी थकान दूर हो गयी। मेरी आँखों के सामने एक नहीं अनेकों पहाड़ दिख रहे थे। पहाड़ों की चोटी पर बर्फ़ जमी हुई थी। बर्फ़ की कुछ कतरन पहाड़ों के नीचे के भाग में भी जमकर बिखरी पड़ी थी। जैसे दूर से लग रहा था कि सफ़ेद लकड़ियाँ इधर-उधर बिखरकर पड़ी हों। मैं हिमगिरी के शिखरों को देखने में मगन हो गया था। कवि प्रसाद की पंक्तियाँ बार-बार ज़हेन में आ रही थी–'हिमगिरी के उतुंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छांह.......'1। होटल के वेटर के चाय के लिए बुलाने पर मेरी तंद्रावस्था टूटी। अब ज़्यादातर लोग नींद से जाग गए थे। रसोई में से बर्तनों की आवाज़ आ रही थी। आख़िरकार हम नाश्ते के लिए डाइनिंग रूम में आ गए थे। नाश्ता करने के बाद हम लोग जा रहे थे–युमथांग वेली तथा ज़ीरो प्वाइण्ट।

युमथांग वेली को वेली ऑफ़ फ़्लावर्स से भी जाना जाता है। दरअसल लाचुंग युमथांग वेली का बेस कैम्प है। यहाँ आपको रात रुककर ही आगे जाना पड़ता है। युमथांग वेली को भारत का स्विटज़रलैण्ड कहा जाता है। युमथांग घाटी लाचुंग से 20 किलोमीटर की दूरी पर है। आज मौसम बड़ा ही ख़ुशनुमा था। सुबह से सूर्य की हल्की पीली किरणें शरीर को सुकून दे रहीं थीं। पूरी रात ठंड में ठिठुरते गुज़री थी। सूर्य की किरणें निकलने से मन बड़ा प्रसन्न हो गया था। वैसे भी ठंड में धूप अच्छी लगती है। यहाँ के मौसम के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता, पलभर में बदल सकता है। अभी धूप है, तो थोड़ी ही देर में कहीं से काले घने बादल आ कर बरसना शुरू कर दें। नसीब अच्छा था कि आज खुला आकाश दिखायी दे रहा था। हमारी कार अब फूलों की घाटी युमथांग वेली की ओर जा रही थी। यहाँ पर रास्ता अच्छा था। खाइयाँ नहीं थी। ज़मीनी रास्ता था। सो मन में कोई चिंता नहीं थी। क्योंकि गेंगटोक से लाचुंग का रास्ता बहुत ही ख़तरनाक था। जैसे–जैसे कार आगे बढ़ रही थी बर्फ़ से लदे पहाड़ नज़दीक आ रहे थे। युमथांग वेली के रोडोडेन्ड्रोन्स चौबीस अलग-अलग प्रजातियों के लिए मशहूर हैं। रोडोडेन्ड्रोन्स के पेड़ों पर मार्च–अप्रैल से कलियाँ लगनी शुरू हो जाती हैं। पर पूरी तरह ये मई के महीने में खिलते हैं और मैं मई के मध्य में ही यहाँ पर था, सो मुझे जो देखना था वो देखने को मिल गया। जैसे-जैसे मेरी कार आगे बढ़ रही थी वैसे-वैसे रोड के दोनों और जामुनी रंग के छोटे-छोटे फूल दृश्यमान होने लगे थे। लग रहा था जैसे सारा रास्ता जामुनी रंग के फूलों से अटा पड़ा हो।

सामने बर्फ़ के सफ़ेद पहाड़ मुझे ताक रहे थे और मैं उन्हें देख रहा था। अक्सर होता यह है कि पहाड़ कुछ कहते रहते हैं, बस उनके मौन को पहचानना आ जाना चाहिए। ज़िन्दगी में सकारात्मकता के संदेश देते हैं, यह पहाड़। क्यों पर्वतारोहक पहाड़ों की ओर आकर्षित होते रहते हैं? और दुर्गम से अति दुर्गम शिखरों को सर करने के लिए जान की बाज़ी लगा देते हैं? ख़यालों में गुम मैं रास्ते को अपनी आँखों में भर रहा था। कार की खिड़की के ग्लास को खोल दिया था और मंद-मंद चल रही ठंडी हवाओं को चेहरे पर ले रहा था। सुकून सा मिल रहा था। तपती गरमी में से ठंडे प्रदेश में आया था, स्वाभाविक था कि इसका लुत्फ़ उठाता रहूँ। एक सुंदर सी जगह पर कार को रोक दिया गया, फोटोग्राफ्स के लिए। स्थान इतना सुंदर था कि चारों ओर बर्फ़ की पहाड़ियाँ और बीच में थोड़ा सा मैदानी इलाक़ा। जहाँ पर ढेर सारे रंगबिरंगे फूलों के पेड़–पौधे। धूप सुनहरी बनकर फैल रही थी। कहीं पर जामुनी रंग के फूल तो कहीं पर मैरून, तो कहीं पर लाइट पिंक, कहीं पर सफ़ेद। वेली ऑफ़ फ़्लावर्स इसे ही कहते हैं - यहीं था युमथांग। यहाँ पर ज़्यादातर बुरांश और गुलाब के फूल दिख रहे थे। बुरांश के जंगली फूल हमें अपनी ओर आकर्षित कर रहे थे। इस फूलों की घाटी में बुरांश के 24 प्रकार के फूल हैं। युमथंग घाटी उत्तरी सिक्किम ज़िले में समुद्र तल से 13,575 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। यह गेंगटोक से 148 किमी की दूरी पर है।

आगे का सफ़र था ज़ीरो प्वाइण्ट। मेरी कार जैसे–जैसे आगे बढ़ रही थी, वैसे–वैसे फूलों से लदे पेड़ की गिरफ़्त में हम आ रहे थे। रास्ते के दोनों ओर अलग–अलग फूलों से भरे पड़े पेड़–पौधे दिखायी देने लगे। मन बाग़-बाग़ हो गया। जैसे जन्नत में आ पहुँचे हों ऐसा लगता था। ऐसे दृश्य फ़िल्मों में या इण्टरनेट पर देखे थे। आज इनके बीच था। यहाँ से हटने की मेरी तनिक भी इच्छा नहीं थी। पर समय बड़ा बलवान है और समय के हम गुलाम हैं ऐसा मानकर ड्राइवर के कार में बैठने के आदेश को मानना ही पड़ा। क्योंकि हमें और ऊँचाई पर जाना था। ड्राइवर की चिंता वाजिब थी कि जितना जल्दी ज़ीरो प्वाइण्ट जाएँगे उतना ही आराम से उस स्थान का आनंद उठा सकेंगे और ट्रैफ़िक जाम से बच पाएँगे।

आगे का सफ़र था ज़ीरो प्वाइण्ट। जिसे युम सामडोंग भी कहा जाता है यह समुद्रतल से क़रीबन 15,300 फ़ीट की ऊँचाई पर स्थित है। मुझे ज्ञात था कि ज़ीरो प्वाइण्ट पर बर्फ़ मिलेगी। उसी का असर रास्ते में धीरे–धीरे होने लगा था। ठंडी हवाएँ शुरू हो चुकी थीं। वैसे भी पूरा इलाक़ा ठंडा ही है, पर अब ठंड की मात्रा में बढ़ोत्तरी हो रही थी। मज़ा उस बात का रहता है कि जैसे-जैसे आप ऊँचाई पर जाते हो वैसे-वैसे लगने लगता है कि हम कोई ऊँची पहाड़ी की चोटी पर पहुँचनेवाले न हों.....सामने सफ़ेद रूई - से बर्फ़ के पहाड़ विद्यमान हो रहे थे। मेरे लिए यह नज़ारा अब नया नहीं है। क्योंकि लेह लद्दाख में इनका भरपूर आनंद लिया है। अभी उसी की याद आ रही थी। लग रहा था कि स्वर्ग की ओर जा रहे हैं। यह स्थान भारत चीन की सरहद पर स्थित है। युमथांग से क़रीबन तेईस किलोमीटर की दूरी पर है - ज़ीरो प्वाइण्ट। यह स्थान इस रास्ते के आख़िरी छोर पर है, आगे रास्ता ख़त्म होता है। हम जब वहाँ पहुँचे तो दूर-दूर तक बर्फ़ की पहाड़ियाँ नज़र आ रहीं थीं। थोड़ा मैदानी इलाक़ा और दूर-सुदूर पहाड़ियाँ। मौसम ठंडा और ज़ोरों की हवाओं से सराबोर था। कार से नीचे उतरते ही महसूस हो गया कि थोड़ी देर शरीर को मौसम के अनुकूल करना पड़ेगा। क्योंकि यहाँ पर ऑक्सिजन की कमी रहती है। लोग रास्ते के किनारे पर ही पड़ी बर्फ़ में मस्ती करने के लिए बेताब हो रहे थे। मैं भी बर्फ़ में जाने के लिए तैयार था। कुछ लोगों ने बर्फ़ में जाने के लिए होल बूट तथा जैकेट्स किराये पर ले लिए थे। यहाँ पर स्थानीय लोगों ने छोटी-छोटी हाट लगायी थी। जिसमें चाय–नाश्ते में मोमोस, नूडल्स, भीगे हुए चने, ऑमलेट तथा व्हिस्की व बीअर सब कुछ उपलब्ध था। सिगरेट भी आसानी से मिल रही थी। क़ुदरत के सानिध्य में आकर कुछ लोग अपने शौक़ को पूरा करते रहते हैं। यहाँ पर भी कई लोग सिगार के कश लगाते तथा व्हिस्की, बीअर का लुत्फ़ ऊठा रहे थे। दूर बर्फ़ में चलानेवाली ठेलन गाड़ियाँ दिख रहीं थीं। मैं ने सोनमर्ग में इसका आनंद उठाया था। इस बार मैं बस क़ुदरत के इस हसीन मंज़र को निहारते रहना चाहता था। मुझे मेरे गुरु प्रो.भालाभाई पटेल के वाक्य याद आ गए। पढ़ाते समय उन्होंने कहा था कि जब भी हम किसी पहाड़ी पर जाते हैं, तो क़ुदरत के अविस्मरणीय नज़ारे को देखते नहीं और बोल-बोल कर फोटो खींचते रहते हैं। हज़ारों मील दूर जाकर भी उस स्थान का आनंद उठा नहीं पाए तो क्या अर्थ हमारा उस स्थान पर जाने का? बस, उस स्थान पर आप सबकुछ भूल कर शांत चित्त बैठे रहो और रमणीय स्थान के वातावरण को महसूस कर अपने भीतर उतारते रहो। मैं गुरु के शब्दों को याद कर खुबसूरत मंज़र के लुत्फ़ को उठा रहा था। शोर के कारण मन को व्यवधान सा पहुँचता था। पर बड़ा मज़ा आ रहा था। पता नहीं ये वक़्त फिर मिले ना मिले। मनुष्य जीवन एक बार ही मिलता है। उसे भी हम ग़लत कार्य करके गँवा देते हैं। ईश्वर का लाख लाख शुक्रिया कि मुझे यह सुविधा प्रदान की है जिससे मैं आज ज़ीरो प्वाइण्ट पर बैठा हूँ। ज़ीरो प्वाइण्ट नाम भी शायद इस लिए पड़ा होगा कि इससे आगे कोई प्वाइण्ट नहीं है। इस रास्ते का यह अंतिम पड़ाव है।

यहाँ से वापिस जाने की बिलकुल इच्छा नहीं हो रही थी। बस बैठे रहें ओर वक़्त गुज़रता रहे। पर आख़िर हम वक़्त की क़ैद में हैं, सो अब हम लोगों को वापिस मुड़ना था। फ़िल्म की पंक्ति याद आ रही थी– वक़्त ने किया क्या हसीं सितम......। ड्राइवर ने सबको बुला लिया और हमारी कार वापिस लाचुंग की ओर जाने के लिए तैयार थी। अब ट्रैफ़िक बढ़ गया था। हमारी कार को पार्किंग से निकालकर रास्ते पर लाने में काफ़ी देर हो गयी। लेकिन पहाड़ियों में गाड़ी चलानेवाले बहुत ही समझदार होते हैं। एक दूसरे की मदद करके तुरन्त रास्ता बना लेते हैं। मेरा ड्राइवर बहुत ही होशियार, चतुर और ज़िन्दादिल था। अपने हँसमुख स्वभाव से उसने हमारे दिल तो जीत ही लिए थे, पर रास्ते भर सबको पहचानता था और कुछ न कुछ बोलकर सबको हँसा देता था। यहाँ पर भी उसने हँसते हुए अपनी कार के लिए जगह बना ली और हम ज़ीरो प्वाइण्ट से वापिस जा रहे थे।

रास्ते में हमें देखने थे गरम पानी के झरने। इसी रास्ते में जहाँ पर ज़ीरो प्वाइण्ट के लिए परमिट लेना पड़ता है, वहाँ पर ही गरम पानी के झरने हैं। जो युमथांग के दाहिनी ओर स्थित है। यह स्थान भी हरे–भरे घास के मैदानों, शांत चीड़ के वृक्षों एवं चाँदी से चमकते देवदार वृक्षों, ख़ूबसूरत झरनों तथा नदियों के साथ अपनी प्राकृतिक ख़ूबसूरती के लिए प्रसिद्ध है। इन गर्म पानी के झरनों में सल्फर तथा हाइड्रोजन मिला हुआ है। इसका लुत्फ़ लेकर हम सीधे लाचुंग होटल पर लंच के लिए आ पहुँचे। लंच लेने के बाद हमें वापिस निकलना था गेंगटोक के लिए। वापिस का सफ़र भी बेहद रोमांचक रहा। ड्राइवर ने नया रास्ता लिया था। इस रास्ते हरियाली अधिक थी। कुछ-कुछ जगह बारिश भी मिली। जब हम गेंगटोक पहुँचे तब गेंगटोक पूरा बादलों में घिरा था। शाम हो चुकी थी। हमारी कार पार्किंग तक हमारे साथ थी। यहाँ से हमें लोकल टैक्सी करके होटल पर पहुँचना था। सो सबलोग थके हुए थे। सीधी टैक्सी करके होटल आकर आराम करने अपने-अपने कमरों में चले गए।

अगले दिन हमारा सफ़र था सिक्किम के पश्चिम में स्थित पेलिंग का। पेलिंग गेंगटोक से 145 किमी की दूरी पर है। पेलिंग का आकर्षण वहाँ से दिखने वाली कंचनजंघा हिल है। आज भी मैं समय पर तैयार हो गया था। गेंगटोक से अब मैं विदा हो रहा था। क्योंकि पेलिंग से सीधा हम दार्जिलिंग जानेवाले थे और वहाँ से सीधा अहमदाबाद। सो हमारे मैनेजर ने रात को ही कह दिया था कि सारा सामान पैक करके सुबह नौ बजे तक होटल के लाउन्ज में आ जाना। मैं ब्रेकफ़ास्ट करके सारा सामान लेकर होटल के लाउन्ज में आ गया था। कार को आने में थोड़ी देर थी। रिसेप्शन पर होटल के मैनेजर से मिलकर होटल के द्वारा दी गयी सुविधा से ख़ुश होकर उनका धन्यवादज्ञापन किया। वाक़ई में होटल अच्छा था। मन में गेंगटोक को छोड़ने की बात को लेकर एक प्रकार की मायूसी छा रही थी। आज हम लोगों को गेंगटोक के बाक़ी टूरिस्ट प्लेस भी देखने थे। सबसे ज़्यादा आकर्षण मुझे था पेलिंग जाते रास्ते में आनेवाला बेहद सुंदर स्थान रावंगल में स्थित बुद्धा पार्क, जो साउथ सिक्किम में स्थित है।

हमारी कार समय पर आ गयी। इस रूट के लिए नयी गाड़ी और नया ड्राइवर था। ड्राइवर कुछ ज़्यादा ही होेशियार था। गेंगटोक के कुछ स्थान को दिखाने की उसकी रुचि नहीं थी। वो चाहता था कि सीधा रावंगल का बुद्धा पार्क ले जाया जाए और वहाँ से पेलिंग। हमने तो ठान ली थी कि गेंगटोक के जो अन्य टूरिस्ट प्लेस हैं, उसे देखकर ही पेलिंग के लिए रवाना होंगे। गेंगटोक में ही बौद्धिस्ट मोनेस्टरी है, जिसका नाम है रुमटेक मठ। यह प्राचीन धरोहर है।

जब मैं रुमटेक मठ पहुँचा तो मुझे याद आ गया मेरा लेह का सफ़र। लद्दाख में अनेकों बौद्ध मठ हैं। मेरा अनुभव है कि ज़्यादातर मठ एक जैसे ही लगते हैं। हाँ, भीतर से अलग–अलग। जैसे हिन्दु मंदिर होते हैं ठीक वैसे ही। पता नहीं पर मुझे बौद्ध मठ में जाना बेहद अच्छा लगता है। एक सुकून सा मिलता है। सुकून के लिए ही मैं रुमटेक मठ में आया था। इतने दिन सिक्किम में था, दूर से बड़े छोटे बौद्ध मठों को देखता रहा था, पर अब जाकर एक प्राचीन एवं प्रसिद्ध मठ में आया था। रुमटेक मठ सिक्किम का प्राचीन मठ है। यह मठ क़रीबन तीन सौ वर्ष पुराना है। 1960 के दशक में इस मठ का पुन:निर्माण किया गया था। मठ में एक विद्यालय तथा ध्यान साधना के लिए एक बड़ा खण्ड भी है। इस मठ में बहुमूल्‍य थंगा पेंटिग तथा बौद्ध धर्म के कग्‍यूपा संप्रदाय से संबंधित वस्‍तुएँ सुरक्षित अवस्‍था में है। इस मठ में सुबह में बौद्ध भिक्षुओं द्वारा की जाने वाली प्रार्थना बहुत कर्णप्रिय होती है। “यह मठ गेंगटोक से चौबीस किलोमीटर की दूरी पर है। यह ग्यालवा करमापा का स्थान है, जो तिब्बत में बौद्ध धर्म के कग्यूपा अनुयायियों के प्रमुख हैं। यहाँ तिब्बती धर्म से संबंधित अनेक पेंटिंग्स प्रदर्शित हैं। धर्मालाप के सत्रों में यहाँ अनेक यात्री आते हैं। मंदिर के पीछे बौद्ध धर्म के अध्ययन के लिए स्थित संस्थान में मठवासी अध्ययन करते हैं। रुमटेक में फरवरी माह में तिब्बती नव वर्ष से दो दिन पूर्व चाम नृत्य का आयोजन किया जाता है। इस दौरान आप झांझ-मंजीरे और ढोल की थाप पर नाचते मठवासियों को देख सकते हैं।" (वीकीपीडिया से साभार) मेरे लिए बौद्ध धर्म की प्रार्थना एवं पूजा का एक अलग ही आकर्षण रहा है। बेहद सुंदर सलीक़े से मठ में एक साथ कई बौद्ध साधु पूजा और प्रार्थना करते हैं। एक साथ समूह में तिब्बती भाषा में मंत्रोच्चार करते तथा श्लोक के पूर्ण होने पर बड़े से झांझ–मंजीरे तथा ढोल नगारे एवं दुन्दुभी बजाते हुए पूजा करते लामाओं को देखना भी एक अलभ्य प्रसंग कहा जाएगा। मुझे यह अवसर कई बार मिला है। बस, तब मैं एकचित्त मगन होकर आसपास का सबकुछ भूल जाता हूँ। यह मेरा ध्यान ही कहलाएगा। मेरे लिए रहस्य आज तक रहा है उनकी भाषा को समझना।

यही वातावरण मिला रावंगल के बौद्ध पार्क में स्थित मठ में। इस स्थान का आकर्षण यहाँ पर स्थित भगवान बुद्ध की विशाल प्रतिमा। समाधिस्थ भगवान बुद्ध पहाड़ियों से घिरे क़ुदरत की गोद में तथा चारों ओर उमड़ते लहराते सफ़ेद बादलों के मध्य विराजमान हैं। पार्क इतना सुंदर बनाया है कि आप बस तस्वीरें ही खींचते रहो। भगवान बुद्ध की यह मूर्ति क़रीबन 130 फ़ीट ऊँची है। इस पार्क को 25 मार्च 2013 में दलाई लामा के कर कमलों से उद्घाटित किया गया था। दूर से पार्क में स्थित बुद्ध की मूर्ति दैदिप्यमान होती नज़र आती है। पार्क को सुंदरता प्रदान करते हैं, आसपास के पहाड़। पहाड़ों की गोद में रावंगल के इस सुंदर पार्क को भगवान बुद्ध की समाधिस्थ प्रतिमा ओर अधिक पवित्र करती है। प्रतिमा के नीचे ही मठ है। पार्क में सारी सुविधाएँ मौजूद हैं। वातावरण इतना ख़ुशनुमा था कि बस इस स्थान पर बैठे रहें। तथागत की निष्ठा में ध्यान लग ही जाता है। मैं भी प्रकृति की गोद में बैठा ध्यानस्थ था। तभी ड्राइवर की आवाज़ ने जगा दिया। पेलिंग के लिए हम रवाना हुए।

 क़रीबन तीन बजे के करीब हम पेलिंग आ गए। छोटा–सा नगर है पेलिंग। पेलिंग का महत्व यहाँ से विद्यमान हो रही कंचनजंघा की पहाड़ियाँ है। ज़्यादातर टूरिस्ट पेलिंग में कंचनजंघा के शिखरों को देखने के लिए ही आते हैं। पेलिंग ऐसे ही स्थान पर है कि चारों ओर पहाड़ियाँ नीचे की ओर जाती दिखती हैं। जैसे लगता हो बिलकुल एसा कि पेलिंग एक शिखर है और चारों ओर उससे जुड़ी अनेकों पहाड़ियाँ। हमारा होटल भी ऐसे स्थान पर था कि कमरे की बाल्कनी से ही हम दूर–सुदूर फैली अनगिनत पहाड़ियों को निहार सकते थे। मैं इतने सुंदर वातावरण को देखकर ही उत्साह में आ गया था। हमारे मैनेजर ने हमारे लिए चाय–नाश्ते का इन्तज़ाम कर दिया था। सुबह के निकले हम सबको चाय–नाश्ता मिल गया तो सब ख़ुश हो गए। पेलिंग में हम समय से पहले आ गए थे, सो हमने प्लान बना लिया पेलिंग से क़रीबन 28 किमी की दूरी पर स्थित सिंगशोर सस्पेन्शन ब्रिज (Singshore Bridge) को देखने जाने का। सिंगशोर ब्रिज सिक्किम का सबसे ऊँचा और एशिया का सेकण्ड हाईएस्ट ब्रिज माना जाता हैं। इस ब्रिज की हाईट 100 मीटर तथा 240 मीटर लंबाई है। यह ब्रिज मानव निर्मित है। इस ब्रिज को 20 जनवरी 1993 में उद्घाटित किया गया था। पूरा ब्रिज लोहे की रस्सी से जुड़ा हुआ है। ब्रिज से बीस किलोमीटर की दूरी पर उतेरी गाँव जो भारत का अंतिम गाँव है। उससे ही सटकर नेपाल की सीमा लगती है। उतेरी गाँव दरअसल बेस कैम्प है सिंगिलेला माउण्टेन रेन्ज का। सो जो पर्वतारोहक सिंगिलेला माउण्टेन जाना चाहते हैं, वे सभी यहाँ से जाते हैं। ब्रिज के मध्य जब हम पहुँचते हैं तो लगता है ऐसा कि जैसे हम हवा में झूले खा रहे हों। ठेठ नीचे नदी के पानी की कलकल ध्वनि हमें ओर अधिक पागल करती रहती थी। दूर-दूर बस पहाड़ ही पहाड़ दिखायी दे रहे थे। चारों ओर गहरी हरियाली छायी हुई थी। कितना अद्भूत नज़ारा था, जिसे मरते दम तक भूल नहीं सकते।

पेलिंग में ठंड कुछ ज़्यादा ही थी। कारण था सामने बर्फ़ से लदी कंचनजंघा की पहाड़ियाँ। जिससे ठंडी हवाएँ पेलिंग के मौसम को ठंडा कर रही थीं। सुबह जल्दी उठकर मैं तो निकल पड़ा था पेलिंग के ख़ूबसूरत नज़ारे को देखने। आज मुझे नसीब ने साथ दिया सो थोड़ी दूरी पर ही बर्फ़ से लदी, बादलों के बीच कंचनजंघा की शृंखलाएँ दिखायी देने लगीं। सुबह की सुनहरी किरणें शिखरों पर गिर रही थीं। मैं जैसे कैलाश पर्वत को देख न रहा हूँ? ऐसा प्रतीत हो रहा था। मेरा पेलिंग में आना सफल हो गया। फिर से मुझे याद आ गया मेरा नैनिताल कौसानी का सफ़र। कौसानी भी ऐसा ही हिल स्टेशन है, जहाँ से हिमालय के बर्फ़ीले पहाड़ दिखते हैं। कौसानी भी ऊँचाई पर है और सामने दूर-दूर तक पहाड़ ही पहाड़ नज़र आते हैं। पर ये क्या थोड़ी ही देर में बादल आ गए और कंचनजंघा को अपने साये में समा लिया। मेरे साथ के कई मित्रों को यह नज़ारा देखने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ। पेलिंग के आसपास कई सुंदर पर्यटन स्थल है, जैसे– पेमायंगस्टे मोनेस्टरी, दारप विलेज, रीम्बी वॉटरफ़ॉल, चांगी वॉटरफ़ॉल, कंचनजंघा वॉटरफ़ॉल, खेएचोपालरी लेक, खेएचोपालरी मोनेस्टरी, ताशीडिंग मोनेस्टरी, राबडानसे रूइन्स, सेवारो रॉक गार्डन, पेलिंग हेलीपेड आदि। इतना सारा देखने का मौका मिलना और समय भी मिलना नसीब का खेल ही होता है। मुझे पेलिंग में दो दिन ही रहना था, सो बट नेचरल मैं सबकुछ देख नहीं सकता। मन में फिर से यहाँ पर आने का ठान लिया था। मेरी घुमक्कड़ प्रकृति मुझे फिर से यहाँ पर ला भी सकती है। अब मेरा सिक्किम का सफ़र पूरा हो रहा था। आगे का सफ़र था दार्जिलिंग। जो पश्चिम बंगाल में स्थित है। उत्तर-पूर्व का यह पहला पड़ाव था। अभी तो बहुत कुछ देखना बाक़ी था। ज़िन्दगी एक सफ़र है सुहाना.… मानकर कहीं ओर नये डेस्टीनेशन पर फिर से घूमेंगें। क्योंकि सोचते रहना ज़िन्दगी के सकारात्मक पक्ष को प्रकट करता है। मन में सिक्किम की ढेरों सारी यादें भरकर मैं जा रहा था एक और हिल स्टेशन पर जो था दार्जिलिंग, चाय के बग़ीचों का शहर दार्जिलिंग।

 

संदर्भ –

1. पृ. 9 कामायनी, प्रसाद जयशंकर।

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